केरल सरकार को क्यों खटक रहे हैं राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान

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केरल सरकार को क्यों खटक रहे हैं राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान

सुदेश गौड़
केरल में मुख्यमंत्री पिनारई विजयन और राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान के बीच आखिर तलवारें क्यों खिंची हुई हैं। सोमवार को राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने दो घंटे तक पत्रकारों से बात कर बताया ही नहीं बल्कि सुबूत भी दिए कि किस तरह तीन साल पहले कुन्नूर में हुई इतिहास कांग्रेस में मुख्यमंत्री विजयन की शह पर उनके चहेतों ने उनपर हमले की कोशिश तक की थी। विवाद की असल वजह है केरल में मंत्रियों के निजी स्टाफ को पेंशन देने की नीति जिस पर अमल करके माकपा कार्यकर्ता अबतक मलाई काट रहे थे।पर राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने इस नीति पर सवाल जो खड़ा कर दिया तो वे सबसे ज्यादा खटकने लग गए। उलटवार करते हुए केरल के मुख्यमंत्री ने तो राज्यपाल पद के औचित्य पर ही सवाल खड़ा कर के संवैधानिक संकट के हालात पैदा कर दिए हैं।

इस विवादास्पद नीति पर केरल हाई कोर्ट सुनवाई भी कर रहा है। हाई कोर्ट में दायर याचिका में बताया गया है कि सीपीएम की अगुवाई वाली लेफ्ट फ्रंट सरकार ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को फायदा पहुंचाने के लिए सरकारी खजाने से पैसा देने की नीति बना रखी है। इसके लिए किसी भी पार्टी कार्यकर्ता को मुख्यमंत्री, मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष व उपाध्यक्ष, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य सचेतक का निजी कर्मचारी नियुक्त किया जाता है। यहां तक तो सब ठीक है पर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि देश में एकमात्र राज्य केरल ही है जहां सरकारी नीति के तहत वह कर्मचारी 2 साल की नौकरी के बाद पेंशन का अधिकारी हो जाता है। इसलिए 2 साल के बाद उस कार्यकर्ता को हटा कर उसकी जगह किसी अन्य पार्टी कैडर को नियुक्त कर दिया जाता है ताकि वह भी पेंशन का हकदार बन जाए। इस तरह सरकार के एक कार्यकाल में बड़ी संख्या में पार्टी कैडर जीवन पर्यंत पेंशन के हकदार हो जाते हैं। इस तरह बड़ी संख्या में सीपीएम कार्यकर्ताओं को सरकारी पेंशन देकर पार्टी के लिए काम कराया जा रहा है।

ये है मलाई काटने की योजना
अगर कोई 18 साल की आयु में पार्टी कैडर का व्यक्ति निजी स्टाफ में शामिल किया जाता है, तो वह 21 साल की उम्र तक सेवानिवृत्त हो सकता है और मृत्यु पर्यंत पेंशन प्राप्त कर सकता है। अभी ऐसे कर्मचारियों के लिए न्यूनतम पेंशन 3,550 रुपए प्रति माह है जो समय समय पर पुनरीक्षित भी होती है। वर्तमान पुनरीक्षण के पहले यह राशि 2,400 रुपए प्रति माह हुआ करती थी। इसके अलावा, ऐसे पूर्व निजी कर्मचारी 7% महंगाई भत्ते और ग्रेच्युटी के भी पात्र होते हैं।

केरल में मंत्रियों के निजी कर्मचारियों के लिए पेंशन 1994 में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार द्वारा 1982 से पूर्वव्यापी प्रभाव से पेश की गई थी। राज्य में प्रत्येक मंत्री व्यक्तिगत स्टाफ के रूप में 30 सदस्यों के निजी स्टाफ के लिए पात्रता थी जो अब घटा कर 25 कर दी गई है।आमतौर पर सरकारी कर्मचारियों को पेंशन पाने के लिए कम से कम 10 साल की सेवा करनी होती है।
एक अनुमान के अनुसार मंत्रियों के कम से कम 1250 पूर्व निजी कर्मचारियों को सरकार से पेंशन और अन्य लाभ मिल रहे हैं। इसके लिए राज्य के खजाने से करीब 8 से 10 करोड़ रुपये निकाले जा रहे हैं। सरकारी रिकॉर्ड से पता चलता है कि इस राशि का कम से कम पांच गुना हर साल निजी कर्मचारियों के वेतन और खर्च के रूप में खर्च किया जाता है, जो वर्तमान में रोल पर हैं।
पिछले कई दशकों से कांग्रेस नीत यूडीएफ और लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट दोनों ही बेबाकी से इस नीति का फायदा अपने कैडर तक पहुंचा रहे हैं। एलडीएफ ने हर ढाई साल के बाद स्टाफ बदलने की नई नीति का सहारा लिया ताकि पूर्व और नए दोनों कर्मचारियों को पेंशन और अन्य परिलब्धियां मिल सकें।

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी थी। उनका कहना है कि “मैं इस लूट का पक्षकार नहीं हो सकता। राज्य इस तरह के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को फंड कैसे दे सकता है? मुझे बताया गया था कि कुछ मंत्रियों के पास 20-25 निजी कर्मचारी हैं और उन्हें दो साल बाद स्थानांतरित कर दिया जाएगा ताकि एक नए बैच को शामिल किया जा सके और दोनों को सभी विशेषाधिकार प्राप्त होंगे। यह अवैध और असंवैधानिक है,” उन्होंने कहा, उन्होंने इस “अजीब व्यवस्था” के बारे में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक से परामर्श किया। राज्यपाल ने कहा कि यह उस समय हो रहा था जब लोक सेवा आयोग की परीक्षा पास करने वाले हजारों नौकरी के इच्छुक अपनी नियुक्ति में देरी का विरोध कर रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी की थी तल्ख टिप्पणी
सर्वोच्च न्यायालय ने 14 मार्च 2022 को केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (केएसआरटीसी) को प्रदेश के स्वामित्व वाली तेल विपणन कंपनियों द्वारा बेचे जाने वाले थोक डीजल की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ याचिका दायर करने के लिए फटकार लगाई थी। साथ ही जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने पूछा कि कैसे राज्य मंत्रियों द्वारा दो साल के लिए नियोजित कर्मचारियों के लिए आजीवन पेंशन का भुगतान कर रहा है? पीठ ने केरल की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वी गिरी से कहा, आप एकमात्र राज्य हैं जहां लोगों को दो साल के लिए नियुक्त किया जाता है और उन्हें आजीवन पेंशन दी जाती है। राज्य को कहिये कि अगर वह ऐसा कर सकती है तो यह वृद्धि वापस क्यों नहीं ले सकती। राज्य के पास बहुत पैसा है।

हाईकोर्ट में लंबित है याचिका
केरल हाईकोर्ट में वह याचिका लंबित है जिसमें राज्य में मंत्रियों के लिए निजी कर्मचारियों की नियुक्ति के तरीके और सिर्फ दो साल से अधिक की सेवा करने वाले इन कर्मचारियों को पेंशन लाभ की व्यवस्था को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस मणिकुमार और जस्टिस शाजी पी चाली की पीठ ने इस मामले में केरल सरकार के साथ-साथ मुख्यमंत्री पी विजयन, विपक्ष के नेता वीडी सतीशन और मुख्य सचेतक एम जयराज के निजी सचिवों को नोटिस जारी किया हुआ है।