Wednesday, December 12, 2018
दिग्विजय सिंह ने वो पेनड्राईव सौंपा जो सीबीआई जांच में रह गया

दिग्विजय सिंह ने वो पेनड्राईव सौंपा जो सीबीआई जांच में रह गया

मीडियावाला.इन। इदौर । पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने सितंबर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की परेशानी बढ़ाने का जो दावा किया था। उसकी शुरुआत व्यापम मामले में आज दिग्विजय सिंह द्वारा विशेष अदालत में 27हजार पन्नों की चार्जशीट प्रस्तुत करने से मानी जा सकती है।न्यायालय ने आगामी 22 सितंबर 2018 की तिथि नियत करते हुए दिग्विजय सिंह को न्यायालय में उपस्थित होकर अपने बयान दर्ज करवाने के लिये कहा है। आज गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में डंपर कांड को लेकर न्यायमूर्ति सीकरी और अशोक भूषण की खंडपीठ में सुनवाई भी होना है।कांग्रेस से जुड़े सूत्रों का दावा है कि शिवराज सरकार के घोटालों की सूची में हाल ही में जुड़े ई टेंडरिंग घोटाले को लेकर भी मामला अदालत में ले जा रहे हैं।

पेन ड्राईव में हैं 27 हजार पन्ने: 

 राज्यसभा सांसद और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह वरिष्ठ अधिवक्ता वैभव श्रीवास्तव (दिल्ली) और भोपाल के अजय गुप्ता, रवि पाटीदार  के माध्यम से व्यापम मामलों की जांच के लिए गठित विशेष अदालत में 27 हजार पन्नों की जानकारी वाला वह पेन ड्राईव भी सौंपा है, जो सीबीआई जांचमें शामिल नहीं किया जा सका था और तब क्लीनचिट मिलने के साथ ही यह प्रचारित हो गया था कि पेन ड्राईव में वो सारे नाम नहीं हैं जिनका दुष्प्रचार दिग्विजय सिंह करते रहे हैं।अब चूंकि यह पेन ड्राईव दस्तावेज के साथ सबूत के रूप में कोर्ट में सौंपा गया है तो इन 27 हजार पन्नों की जांच में सामने आएगा कि दिग्विजय सिंह जिस तरह पहले दिन से मुख्यमंत्री और अन्य को बदनाम कर रहे हैं वाकई उन सब के नाम हैं भी या नहीं।

पूर्व मुख्यमंत्री सिंह द्वारा विधायकों-सांसदों के व्यापम मामलों के लिये भोपाल में गठित विशेष न्यायालय के न्यायाधीश सुरेश सिंह के समक्ष एक परिवाद प्रस्तुत किया गया जिसमें उन्होने 27000 पन्नों की चार्जशीट प्रस्तुत की है। इसमें आरोप लगाया है कि नितिन महेन्द्रा के कम्प्यूटर से प्राप्त मूल हार्ड डिस्क में इन्दौर के पुलिस अधिकारियों- तत्कालीन आईजी, एएसपी क्राइम ब्रांच आदि ने मुख्यमंत्री चौहान एवं अन्य बड़े भाजपा नेताओं को बचाने के लिये हार्ड डिस्क से प्राप्त एक्सेल शीट में रद्दोबदल किया और उसमें उल्लेखित सीएम के नाम एवं अन्य नामों को हटाया। 

परिवाद में यह भी कहा गया है कि ट्रूथ लेब की रिपोर्ट सीबीआई गलत साबित नहीं कर सकी है। ट्रूथ लेब की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि एक्सेल शीट में छेड़छा़ड़ की गई है और हार्ड डिस्क से 18 जुलाई 2013 को जो फाइल रिकवर हुई थी उस फाइल की एक्सेल शीट में सीएम लिखा हुआ था जो बाद में हटाया गया है।परिवाद में कहा है कि एसटीएफ और सीबीआई द्वारा उपलब्ध प्रमाणों की अनदेखी करते हुये संबंधितों को आरोपी नहीं बनाया गया है, जिसकी न्यायिक जाॅंच हेतु यह परिवाद प्रस्तुत किया गया है।

