युद्ध का मतलब- मौत, महंगाई और परेशानी, जानिए हमारे लिए इस युद्ध के मायने

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युद्ध का मतलब- मौत, महंगाई और परेशानी, जानिए हमारे लिए इस युद्ध के मायने

– डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
कल जब मैंने यह लेख लिखा था, तब कच्चे तेल के दाम साढ़े 119 डॉलर प्रति बैरल (एक बैरल : 158.987 लीटर यानि करीब 159 लीटर) को छूकर शाम को 115 डॉलर तक आ गए थे। शेयर मार्केट्स, बुलियन सब कराह रहे थे, लेकिन आज ब्रेंट क्रूड की कीमत साढ़े 92 डॉलर तक नीचे है।
कारण ? ट्रम्प ने कह दिया था मौजूदा युद्ध ‘बहुत जल्दी’ खत्म हो जाएगा। इस बयान से ग्लोबल सप्लाई चेन को लेकर अनिश्चितता में कमी आई। निवेशकों का भरोसा बढ़ा। हालांकि, मौजूदा कीमतें अब भी युद्ध शुरू होने से पहले के स्तर के मुकाबले ज्यादा हैं।
मैंने इस लेख में आम बोलचाल की भाषा में यह बताने की कोशिश की है कि ईरान – अमेरिका – इजरायल की लड़ाई का हम पर क्या असर हो रहा है और क्या हो सकता है? क्रूड आयल का मतलब केवल पेट्रोल और डीज़ल नहीं होता, हमारी पूरी अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है? इसकी कीमतें कौन तय करता है और प्रोसेस क्या होती है?
युद्ध का मतलब : मौत, महंगाई और परेशानी
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युद्ध कोई भी देश लड़े, कीमत तो इंसानियत और पूरी दुनिया को ही चुकानी पड़ती है। रूस-यूक्रेन युद्ध और वेस्ट बैंक में इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष जारी हैं। इसके अलावा करीब 30 देशों में हिंसक संघर्ष चल रहे हैं। पाकिस्तान-अफगानिस्तान बॉर्डर पर भी क्रॉस-बॉर्डर लड़ाइयाँ हो रही हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध का खामियाजा दुनिया पहले से ही भुगत रही थी, लेकिन ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमलों ने पूरी दुनिया की बेचैनी बढ़ा दी है। ईरान ने जवाब में अपने कई पड़ोसी देशों (इराक, सीरिया, लेबनान, यमन आदि) पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिससे युद्ध का दायरा और व्यापक हो गया है।
भारत पर इस युद्ध का भारी असर पड़ रहा है। 9 मार्च 2026 को क्रूड ऑयल की कीमतें पीक पर 119-119.50 डॉलर प्रति बैरल (एक बैरल = 159 लीटर) तक पहुंच गई थीं, जबकि फरवरी अंत में ये 70-75 डॉलर के आसपास थीं। यानी महज 10 दिनों में 40-50% की छलांग!
