Sunday, October 20, 2019
वाराणसी लोकसभा: पीएम नरेंद्र मोदी की जीत को लेकर 100 प्रतिशत आश्वस्त, फिर भी बीजेपी को है ये डर?

वाराणसी लोकसभा: पीएम नरेंद्र मोदी की जीत को लेकर 100 प्रतिशत आश्वस्त, फिर भी बीजेपी को है ये डर?

मीडियावाला.इन। मंगलवार (14 मई) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रिय समझे जाने वाले एक चैनल पर करीब एक घण्टे तक इस बात की पड़ताल की जाती रही कि क्या लोकसभा चुनाव 2019 में वाराणसी में नया रिकॉर्ड बनेगा।

टीवी का एंकर बार-बार स्थानीय नागरिकों से पूछ रहा था कि इस बार बनारस से पीएम मोदी '12 लाख' वोटों से जीत हासिल करेंगे। एंकर जनता से बार-बार इस बात की हामी भरवा रहा था कि पीएम मोदी 2019 के चुनाव में साल 2014 के चुनाव से भी ज्यादा भारी अंतर से जीत हासिल करेंगे।

14 मई को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनारस के वोटरों के नाम एक वीडियो संदेश जारी किया। इस संदेश में पीएम मोदी ने काशीवासियों को बताया कि 25 अप्रैल को वाराणसी में रोडशो के दौरान स्थानीय जनता ने उनसे अपील की कि "...आप मत आइए, हम संभाल लेंगे।" पीएम मोदी ने काशीवासियों से भारी संख्या में मतदान में हिस्सा लेने का आग्रह भी किया।

पीएम का इशारा साफ था कि 19 मई को बनारस में होने वाले मतदान से पहले वो वाराणसी नहीं आएंगे। 19 मई को 17वीं लोकसभा के चुनाव के लिए हो रहे मतदान के सातवें और आखिरी चरण का मतदान होगा।

पीएम मोदी ने 25 अप्रैल को वाराणसी में रोडशो किया और 26 अप्रैल को बीजेपी प्रत्याशी के तौर पर नामांकन दाखिल किया। वाराणसी में अपने कार्यक्रम के दौरान भी पीएम मोदी ने इस बात पर जोर दिया कि वोटर यह मानकर घर न बैठें कि बीजेपी आसानी से जीत ही जाने वाली है, वो अपने मतदान का जरूर प्रयोग करें।

नरेंद्र मोदी को कांग्रेस और सपा का वॉकओवर

 

वाराणसी लोकसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार अजय राय। राय 2014 के चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे थे। बनारस में 1991 से लेकर 2014 तक बीजेपी को केवल एक बार 2004 में मात मिली जब कांग्रेस के राजेश मिश्रा ने बीजेपी के शंकर प्रसाद जायसवाल को हराकर यह सीट जीती थी।

 

बीजेपी की परंपरागत सीट समझे जाने वाले वाराणसी लोकसभा सीट पर पिछले आम चुनाव में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल मुकाबले में थे।

आम जनता उम्मीद कर रही थी कि इस बार भी कांग्रेस या सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन पीएम मोदी के खिलाफ दमदार प्रत्याशी उतारेंगे। एक समय कांग्रेस ने इस बात को काफी हवा दी कि पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी भी वाराणसी सीट से चुनाव लड़ सकती हैं। लेकिन कांग्रेस और महागठबंधन दोनों ने हाई-प्रोफाइल उम्मीदवारों पर स्थानीय उम्मीदवारों को तरजीह दी।

कांग्रेस ने 2014 के चुनाव में तीसरे नंबर पर रहे पार्टी उम्मीदवार अजय राय को प्रत्याशी बनाया तो सपा ने पहले शालिनी यादव को और फिर बीएसएफ से बर्खास्त हुए जवान तेज बहादुर यादव को उम्मीदवार बनाया। तेज बहादुर यादव का नामांकन तकनीकी आधार पर चुनाव आयोग ने रद्द कर दिया, जिसके बाद इस सीट से पूर्व सांसद श्यामलाल यादव की बेटी शालिनी यादव सपा उम्मीदवार के रूप में एकमात्र विकल्प रह गईं।

इन दोनों उम्मीदवारों के नाम की घोषणा के साथ ही राजनीतिक पंडितों ने यह कहना शुरू कर दिया कि विपक्षी दलों ने बनारस में नरेंद्र मोदी को वॉकओवर दे दिया है।

फिर नरेंद्र मोदी और बीजेपी को किस बात का डर?

 

पीएम नरेंद्र मोदी नामांकन के बाद वाराणसी में प्रचार करने के लिए नहीं गये। (file photo) एक तो बीजेपी का मजबूत गढ़, ऊपर से कमजोर विपक्षी उम्मीदवार फिर भी बनारस को लेकर बीजेपी में एक तरह की असहजता दिख रही है, आखिर क्यों?

