Wildlife Transfer or Unequal Deal: भोपाल ने एक बाघ भेजा और करोड़ों पाए, इंदौर ने दर्जनों भेजे फिर भी खाली हाथ

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Wildlife Transfer or Unequal Deal: भोपाल ने एक बाघ भेजा और करोड़ों पाए, इंदौर ने दर्जनों भेजे फिर भी खाली हाथ

INDORE: मध्य प्रदेश के चिड़ियाघरों से गुजरात के जामनगर स्थित एक निजी रेस्क्यू और रिहैबिलिटेशन प्रोजेक्ट के लिए भेजे गए वन्य जीवों की अदला-बदली अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि एक ही राज्य के भीतर भोपाल और इंदौर जैसे दो प्रमुख शहरों के साथ वन्य जीव ट्रांसफर को लेकर अलग-अलग शर्तों पर सहमति बनी। जहां भोपाल से एक बाघ और एक तेंदुआ भेजे जाने के बाद वाहन और अन्य संसाधन तुरंत उपलब्ध कराए गए, वहीं इंदौर के चिड़ियाघर से बड़ी संख्या में बाघ, शेर और अन्य वन्य जीव भेजे जाने के बावजूद अब तक केवल भविष्य में पशु-पक्षी उपलब्ध कराने का आश्वासन ही दर्ज है। यही असमानता अब इस पूरे ट्रांसफर मॉडल की पारदर्शिता और समानता पर सवाल खड़े कर रही है।

 

● भोपाल और इंदौर का सौदा, जमीन-आसमान का फर्क

भोपाल के वन विहार राष्ट्रीय उद्यान से एक बाघ और एक तेंदुआ गुजरात भेजा गया। इसके बदले वन विभाग ने करीब डेढ़ करोड़ रुपए की चार इसुजु गाड़ियां, एक एम्बुलेंस और मेडिकल उपकरण प्राप्त किए। वहीं दूसरी ओर इंदौर के कमला नेहरू प्राणी संग्रहालय से छह बाघ, पांच शेर, आठ घड़ियाल और लोमड़ी का एक जोड़ा भेजा गया, लेकिन बदले में कोई भौतिक संसाधन नहीं मिला।

● इंदौर को क्या मिला, सिर्फ आश्वासन

इंदौर चिड़ियाघर को बदले में लगभग दो से सवा दो करोड़ रुपए कीमत के विदेशी पशु-पक्षी भेजने का वादा किया गया। इसमें 60 प्रजातियों के 150 पक्षी, एनाकोंडा, पाइथन और कुछ दुर्लभ प्रजातियों के बंदर व तोते शामिल बताए गए। सवाल यह है कि जब भोपाल को तुरंत गाड़ियां और उपकरण मिले, तो इंदौर को सिर्फ भविष्य के वादों पर क्यों छोड़ा गया।

● अफसरों को भनक तक नहीं

मामले ने तब और तूल पकड़ा जब यह सामने आया कि प्रदेश स्तर के वन्य प्राणी प्रबंधन से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों को इंदौर से इतने बड़े पैमाने पर जानवर भेजे जाने की जानकारी तक नहीं थी। यह स्थिति दर्शाती है कि निर्णय किस स्तर पर और किस प्रक्रिया से लिए गए, इस पर खुद विभाग के भीतर स्पष्टता नहीं है।

● निजी प्रोजेक्ट के लिए सरकारी वन्य संपदा

जामनगर में बन रहा यह रेस्क्यू और रिहैबिलिटेशन सेंटर देश के सबसे बड़े निजी वन्य जीव प्रोजेक्ट्स में गिना जा रहा है। इसके लिए देशभर के चिड़ियाघरों और रेस्क्यू सेंटरों से जानवर जुटाए गए। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकारी चिड़ियाघरों की संपदा को निजी परियोजना के लिए इस तरह स्थानांतरित करना केवल प्रशासनिक निर्णय भर था।

● रेस्क्यू या स्थायी ट्रांसफर

कागजों में इसे रिहैबिलिटेशन बताया गया, लेकिन जानवरों को स्थायी रूप से एक निजी परिसर में शिफ्ट किया गया। अगर उद्देश्य इलाज और पुनर्वास था, तो उन्हें वापस उनके मूल चिड़ियाघरों में लौटाने की कोई समय-सीमा तय क्यों नहीं की गई।

● सुप्रीम कोर्ट की अनुमति, लेकिन सवाल बाकी

इस पूरी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट की अनुमति का कवच जरूर मिला, लेकिन अदालत की मंजूरी से नैतिक और प्रशासनिक सवाल खत्म नहीं हो जाते। अनुमति उन तथ्यों और आश्वासनों पर आधारित होती है जो पेश किए जाते हैं। अगर जमीनी स्तर पर सौदे असंतुलित रहे और वादे पूरे नहीं हुए, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है।

● इंदौर के साथ ऐसा क्यों हुआ

सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक ही राज्य में भोपाल और इंदौर के साथ दो अलग-अलग पैमाने क्यों अपनाए गए। अगर वन्य जीव भेजना मजबूरी थी, तो अदला-बदली में पारदर्शिता और समानता क्यों नहीं रखी गई।

● यह मामला क्या उजागर करता है

यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि जब बड़े प्रोजेक्ट्स के नाम पर फैसले लिए जाते हैं और सार्वजनिक बहस नहीं होती, तो नुकसान अक्सर सार्वजनिक संपदा का होता है। वन्य जीव किसी संस्था या व्यक्ति की नहीं, बल्कि समाज की साझा धरोहर हैं।

● अब भी जवाब बाकी

क्या इंदौर को वादे के मुताबिक पशु-पक्षी मिलेंगे। क्या भोपाल और इंदौर के बीच हुए सौदों का कोई लिखित, पारदर्शी मूल्यांकन हुआ। और सबसे अहम, इस असंतुलित अदला-बदली की जिम्मेदारी किसकी है।