चंद्रग्रहण की छाया में शरद पूर्णिमा कब, कैसे मनाएं,क्या होंगे ग्रहण के प्रभाव

ज्योतिषाचार्य पंडित अशोक शर्मा ने दिए हर प्रश्न के उत्तर

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चंद्रग्रहण की छाया में शरद पूर्णिमा कब, कैसे मनाएं,क्या होंगे ग्रहण के प्रभाव

संभागीय ब्यूरो चीफ चंद्रकांत अग्रवाल की खोजपरक रपट

शरद पूर्णिमा की रात को साल का आखिरी चंद्रग्रहण लगने जा रहा है। कई दृष्टियों से ये चंद्रग्रहण खास महत्व रखता है। हालांकि यह एक खगोलीय घटना है लेकिन ज्योतिष और धर्म की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। कारण यह है कि 14 अक्टूबर अमावस्या को सूर्य ग्रहण पड़ा था और इसी पक्ष में चंद्रग्रहण पड़ रहा है। तब मैंने प्रदेश के प्रख्यात ज्योतिषाचार्य पंडित अशोक शर्मा से इस संबंध में उठ रहे कई तरह के सवालों,शंकाओं,जिज्ञासाओं के शास्त्रोक्त समाधान जानें। तब उन्होंने बताया कि मध्यप्रदेश व नर्मदापुरम जिले के स्थानीय समयानुसार धार्मिक दृष्टि से भारतीय समयानुसार 28 अक्टूबर की रात्रि 1 बजकर 05 मिनिट से 02 बजकर 24 मिनिट तक ग्रहण की अवधि रहेगी। अन्य प्रदेशों में यह वहां के स्थानीय समय के अनुसार 2 से 5 मिनिट का अंतर अलग अलग पंचांग के अनुसार आ सकता है। मेष राशि के अश्विनी नक्षत्र में यह ग्रहण पड़ेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार ग्रहण का सूतक 9 घंटे पूर्व अर्थात दोपहर 4 बजकर 02 मिनिट से प्रारंभ हो जाएगा। हिंदु संस्कृति में शरद पूर्णिमा की रात्रि में छत पर खीर बनाकर रखने का विधान है जो सकारात्मक औषधीय ऊर्जा प्रदान करती है।

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अब पूर्णिमा की रात को ग्रहण पड़ने के कारण इसको नहीं रखा जा सकता अतः इस कंडीशन में क्या करें, यह प्रश्न सर्वप्रथम मैने पंडित अशोक शर्मा से किया। तब उन्होंने कहा कि इसका मार्ग ये है कि पूर्णिमा तिथि 27 अक्टूबर की रात्रि तथा 28 अक्टूबर की अल सुबह 04 बजकर 18 मिनिट से 29 अक्टूबर की 01.55 बजे तक रहेगी। अत: 27 अक्टूबर की मध्य रात्रि को ही खीर बनाकर रख देवे और सूर्योदय से पूर्व इस खीर को ले आएं तथा मंदिरों व घरों में इस खीर का प्रातः सेवन कर सकते हैं। इससे खीर सेवन का परम्परा विधान पूर्ण हो जाएगा। हिंदू धर्म में पूर्णिमा का खास महत्व होता है। सभी पूर्णिमाओं से शरद पूर्णिमा को विशेष कल्याणकारी माना गया है।

अश्विन माह में आने
वाली पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है. इस पूर्णिमा को कौमुदी, कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा धरती के सबसे निकट होता है। ये पर्व रात में चंद्रमा की दूधिया रोशनी के बीच मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पूरे साल में केवल शरद पूर्णिमा के दिन ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। इस दिन चंद्र देव की पूजा करना शुभ होता हैं। शरद पूर्णिमा के दिन व्रत करना विशेष फलदायी होता है। इस बार शरद पूर्णिमा 28अक्टूबर,शनिवार को है।उदयातिथि के अनुसार भी शरद पूर्णिमा इस बार 28 अक्टूबर को ही है। पूर्णिमा तिथि इस बार 28अक्टूबर, शनिवार को सुबह 4 बजकर 17 मिनट पर शुरू होगी और तिथि का समापन 29 अक्टूबर, रविवार को दोपहर 1 बजकर 53 मिनट पर होगा। इस दिन गज केसरी योग, बुधादित्य योग, शश योग और सिद्धि योग का निर्माण होने जा रहा है, जिसके कारण यह शरद पूर्णिमा बेहद खास मानी जा रही है।