 

बीजेपी की असहजता की वजह, पीएम मोदी की जीत या हार नहीं है। वाराणसी से पीएम को हराने का सपना तो शायद विपक्षी भी नहीं देख रहे हैं। बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों की चिंता की वजह शायद वाराणसी में पिछले बार से कम मतदान होने को आशंका है।

यह आशंका बेबुनियाद भी नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार में अभी तक हुछ छह चरणों के मतदान का प्रतिशत पिछले आम चुनाव से कम रहा है। पिछले चुनाव में जनता में नरेंद्र मोदी को जिताने को लेकर उत्साह था तो इस चुनाव में कम से कम बनारस में बीजेपी समर्थक इस बात को लेकर पूरी तरह मुतमईन हैं कि पीएम मोदी आराम से जीत जाएंगे।

पूरे देश में पिछले आम चुनाव से हो रहे कम मतदान, बीजेपी के समर्थकों में जीत के आश्वस्तिभाव के अलावा वाराणसी लोकसभा के वोटरों का अंकगणित भी बीजेपी के चिंता का विषय होगा।

वाराणसी लोकसभा का अंकगणित

लोकसभा चुनाव जीत चुकी है।" साल 2004 को छोड़कर 1991 से 2014 के बीच बीजेपी बनारस से छह लोकसभा चुनाव जीत चुकी है।"/>साल 2004 को छोड़कर 1991 से 2014 के बीच बीजेपी बनारस से छह लोकसभा चुनाव जीत चुकी है। वाराणसी लोकसभा सीट में करीब 17 लाख मतदाता हैं। पिछले आम चुनाव में 10 लाख 30 हजार 685 मतदाताओं ने वोट डाला था। इनमें से करीब पाँच लाख 81 हजार वोटरों ने नरेंद्र मोदी को वोट दिया था। लगभग दो लाख नौ हजार वोट पाकर अरविंद केजरीवाल दूसरे स्थान पर रहे थे। पीएम मोदी ने केजरीवाल को तीन लाख 71 हजार से ज्यादा वोटों से हराया था।

 

अगर पिछले आठ चुनावों के कुल मतदान के आँकड़ों पर नजर डालें तो 2014 के चुनाव में सबसे ज्यादा 58.38 प्रतिशत मतदान (10, 30,685 वोट) हुआ। उससे पहले पिछले सात लोकसभा चुनावों में कभी भी यह आंकड़ा 50 प्रतिशत तक नहीं पहुंचा था।

साल 1989, 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 के आम चुनावों पर नजर डालें तो 2014 से पहले सर्वाधिक मतदान 1998 में हुआ था जब बनारस के कुल वोटरों के 46.46 प्रतिशत वोटरों ने घर से बाहर निकलकर वोट डाला था।

साल 2014 से पहले तक किसी भी विजयी उम्मीदवार को तीन लाख वोट नहीं मिले। पीएम मोदी से पहले सर्वाधिक वोट 1989 के चुनाव में वाराणसी से जीतने वाले बीजेपी उम्मीदवार को कुल दो लाख 65 हजार वोट मिले थे।

साल 2014 में नरेंद्र मोदी की प्रचण्ड जीत के आगे लोगों ने इस पर कम ही ध्यान दिया कि भले ही पीएम मोदी ने भारी बहुमत हासिल किया हो विपक्षी दलों को भी उल्लेखनीय वोट मिले। तीसरे स्थान पर कांग्रेस के अजय राय को 75,614, चौथे स्थान पर बसपा के विजय प्रकाश जायसवाल को 60,579, सपा के कैलाश चौरसिया को 45,291 वोट मिले थे। यानी बीजेपी के विपक्षी दलों के पास अपना-अपना मजबूत जनाधार है जो मोदी लहर में भी एक हद तक कायम रहा।

वाराणसी में बीजेपी के परंपरागत वोटर माने जाने वाले ब्राह्मण, बनिया, राजपूत, कायस्थ और भूमिहार के छह लाख से ज्याद वोट हैं। बनारस में करीब दो लाख पटेल वोटर भी हैं, जिनमें बीजेपी का आधार काफी मजबूत है।

इस समीकरण से साफ है कि पीएम मोदी अगर तीन लाख वोट पाते हैं तो भी आराम से चुनाव जीत जाएंगे।

लेकिन बीजेपी को यही डर सता रहा है कि पीएम चुनाव तो जीत जाएंगे लेकिन अगर पिछले चुनाव के मुकाबले उन्हें मिले कुल वोटों का आंकड़ा पिछले बार से एकाध लाख कम रह गया तो...अगर हार-जीत का अंतर लाख से घटकर हजार में रह गया तब!

 

सोर्स लोकमत न्यूज़

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