इन सब के नाम लिए हैं दिग्विजय सिंह ने 

व्यापम कांड की एक्सेल शीट में फेरबदल करने पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती, इन्दौर के पुलिस अधिकारियों में तत्कालीन आईजी विपिन माहेश्वरी, क्राइम ब्रांच इन्दौर के एएसपी दिलीप सोनी एवं अन्य  पुलिस अधिकारियों के खिलाफ के नाम शामिल हैं। 

वयापमं में इस तरह हुई एक के बाद एक गड़बड़ियां 

व्यापमं के तहत प्रवेश परीक्षाओं में गड़बड़ियों की शुरुआत 1990 के दशक से ही शुरू हो चुकी थीं।

पहली एफआईआर साल 2000 में छतरपुर जिले में दर्ज हुई। 2004 में खंडवा में 7 केस दर्ज हुए।

वर्ष 2009 तक एक भी बड़ा मामला सतह पर नहीं आया, जबकि लेनदेन का खेल जारी था।

2009 में पीएमटी परीक्षा में गड़बड़ी के आरोप लगे, जो वाकई में इतने गंभीर थे कि सरकार ने जांच कमेटी बनायी ।100 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं।

2012 में एसटीएफ का गठन किया गया। जिसने 2013 में बड़े नामों के होने का जिक्र किया लेकिन, खुलासा नहीं किया।

पहला नाम पूर्व शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा का आया। उनके साथ 100 से ज्यादा नाम दर्ज हुए।

व्यापमं में तैयार की जा रही चार्जशीट में सिर्फ नेताओं के नहीं, बल्कि बिचौलियों, छात्रों, पुलिसकर्मियों, अभिभावकों के भी नाम दर्ज हैं।

व्यापमं में एक-एक परीक्षा पर सरकारी अफसर, बिचौलिये और छात्रों व आवेदकों के बीच बड़े तार पाये गये हैं।

व्यापमं के अंतर्गत पास हुए 1020 अभ्यर्थियों के फॉर्म गायब हैं।

नितिन महेंद्र नाम का कर्मचारी बंद कमरे में कंप्यूटर ऑन कर रिकॉर्ड बदलने का काम करता था।

एसटीएफ के मुताबिक 92,175 अभ्यर्थियों के डॉक्यूमेंट्स में बदलाव किये गये, ताकि घूस देने वालों को हाई रैंक दिलायी जा सके।

परीक्षा के बाद जला दिये जाते थे फॉर्म

व्यापमं के अंतर्गत आवेदन करने वालों को प्रवेश पत्र जारी किये जाते हैं। लेकिन अधिकारियों-कर्मचारियों-बिचौलियों की सांठ-गांठ के चलते प्रवेश पत्र जारी करते वक्त सारी डीटेल छात्र की होती थी, लेकिन फोटो परीक्षा देने वाले पढ़े-लिखे परीक्षार्थी का। परीक्षा पूरी होने के बाद कंप्यूटर के डाटाबेस में जाकर बाकायदा फोटो बदली जाती थी।इस परीक्षा को देने के लिये मेधावी छात्रों को 2 से 5 लाख रुपए तक दिये जाते थे। इसके अलावा ओएमआर शीट में फर्जीफिकेशन करके और मेधावी छात्र को पैसा देने वाले छात्र के बगल में बिठा कर नकल करवायी जाती थी। सबसे अहम बात यह है कि एडमिट कार्ड का मिलान नहीं हो सके, इसलिये कंप्यूटर में डाटा फीड करने के बाद फॉर्म जला दिये जाते थे।

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कीर्ति राणा

क़रीब चार दशक से पत्रकारिता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार कीर्ति राणा लंबे समय तक दैनिक भास्कर ग्रुप के विभिन्न संस्करणों में संपादक, दबंग दुनिया ग्रुप में लॉंचिंग एडिटर रहे हैं।

वर्तमान में दैनिक अवंतिका इंदौर के संपादक हैं। राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर लिखते रहते हैं ।

सामाजिक मूल्यों पर आधारित कॉलम ‘पचमेल’ से भी उनकी पहचान है। सोशल साइट पर भी उतने ही सक्रिय हैं।


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