पंडित अशोक शर्मा बताते हैं कि एक अन्य मत के अनुसार शरद पूर्णिमा पर होने वाले खीर के भोग के लिए सूतक काल से पहले ही खीर बनाकर खीर में कुशा डालकर रख दीजिए एवं ग्रहण के मोक्ष के उपरांत खीर को खुले आसमान के नीचे रख दीजिए,एवम प्रातः काल मंगला आरती के बाद खीर में तुलसी दल डाल कर ठाकुर जी को भोग लगा कर प्रसाद रूप ले सकते हैं। बाबजूद इस सबके पंडित शर्मा इस ग्रहण के प्रभावों पर पूछे गए मेरे सवाल के जवाब में कहते हैं कि इस बार शरद पूर्णिमा पर पड़ रहा यह चंद्र ग्रहण, प्राकृतिक आपदा एवं जनमानस में अशुभ फलदायी होने की संभावना ज्यादा बता रहा है। क्योंकि लगातार सूर्यग्रहण व चंद्र ग्रहण पड़ते हैं तो प्राकृतिक प्रकोप, भूकंप, मानवीय युद्ध की विभीषिका से धन एवं जन हानि होती है। अभी वर्तमान का मिडिल ईस्ट में चलने वाला युद्ध इसी चंद्रग्रहण के प्रभाव से और अधिक भड़क सकता है जो कि ग्रहण से एक माह पश्चात तक चल सकता है।

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इसी ग्रहण के कारण दुनिया के शासकों में मतभेद, डॉक्टर, वैद्य ,व्यापारियों को कष्ट, पीड़ा, अशांति हो सकती है। व्यापारिक क्षेत्र में लोहा, क्रूड ऑयल, लाल रंग की वस्तुएं, दवाईयों में तेजी आ सकती है। विश्व के सभी शेयर बाजारों में बड़ी मात्रा में तेजी मंदी दिखाई दे सकती है। सूतक के नियमों संबंधी मेरे सवाल के जवाब में पंडित शर्मा कहते हैं कि भारत में ग्रहण दिखेगा इसलिए नियम लागू होंगे। सूतक 28 अक्टूबर को दोपहर 2:52 से लग जायेगा। सूतक में मन्दिरों में पूजा आरती नहीं होती है।सूतक से पहले पके हुए खाद्य पदार्थों में कुशा, तिल, या तुलसी डाल दें। तुलसी एक दिन पहले ही तोड़ लें ग्रहण में तुलसी नहीं ग्रहण के बाद पका हुआ भोजन गाए या कुत्तों को खिला दें। ग्रहण के समय अपने ईष्ट,भगवान के नाम का जप कीर्तन आदि करना चाहिए, जप करते समय गंगाजल पास में रख लें जप का फल कई गुना बढ़ जायेगा। ग्रहण के बाद आसन, माला, गोमुखी, पहने हुए वस्त्र सब धो देने चाहिए और स्नान करके चंद्र देवता को प्रणाम करके उन्हें अर्ध्य देना चाहिए। अब मैने उनसे जब इस चंद्र ग्रहण के राशिगत प्रभावों पर ज्योतिष शास्त्र अनुसार फलित जानना चाहा तो उन्होंने जो बताया वह निम्नानुसार था। मेष : इसी राशि पर ही ग्रहण है। अतः आपकी प्रोफेशनल लाइफ में तनाव एव पद हानि की संभावना है।

