नरवणे की किताब पर राजनीतिक तूफान किसका षड्यंत्र ?

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नरवणे की किताब पर राजनीतिक तूफान किसका षड्यंत्र ?

आलोक मेहता

भारतीय सशस्त्र बलों के प्रमुख थलसेना , वायु सेना , और नौसेना जब सेवा से निवृत्त होते हैं, तो वे अपने अनुभवों और दृष्टिकोणों को किताबों के रूप में साझा कर सकते हैं। इनमें अक्सर सैन्य निर्णय, रणनीति, युद्ध स्मरण, नेतृत्व के सिद्धांत व राष्ट्रीय सुरक्षा के अनुभव शामिल होते हैं। ऐसी किताबें इतिहास, रणनीति, और सार्वजनिक विमर्श में योगदान करती हैं, लेकिन सुरक्षा प्रतिबंधों और सरकारी नियमों के कारण इनमें कई सीमाएँ व आपत्तियाँ भी आती हैं। इसी क्रम में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब के अंशों को लेकर राजनीतिक तूफान उठने पर कुछ गंभीर आशंकाएं मुझ जैसे पत्रकारों या सेना अथवा गुप्तचर सेवाओं में रहे लोगों के दिमाग में आ रही हैं | चीनी घुसपैठ के समय से लेकर उसे पीछे धकेलने और सीमाओं पर एक हद तक शांति की स्थिति के लिए सेना और सरकार की सफलता के बजाय उन्हें टकराव के रुप में दिखाने , संसद के अंदर बाहर सामान्य कामकाज रोकने , जनरल नरवणे को एडमिरल विष्णु भागवत की तरह अनुशानहीनता के आरोपों से अपमानित करने का कोई देशी विदेशी षड्यंत्र तो नहीं है ?
राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी या उनके कुछ समर्थक नेता , सलाहकार , समर्थक मीडिया नरवणे की किताब के बहाने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को कमजोर दिखाने तथा सेना के बीच टकराव से जनता के मन में भ्रम फ़ैलाने की कोशिश कर रहे हैं | लेकिन इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि 1971 से लेकर अब तक विदेशी ताकतें , एजेंसियां , हथियारों रक्षा सामग्री के दलालों ने समय समय पर अपने स्वार्थों के लिए भारत की सुरक्षा और लोकतांतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावित कर नुक्सान पहुँचाने के प्रयास किए हैं | मिराज , स्कॉर्पिनों पनडुब्बी , बोफोर्स , सुखोई , राफेल जैसे रक्षा सौदों या भारत चीन अथवा पकिस्तान संबंधों पर किसी महत्वपूर्ण वार्ताओं के अवसरों पर ऐसे विवाद उत्पन्न किए गए , जिससे भारत के हितों को आघात पहुँचाया जा सके | इस समय भी रुस , अमेरिका , फ्रांस सहित कई देशों के साथ सुरक्षा संबंधों पर वार्ताएं चल रही हैं | यूरोपीय संघ , अमेरिका सहित कई देशों से मुक्त व्यापार समझौते हो रहे हैं | इसलिए कुछ ताकतें भारत की सत्ता व्यवस्था को अस्थिर और बदनाम करने की कोशिश कर सकते हैं |
इसमें कोई शक नहीं कि जनरल नरवणे से पहले भी भारतीय सेना के वरिष्ठ अफसरों ने कई किताबें और संस्मरण लिखे हैं | चाहे वे युद्ध की कहानियाँ हों, नेतृत्व के सिद्धांत हों या राष्ट्रीय सुरक्षा के अनुभव।जनरल एम.एम. नरवणे की फोर स्टार डेस्टिनी अप्रकाशित किताब के प्रचार के लिए बना कवर संसद के अंदर बाहर घुमाया जा रहा है |यह पांडुलिपि अभी तक आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है और रक्षा मंत्रालय की समीक्षा में लंबित है। बताते हैं कि किताब में नरवणे ने भारतीय सीमा पर तनाव (विशेषकर एल ए सी और गलवान घाटी), अग्निपथ भर्ती योजना, तथा सैन्य और राजनीतिक निर्णयों के बारे में अपने अनुभव साझा किए हैं।राहुल गांधी ने संसद में इस अप्रकाशित किताब के कुछ अंशों को उद्धृत किया, जिससे सरकार ने आपत्ति जताई कि ऐसा करना नियमों के खिलाफ है, क्योंकि यह प्रकाशित नहीं हुई है और सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील जानकारी हो सकती है।सरकार का तर्क है कि रिटायर्ड अधिकारी भी संवेदनशील जानकारी प्रकाशित नहीं कर सकते — नियम सेवा समाप्ति के बाद भी लागू होते हैं। विपक्ष कह रहा है कि पारदर्शिता व रक्षा नीति पर चर्चा के लिए यह महत्वपूर्ण है। स्वयं नरवणे ने कहा है कि उन्होंने किताब लिखना समाप्त किया, तथा पब्लिशर और रक्षा मंत्रालय के बीच प्रक्रिया चल रही है। वे स्वयं समीक्षा प्रक्रिया पर नियंत्रण नहीं रखते। यह भी स्वीकारा जाना चाहिए कि कई नेताओं , अधिकारियों या सेनाधिकारियों को देशी विदेशी प्रकाशक स्वयं लिखने या अपने अनुभव संस्मरण किसी को लिखवाकर का आग्रह करते हैं | यानी घोस्ट राइटर ( जिनका नाम नहीं लिखना दायित्व ) भी हैं , उन्हें भी प्रकाशक अच्छा पैसा देते हैं | खेल यहीं संभव है | पर्दे के पीछे भी कोई फंड करने वाला और विवादास्पद बातें लिखवाने छपवाने और फिर विवाद उछालने वाली अदृश्य ताकतें भी होती हैं |
