
नए UGC कानून पर विवाद क्यों: स्वर्ण विरोध, बहुजन समर्थन और असली सत्ता संघर्ष का सवाल
New Delhi: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के प्रस्तावित नए कानून और रेगुलेशन को लेकर देश भर में तीखी बहस चल रही है। जहां एक ओर इसे उच्च शिक्षा में पारदर्शिता और समान अवसर की दिशा में कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर स्वर्ण वर्ग से जुड़े कई संगठन और समूह इसका खुलकर विरोध कर रहे हैं। इसी विवाद के बीच बहुजन चिंतक डॉ. ओम सुधा का बयान सामने आया है, जिसने बहस को नया सामाजिक और वैचारिक मोड़ दे दिया है।
डॉ. ओम सुधा ने कहा है कि “अब सबको समझ आ जाना चाहिए कि SC-ST-OBC का असली दुश्मन मुसलमान नहीं है।” यह टिप्पणी सीधे उस विमर्श को चुनौती देती है, जो वर्षों से सामाजिक टकराव को धार्मिक ध्रुवीकरण की दिशा में मोड़ता रहा है।
● नया UGC कानून है क्या
UGC द्वारा प्रस्तावित नए कानून और रेगुलेशन का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में शिकायत निवारण प्रणाली को सख्त करना, भेदभाव, उत्पीड़न और असमान व्यवहार पर कार्रवाई के अधिकार बढ़ाना, समता समिति और आंतरिक निगरानी तंत्र को मजबूत करना तथा शिक्षक और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करना बताया जा रहा है।
UGC का तर्क है कि यह कानून उन छात्रों और शिक्षकों को सुरक्षा देगा जो जाति, वर्ग या सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण भेदभाव का सामना करते हैं।
● स्वर्ण वर्ग का विरोध क्यों
स्वर्ण जातियों से जुड़े कई संगठन और शिक्षक समूह इस कानून का विरोध कर रहे हैं। उनके प्रमुख तर्क हैं कि नया कानून दोष सिद्ध होने से पहले दंड की व्यवस्था बनाता है, झूठी शिकायतों के आधार पर शिक्षकों और अधिकारियों को निलंबित किया जा सकता है, मेरिट और अकादमिक स्वतंत्रता पर खतरा पैदा होगा तथा सामान्य वर्ग को संरचनात्मक रूप से संदेह की नजर से देखा जाएगा।
आलोचकों का कहना है कि यह कानून शिक्षा व्यवस्था को भय के माहौल में ले जाएगा और शिक्षकों को स्वतंत्र निर्णय लेने से रोकेगा।
● बहुजन दृष्टिकोण क्या कहता है
डॉ. ओम सुधा और अन्य बहुजन चिंतकों का कहना है कि यह विरोध दरअसल सामाजिक सत्ता के खोने की बेचैनी है। उनका तर्क है कि देश की उच्च शिक्षा संस्थाओं पर दशकों से स्वर्ण वर्ग का वर्चस्व रहा है, SC-ST-OBC के छात्रों के अनुभवों को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया, भेदभाव की शिकायतों को अक्सर दबा दिया गया और नया कानून पहली बार संस्थागत शक्ति संतुलन को चुनौती देता है।
डॉ. ओम सुधा के अनुसार जब सत्ता और विशेषाधिकार पर सवाल उठते हैं, तब उसे धार्मिक या वैचारिक मुद्दों में बदलने की कोशिश की जाती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि SC-ST-OBC समाज का असली विरोधी कोई धर्म या समुदाय नहीं, बल्कि वह संरचना है जो उन्हें शिक्षा और सत्ता से दूर रखती आई है।
● धार्मिक बनाम सामाजिक विमर्श
बहुजन चिंतकों का मानना है कि वर्षों से सामाजिक असमानता के मुद्दों को हिंदू-मुसलमान, राष्ट्रवाद और संस्कृति जैसे विषयों में उलझाकर मूल सवालों से ध्यान हटाया गया।
UGC कानून पर स्वर्ण विरोध को वे उसी रणनीति की अगली कड़ी के रूप में देखते हैं, जहां समानता की कोशिश को षड्यंत्र बताकर रोकने का प्रयास किया जा रहा है।
● असली सवाल क्या है
यह विवाद केवल UGC कानून का नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या उच्च शिक्षा में सभी के लिए बराबरी होगी, क्या ऐतिहासिक रूप से वंचित समाज को संस्थागत सुरक्षा मिलेगी, क्या सत्ता और मेरिट की परिभाषा पर पुनर्विचार होगा या फिर पुरानी व्यवस्था नए नाम से चलती रहेगी।
● आगे क्या
UGC कानून अभी पूरी तरह लागू होने की प्रक्रिया में है और उस पर संशोधन की मांग भी उठ रही है। लेकिन इतना तय है कि इस कानून ने भारत की उच्च शिक्षा में छिपे सामाजिक संघर्ष को सतह पर ला दिया है।
यह बहस अब सिर्फ नीति की नहीं, बल्कि इस सवाल की बन गई है कि भारत का शिक्षा तंत्र किसके लिए और किसके नियंत्रण में रहेगा।