वृषभ :- इस राशि के जातक के लिए ग्रहण अशुभ फल प्रद है। अत: मानसिक कष्ट हो सकता है।
मिथुन :- आर्थिक दृष्ट से ग्रहण शुभ नहीं है।
कर्क :- इस राशि के जातक के लिये अपने कर्म स्थल एवं कार्य क्षेत्र मे कठिन परिस्थितियां बन सकती है।
सिंह : सिंह राशि का स्वामी सूर्य नीच का चल रहा है।इसलिए इनके लिये भी ग्रहण अशुभ फलदायी है। कन्या :- कन्या राशि वालो के लिये ग्रहण शुभ फलदायी है। धन संबंधी कार्य बन सकते हैं।
तुलाः- तुला राशि के लिए ग्रहण मिश्रित फलदायी है। वृश्चिक: इस राशि वालो को ग्रहण शुभ फलदायी है। शत्रु परास्त होंगे एवं प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
धनु: – ग्रहण मिश्रित फल दाई है। संयम से कार्य लेने पर काम बनेगें।
मकर:- इस राशि वालो को गृह क्लेश का सामना करना पड़ सकता है।
कुंभ : ग्रहण मिश्रित फल प्रद है। पराक्रम की हानि होगी एवं थोड़ा शुभ फल भी होगा।
मीन :- मीन राशि वालों को मिश्रित फल दाई है। वाणी पर नियंत्रण रखे तो उचित होगा। लव लाइ‌फ में टेंशन बढ़ सकता है

ततः पंडित अशोक शर्मा मुझसे कहते हैं कि 28 अक्टूबर शनिवार को शरद पूर्णिमा के दिन चन्द्र ग्रहण के कारण निशीथ काल मेंं शरद पूर्णिमा के पूजन; पाठ एवं खीर के प्रसाद वितरण करने के संबंध में लोगों के बीच संशय की स्थिति बनी हुई है। इस विषय में मेरे पास कई लोगों के फोन आ रहे हैं कि पंडितजी क्या इस वर्ष शरद पूर्णिमा नहीं मनाई जाएगी। कुछ विद्वानों ने भी इस संशय के निराकरण स्वरूप मेरी राय मांगी है । उन समस्त महानुभावों सै विनम्र निवेदन करता हूं कि कर्म एवं पर्व त्योहारोँ का लोप कभी और कदापि नहीं होता । कोई व्यवधान आता है तो शास्त्रों में उसके निदान हैं,उनका अनुसरण करते हुये पर्व एवं त्योहार मनाये जाने में कोई दोषापत्ति नहीं होती। शरद पूर्णिमा को चन्द्र ग्रहण का सूतक सूर्योदय के अनुसार कहीं दिन में 4 बज कर 5 मिनट से और कहीं 4 बज कर 11 मिनट से लगेगा। सूतक लगने के बाद मूर्ति स्पर्श, भोजन,शयन इत्यादि कार्यकम ग्रहण का मोक्ष हौने तक बन्द रहेंगे। शरद पूर्णिमा को चन्द्रमा 16 कलाओं से परिपूर्ण होकर अमृत की वृष्टि करता है। अतः उस दिन खीर बनाकर रात में बाहर रखते हैं और कहीं रात्रि के 12 बजे के बाद और कहीं सूर्योदय से पहले अमृतमयी खीर का प्रसाद बांटते खाते हैं। इसमें मुख्य प्रश्न यह है कि सूतक उस दिन दिन के 4 बज कर 5 मिनट से लग जायेगा तों खीर कब बनाईं जाए और बाहर कब रखी जाए ? तो इन सभी प्रश्नों का समाधान यह है कि शास्त्रों के अनुसार तेल, घृत,दूध, दही,छाछ, कांजी, तेल-घृत के तले हुए पकवानों और सूखे अन्न में सूतक का कोई दोष नहीं लगता है । इस प्रमाण से खीर सूतक प्रारम्भ हौने से पहले बना कर उसमें कुश-तुलसीपत्र और तिल डालकर सुरक्षित रख लैं और ग्रहण के मोक्ष हौने के बाद स्नानादि करके चन्द्रमा की चांदनी में रख दी जाए और सूर्योदय से पूर्व उठाकर उसका प्रसाद वितरण कर दिये जाने में कोई दोषापत्ति नहीं है। और जो इस मत से सहमत नहीं हों वे ग्रहण मोक्ष हौने के बाद स्नानादि अनन्तर खीर बनाकर रखें। ग्रहण के समय चन्द्रमा की रूकी हुई अमृतमयी रश्मियें ग्रहण हटते ही वरसने लगेंगी और आपकी चांदनी में रखी खीर अमृतमयी हो जायगी। इसमें कोई संशय नहीं,पर ग्रहण के भय में इस शरद पूर्णिमा के पर्वं का लोप नहीं हौने दें। अन्यथा इसके प्रत्यवाय का दोष हमको प्राप्त होगा जिसका कोई प्रायश्चित नहीं है