भारतीय सेना से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारी, चाहे वे प्रधान सेनाध्यक्ष रहे हों या वरिष्ठ कमांडर, उन्होंने युद्धकथाएँ व नेतृत्व पर आधारित पुस्तकें लिखी या किसीको अनुभव सुनाकर लिखी छपी हैं | जैसे जनरल वी पी मलिक की किताब 1999 के कारगिल युद्ध का विवरण प्रदान करती है।लेफ्टिनेंट जनरल के जे एस ढिल्लों ने पाकिस्तान के अंदर घुसकर मारने के हाल के ऑपेरशन पर लिखा है |जीवन रोमांच और संघर्ष पर आधारित अन्य पुस्तकें भी उपलब्ध हैं, जो सैनिकों के व्यक्तिगत अनुभव को उजागर करती हैं।इन किताबों में आमतौर पर सैन्य निर्णय, युद्धक रणनीति, नेतृत्व के कठिन निर्णय और सैनिकों के संघर्ष का वर्णन मिलता है।भारतीय वायु सेना (IAF) के शीर्ष नेतृत्व ने भी अपने अनुभव साझा किए हैं | वायु सेनाध्यक्ष पी सी लाल सहित कुछ अधिकारियों के नाम पर वायु सेना इतिहास और व्यक्तिगत अभियानों पर आधारित कई पुस्तकें हैं , जो वरिष्ठ पायलटों और कमांडरों की जीवनी, युद्ध स्मरण और नेतृत्व मूल्य पर आधारित लेखन मौजूद हैं। भारतीय नौसेना के शीर्ष कमांडरों के संस्मरणों की थोड़ी कमी रही है, लेकिन नौसेना के ऑपरेशंस, समुद्री रणनीति आदि पर कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं |भारत के खुफिया समुदाय की कार्यप्रणाली और अनुभव पर भी कुछ उल्लेखनीय लेखन मौजूद हैं — वे संस्मरण की तरह तो कम लेकिन विश्लेषणात्मक और जीवनी आधारित हैं | भारत के पूर्व रॉ प्रमुख ए एस दुलत और पाकिस्तान की आई एस आई के प्रमुख असद दुर्रानी के बीच संवाद आधारित एक किताब बहुत विवादों में रही है। यह दक्षिण एशिया की खुफिया चुनौतियों को समझने का एक दुर्लभ संसाधन है। रॉ के पहले प्रमुख यहआर एन काव की जीवनी / विष्लेषणात्मक पुस्तक में रॉ की सफलता व चुनौतियों का वर्णन है।बी . रामन की एक पुस्तक भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के शुरुआती वर्ष में कार्यरत प्रतिभाशाली ऑपरेटरों के अनुभवों को साझा करती है। इन पुस्तकों में खुफिया कार्यप्रणाली, निर्णय लेने की प्रक्रिया और रणनीतिक संघर्ष का विवरण मिलता है — यह भारतीय सेक्रेट सर्विसेज की दुनिया को समझने के लिए दुर्लभ स्रोत हैं।
मुद्दा यह है कि सेना और खुफिया सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों पर क्लासीफाइड (सेंसेटिव) जानकारियाँ प्रकाशित करने पर कड़े नियम होते हैं।सेवा के दौरान और कई मामलों में सेवा के बाद भी ये नियम लागू होते हैं ताकि शत्रु राष्ट्रों को संवेदनशील जानकारी न मिल सके।सैन्य अनुभव प्रकाशित करने से पहले रक्षा मंत्रालय व संबंधित एजेंसी से अनुमोदन जरूरी होता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो प्रकाशन में देरी या रोक दिया जाता है , जैसानरवणे के किताब के मामले में हुआ है। इस किताब में अग्निपथ अग्नि वीर योजना, सीमा पर तनाव जैसे संवेदनशील विषय व सैन्य निर्णयों पर अधिक विस्तृत जानकारी होने की संभावना।लिखित अंशों को बिना अनुमोदन के सार्वजनिक रूप से उद्धृत करना संसद के नियमों के विरुद्ध माना गया |भारतीय सेना, वायु सेना, नौसेना और खुफिया संगठन के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा लिखी गई किताबें न केवल सैन्य इतिहास और नेतृत्व के मूल्यों को उजागर करती हैं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा नीति और लोकतांत्रिक बहसों को भी प्रभावित करती हैं। लेखन की स्वतंत्रता आवश्यक है, लेकिन सुरक्षा प्राथमिकताओं, गोपनीयता और सरकारी नियमों को ध्यान में रखना भी जरूरी है।
भारतीय सैन्य इतिहास में एडमिरल विष्णु भागवत ( नौसेना प्रमुख – 1996 से 1998) का नाम एक ऐसे सेनाध्यक्ष के रूप में दर्ज है, जिन्हें खुले असंतोष और सत्ता से टकराव के कारण पद से हटाया गया।सरकार ने नौसेना में वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति और पदोन्नति से जुड़े कुछ निर्णय लिए एडमिरल भागवत ने इन निर्णयों पर खुले तौर पर आपत्ति जताई |उन्होंने इसे नौसेना की पेशेवर स्वायत्तता में हस्तक्षेप बताया |सरकार ने इसे अनुशासनहीनता और आदेशों की अवहेलना माना।
26 दिसंबर 1998 को एडमिरल विष्णु भागवत को पद से बर्खास्त कर दिया गया।यह स्वतंत्र भारत में पहला और एकमात्र मामला है जब किसी सेवारत सेनाध्यक्ष को इस तरह हटाया गया | यह घटना बताती है किसशस्त्र बलों में असहमति की सीमा कहाँ समाप्त होती है |लेकिन यह मामला आज भी एक चेतावनी की तरह देखा जाता है।