Sunday, April 21, 2019
मैं नफरत भी लिखना चाहू तो प्यार लिखा जाता है

मैं नफरत भी लिखना चाहू तो प्यार लिखा जाता है

मीडियावाला.इन।

नफरत....ये शब्द किसने बनाया। किसने बनाया, बेचारा जैसा शब्द। याद है, पापाजी को माथे पर आए बल भी पसन्द ना थे, ना ही खुद को कभी बेचारा कहना। कुछ ऐसी ही मैं होती जा रही हूं, हर गुजरते साल के साथ माँ-पापा जी की परछाई। सच कहती हूं, खुशी से चहकती जिंदगी में गम के गहरे घाव भी हैं। बस उनको नासूर ना बनने दिया। सूरज की हर किरण ने मुस्कान को थोड़ा और बड़ा किया। आज एक नया सवेरा फिर देखा लेकिन किसी के चेहरे पर। गोवा के बीच पर, एक बच्ची ...वो कुरकरे और मूंगफली बेच रही थी। एक बार मना किया, दूसरी बार भी, तीसरी बार उससे बात करने के मोह ने कुछ खरीदने को उत्सुक कर दिया।

मूंगफली ली....वो कुरकुरे का इसरार करती रही। राजीव ने मजाक में कहा, जैसा दीदी कहें। वरना मारेंगी मुझे। वो पलट कर बोली, दीदी ढिशुम करके मुक्के मारना। मैं पल भर रुकी अनायास मुँह से निकला, माँ भी मारती है पापा को। वो मासूम बोली, नहीं पापा मारते हैं माँ को, मुझे लेकिन आप मुक्का ही मारना। मैं भी मारूंगी बड़े होकर। वो मासूम मुझे सुकून दे गई, बड़ी होकर वो माँ की तरह मार ना खाएगी। वो स्कूल जाती है या नहीं.... ना पता लेकिन जीवन की पाठशाला में उत्साह के साथ जीना सीख रही है 'सकू'। वो बीच में सामान बेचकर खुश है, इंग्लिश लोग उसे आइसक्रीम खिला देते हैं। वहीं शाहनवाज जैसे चायवाले, मुझे मुस्कुराते हुए इलायची चाय। जी, ये एक चायवाले हैं, जो बड़े इसरार से मुझे अपनी चाय के गुण बता रहे थे...कप हाथ में लेते ही मैंने कहा: इलायची की खुशबू अच्छी आ रही है, वो 20 की चाय 10 में देने का इसरार करता है। कहता है , दीदी आप मुस्कुरा कर चाय पी रहे हो। यही काफी है, मैं किच-किच से बचता हूं, आप आज की पहली कस्टम हो, बोनी कर रही हो । मैं 20 का नोट भी मनुहार करके दे रही हूं। मन अंदर ही अंदर नफरत का जहर फैलाने वाले को कोस रहा है। पेट के लिए एक बच्ची खाने का सामान बेच रही है तो शहनवाज चाय। और कुछ भरे पेट के लोग हैं जो नफरत बेच रहे हैं। सच ये इन लोगों की मासूमियत और नेकनियत है कि मैं नफरत भी लिखना चाहू तो वो प्यार हो जाता है। आमीन।

 

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श्रुति अग्रवाल

कई बार जीवन में ऐसे पल आते हैं जो सदियों तक किस्से के रूप में याद रहते हैं... उन्हीं किस्सों की किस्सागोई में गुम श्रुति अग्रवाल पत्रकारिता का चिरपरिचित चेहरा है। वे लम्बे समय तक राजस्थान पत्रिका और सहारा समय में पत्रकार रही है।

ट्वेल्व पाइंट ब्लॉग संचालित करते हुए श्रुति ने कई अनछुए पहलुओं पर कलम चलायी है।