
नरोत्तम मिश्रा का पुनर्वास क्यों नहीं?
राकेश अचल
मप्र के पू्व गृहमंत्री पिछले 27 महिने से बेरोजगार हैं लेकिन उनके राजनीतिक पुनर्वास को लेकर भाजपा हाईकमान बहुत ज्यादा गंभीर नजर नहीं आ रहा. पार्टी हाईकमान ने पूर्व में मंत्री रहे जयभान सिंह पवैया को वित्त आयोग का अध्यक्ष नामजद कर मिश्रा और उनके समर्थकों को बुरी तरह निराश किया है.
डा नरोत्तम मिश्रा एक जमाने में मप्र सरकार के संकटमोचक रहे हैं. वे भाजपा के टिनोपाल नेता माने जाते हैं लेकिन वे एक विधानसभा चुनाव क्या हारे पार्टी ने उन्होंने बर्फ मे लगा दिया है. न संगठन में कोई जिम्मेदारी और न मनोनयन में कोई प्राथमिकता. जबकि नरोत्तम मिश्रा ने भी जयभान सिंह पवैया की ही तरह सिंधिया परिवार के सामने चुनाव लडकर अपनी शहादत दी है.
पवैया को सिंधिया के विरोध का प्रतिसाद मिल गया लेकिन नरोत्तम मिश्रा प्रतिक्षारत ही रहे. मिश्रा ने पिछले दिनों पार्टी की नजरो में चढने के लिए डबरा में भव्य नवगृह मंदिर बनवा कर अपनी उपस्थित दर्ज कराने का नाकाम प्रयास किया. मिश्रा दतिया के विकास पुरुष रह चुके हैं.विकास के नाम पर जितनी उपलब्धियां नरोत्तम के खाते में दर्ज हैं उतनी पवैया के खाते में नहीं हैं. दोनोंं में एक ही समानता है कि दोनों अपने समर्थको के बीच में दादा के रूप में लोकप्रिय हैं.
भाजपा में पवैया को भाव देने और नरोत्तम की अनदेखी करने को दूसरी नजर से भी देखा जा रहा है. ऐसी धारणा विकसित हो चुकी है कि पिछले 23 साल में भाजपा ने जानबूझकर ब्राह्मण नेतृत्व को पीछे धकेला है. स्वर्गीय लक्ष्मी कांत शर्मा, अनूप मिश्रा, गोपाल भार्गव और अब नरोत्तम मिश्रा को ठिकाने लगाया जा रहा है. हालांकि मैं ऐसा नहीं मानता क्योंकि भाजपा ने राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे बडे राज्यों की कमान ब्राम्हणों को ही सौंप रखी है.
आपको याद रखना होगा कि 2003 से सत्ता में आयी भाजपा ने अभी तक किसी भी ब्राह्मण को मुख्यमंत्री नहीं बनाया है. जबकि कांग्रेस के समय में बारी-बारी से सभी जातियों के नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया गया था. भाजपा ने एक बार कैलाश जोशी को कुछ समय के लिए मुख्यमंत्री पद सौंपा था जो अपवाद है..
बात चुनाव हार चुके सवर्ण नेताओं के पुनर्वास की चल रही थी. ग्वालियर में अनूप मिश्रा और नरोत्तम मिश्रा बेपटरी हो चुके हैं. चंबल से भिंड में राकेश शुक्ला मंत्री होकर भी ब्राह्मण समाज के एक छत्र नेता नही बन पाए हैं.संगठन के मौन सेवक वेदप्रकाश शर्मा को महत्व नहीं मिला है. मजे की बात ये है कि अनूप और नरोत्तम दोनोंं केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रिय हैं लेकिन वे भी इन दोनों की मदद नही कर पा रहे, या नहीं कर रहे.
इस समय प्रदेश भाजपा की सियासत अगडों-पिछडों में बंटी दिखाई दे रही है. ब्राह्मण एक तरफ, राजपूत एक तरफ और ओबीसी एक तरफ. अल्पसंख्यक तो बेचारे कहीं नजर ही नहीं आते. ब्राह्मण न राजनीति में अपना वजूद बचा पा रहे हैं और न नौकरशाही में. उन्हे मजबूरन किसी न किसी का पिछलग्गू बनना पड रहा है.
आने वाले दिनों में नरोत्तम मिश्रा और अनूप मिश्रा समेत तमाम ब्राह्मण भाजपा नेताओं को मोशा की भाजपा तवज्जो देगी या नहीं देगी, कहना कठिन है.लेकिन छटपटाहट बढ रही है. इसका संज्ञान न लिया गया तो 2028 की लडाई आसान नहीं होगी.मिश्रा की किस्मत ने अगर साथ दिया तो दतिया विधानसभा सीट मौजूदा विधायक राजेंद्र भारती को जेल भेजे जाने की वजह से खाली हो पकती है और मिश्रा वहाँ से एक बार फिर चुनाव लडने का प्रयत्न कर सकते हैं.