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा क्रूड ऑयल आयातक है। अपनी जरूरत का 85-90% तेल बाहर से आयात करता है, जिसमें आधे से ज्यादा इराक, सऊदी अरब, UAE, कुवैत आदि से आता है—ये सब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरता है। ईरान युद्ध के कारण ये रास्ता प्रभावित है। जहाज अटके पड़े हैं, इंश्योरेंस और फ्रेट कॉस्ट बहुत बढ़ गए हैं।
भारत के साथ खास बात यह है कि हम क्रूड ऑयल को रिफाइन करने वाले प्रमुख देशों में से एक हैं। दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी जामनगर (गुजरात) में है, जिसका स्वामित्व रिलायंस ग्रुप के पास है। इसकी क्षमता 1.24 मिलियन बैरल प्रति दिन है—दुनिया में सबसे बड़ी सिंगल-साइट रिफाइनरी।
अगर आप सोचते हैं कि पेट्रोलियम पदार्थ सिर्फ पेट्रोल और डीजल हैं, तो आपकी समझ अधूरी है। क्रूड ऑयल के शोधन से न केवल पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, एविएशन फ्यूल, पैराफिन वैक्स और नैफ्था मिलता है, बल्कि डामर (एस्फाल्ट), लुब्रिकेंट, वैसलीन, प्लास्टिक, सिंथेटिक रबर, अमोनिया-आधारित खाद, कीटनाशक, दवाइयाँ, डिटर्जेंट, पेंट, सॉल्वेंट्स, सिंथेटिक फाइबर (नायलॉन, पॉलिएस्टर), साबुन, शैंपू आदि सैकड़ों चीजें बनती हैं।
क्रूड ऑयल की कीमतें कोई राष्ट्रपति, राजा या एक देश तय नहीं करता। पूरी दुनिया की इकोनॉमी, राजनीति, मौसम, सामरिक स्थिति और ट्रेडर्स की भीड़ मिलकर तय करती है।
मान लीजिए लोकल सब्जी मंडी में आलू की आवक बहुत ज्यादा हो तो दाम गिर जाते हैं। अगर आवक कम हो और स्टॉक सीमित हो तो दाम बढ़ जाते हैं। क्रूड ऑयल भी वैसा ही है—ग्लोबल सप्लाई और डिमांड पर निर्भर। मुख्य रूप से फ्यूचर्स मार्केट तय करते हैं, जहाँ कंपनियाँ, ट्रेडर्स, स्पेकुलेटर्स, रिफाइनरी और देशों के प्रतिनिधि आगे की डिलीवरी के लिए कॉन्ट्रैक्ट खरीदते-बेचते हैं।
दुनिया में दो प्रमुख बेंचमार्क हैं:ब्रेंट क्रूड (उत्तर सागर से, यूरोप-एशिया के लिए) — लंदन के ICE एक्सचेंज पर ट्रेड होता है।WTI क्रूड (अमेरिकी) — न्यूयॉर्क मर्केंटाइल एक्सचेंज (NYMEX) पर।
ये कीमतें रोज बदलती हैं, जैसे स्टॉक मार्केट। प्रभावित करने वाले कारक: सप्लाई (OPEC+ का रोल), डिमांड (चीन-भारत-अमेरिका की ग्रोथ), इन्वेंटरी लेवल, डॉलर की ताकत, जियोपॉलिटिकल रिस्क (युद्ध), प्राकृतिक आपदाएँ, रिफाइनरी की स्थिति आदि।
9 मार्च 2026 की सुबह क्रूड कीमतों ने करीब 30% की छलांग लगाई (पीक पर 119+ डॉलर), लेकिन G7 देशों ने इमरजेंसी ऑयल रिजर्व रिलीज की चर्चा की, तो कीमतें थोड़ी कम हुईं (अभी ~103-105 डॉलर के आसपास)।
अगर आप सोचते हैं कि ईरान युद्ध से आपको क्या लेना-देना? तो गलत सोच रहे हैं। अगर युद्ध जल्दी नहीं रुका तो भारत में गहरा असर पड़ेगा:रसोई गैस (LPG) सिलेंडर ₹60 महंगा हो चुका है (मार्च 7 से दिल्ली में ~₹913)।
पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे।
स्टॉक मार्केट गिर रहा है (सेंसेक्स-निफ्टी में 2-3% गिरावट)।रिफाइनरी, एयरलाइंस, ट्रांसपोर्टर परेशान।फिस्कल डेफिसिट बढ़ेगा, विकास दर कम होगी।
– हर चीज महंगी हो जाएगी—ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ, बिजली बिल सब।
-अमेरिका में भी गैसोलीन ~3.5 डॉलर/गैलन पहुंच गया है, जबकि वो खुद बड़ा तेल उत्पादक है।हम सबके और पूरी दुनिया के हित में है कि युद्ध जल्दी थमे। हालात सामान्य हों।