
जीरो विजिबिलिटी-बस घना, दूधिया,ठंडा कोहरा: जब हेडलाइट हार गई लेकिन हौंसला जीत गया..!!
संजीव शर्मा की खास रिपोर्ट
रात के करीब 11.30 बजे..विमान की खिड़की से बाहर कुछ नजर नहीं आ रहा। आमतौर पर इतनी ऊंचाई से चंडीगढ़ शहर की लाइट दिखने लगती हैं। लगा, शायद कोहरा होगा। कई मिनटों की मशक्कत के बाद विमान उतरा लेकिन असली चिंता यहीं से शुरू हुई क्योंकि कोहरा इतना घना था कि तमाम प्रबंध के बाद भी पायलट विमान को सही जगह पर नहीं उतार पाया था।
ग्राउंड स्टाफ ने किसी तरह जहाज को सीधा कराकर सुरक्षित जगह तक पहुंचाया लेकिन विजिबिलिटी ज़ीरो थी यानि कुछ भी नहीं दिख रहा था। शून्य दर्शनीयता की समस्या इतनी विकराल थी कि कड़ाके की ठंड में यात्रियों को हवाई अड्डे तक पहुंचाने के लिए एयर ब्रिज बनाना तक मुश्किल था। इसलिए यात्रियों को जहाज में ही आधे घंटे से अधिक समय तक कैद रहना पड़ा। फिर, लंबे विचार विमर्श के बाद बसों का इंतजाम किया गया..वे भी किसी तरह सरकते हुए विमान तक आई, यात्री ठिठुरते हुए और अंधेरे में किसी तरह बस तक पहुंचे और बसें आहिस्ता आहिस्ता हवाई अड्डे तक।
पायलट ने तो हिम्मत दिखाकर हमें हवाई अड्डे तक लाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली लेकिन समस्या अब शुरू हुई। हवाई अड्डे से चंडीगढ़ में होटल तक पहुंचना वर्ल्ड कप जीतने जैसा मामला था क्योंकि हवाई अड्डे के बाहर सड़क तो दूर गेट भी नहीं दिख रहा था। आधी रात, घनघोर कोहरा, ठिठुरन बढ़ाती सर्दी और बाहर भटक जाने का डर..टैक्सी कहां मिलती। ओला उबर वाले किराया तो मनचाहा दिखा रहे थे लेकिन आने का नाम नहीं ले रहे थे। मौके का फायदा उठाकर गिने चुने टैक्सी वाले पांच गुना किराया मांग रहे थे।
किसी तरह, मन मारकर एवं पॉकेट से समझौता कर टैक्सी की और हवाई अड्डे से चल पड़े। हवाई अड्डे से हमारे रुकने के ठिकाने तक करीब 18 किमी की दूरी असल नाइटमेयर साबित हुई क्योंकि न सड़क दिख रही थी, न चौराहे, न मोड़ और न ही दिल की धड़कन बढ़ाने वाले ऑटो, ट्रैक्टर जैसे वाहन। हमारी कार की हेडलाइट तो जल रही थी, पर रोशनी जमीन से दो-तीन फीट आगे नहीं जा पा रही। सामने सिर्फ़ सफ़ेदी थी.. यानि घना, दूधिया, ठंडा कोहरा। ऐसा कोहरा जो न सिर्फ़ आँखों को अंधा करता है, बल्कि मन को भी भयभीत कर देता है।
जीरो विजिबिलिटी में भी जिंदगी रुकती नहीं, बस बहुत धीमी और बहुत खतरनाक हो जाती है। हर कुछ सेकंड में ब्रेक और एक्सीलरेटर के बीच का फैसला जिंदगी-मौत का फैसला बन जाता है क्योंकि क्या वो सामने आती धुंधली रोशनी ट्रक है? ट्रैक्टर है? या सिर्फ़ किसी ने गाड़ी पार्क करके लाइट जला दी है? इस तरह, क्या वो सड़क का किनारा है या नाली है? इन सारे सवालों के बीच सबसे डरावनी चिंता होती है कि “अगर मैं रुक गया तो पीछे से कोई टकरा तो नहीं जाएगा? बस, हर आहट पर हॉर्न बजाना ही एक सुरक्षित विकल्प लगता है। इंडिकेटर अपना वजूद खो देते हैं। इस दौरान बस एक ही चीज़ काम आती है – इंसान की पूरी ताकत से केंद्रित ध्यान। एक सेकंड की लापरवाही या एक पल की जल्दबाजी – सब कुछ खत्म करने के लिए काफी है। हम भी चलते रहे क्योंकि मजबूरी थी..एयरपोर्ट पर रात भर तो बैठ नहीं सकते और अगले दिन कामकाज की जिम्मेदारियां थी ।
अगले दिन साथियों से..”अरे भाई, कोहरे में भी आ गए?.. वाह!” ये तारीफ़ सुनकर अच्छा लगता है, पर वो तारीफ़ करने वाला शायद नहीं जानता कि यह वाह सुनने के लिए कितनी बार दिल धक-धक किया था। आप भी जानते हैं और मानते भी होंगे कि कल भी कोहरा होगा तब भी हमें जाना ही पड़ेगा..वही मजबूरी क्योंकि जिंदगी कोहरे से नहीं पूछती कि आज विजिबिलिटी कितनी है। वो बस कहती है – चलते रहो, चलना ही जिंदगी है। बाकी ऊपरवाला सब संभाल लेगा ।





