Monday, September 23, 2019
हीरालाल त्रिवेदी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार योग्य है या नहीं, इस पर प्रारंभिक सुनवाई आज

हीरालाल त्रिवेदी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार योग्य है या नहीं, इस पर प्रारंभिक सुनवाई आज

मीडियावाला.इन। नई दिल्ली: एट्रोसिटी एक्ट पर हाल ही में संसद द्वारा पारित विधेयक और राष्ट्रपति द्वारा उस पर दी गयी मंजूरी के बाद 17 अगस्त को केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में  एमपी सपाक्स के संरक्षक हीरालाल त्रिवेदी द्वारा दायर याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार योग्य है या नहीं ,इसकी प्रारम्भिक सुनवाई आज सुप्रीम कोर्ट में निर्धारित की गई है । कोर्ट यह तय करेगा यह याचिका सुनने योग्य है या नहीं। 

ज्ञात रहे श्री त्रिवेदी ने यह याचिका दिल्ली की वरिष्ठ अधिवक्ता सुमन रानी के साथ लगाई है। इससे पहले दिल्ली के 2 अधिवक्ताओ ने  भी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

श्री त्रिवेदी ने बताया कि भिण्ड के बिरखेड़ी में 15 अगस्त की घटना के बाद उन्होंने भिण्ड और ग्वालियर का दौरा कर घटना की जानकारी ली थी एवम उक्त घटना को लेकर ज्ञापन भी दिए थे। उक्त घटना से व्यथित होकर उन्होंने दिल्ली की वरिष्ठ अधिवक्ता सुमन रानी के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट में उक्त अधिसूचना को  संविधान में उल्लेखित समानता एवं स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताकर चैलेंज किया है।

यह उल्लेखनीय है कि इस संशोधन कानून के जरिये एससी एसटी अत्याचार निरोधक कानून में धारा 18 ए जोड़ी गई है जो कहती है कि इस कानून का उल्लंघन करने वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की जरूरत नहीं है, न ही जांच अधिकारी को गिरफ्तारी करने से पहले किसी से इजाजत लेने की जरूरत है. संशोधित कानून में ये भी कहा गया है कि इस कानून के तहत अपराध करने वाले आरोपी को अग्रिम जमानत के प्रावधान (सीआरपीसी धारा 438) का लाभ नहीं मिलेगा.  यानि अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में बताया गया है कि नया कानून असंवैधानिक है, क्योंकि सरकार ने सेक्शन 18ए के जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को निष्प्रभावी बनाया है जो कि गलत है और सरकार के इस नए कानून आने से अब बेगुनाह लोगों को फिर से फंसाया जाएगा. विशेषकर जाति सूचक शब्द बोलने, प्रताड़ित करने, गाली - गलौच करने, अधिकारी - कर्मचारी के बीच के विवाद के मामलों में जांच के बाद ही गिरफ्तारी का प्रावधान होना चाहिये था। क्योंकि देश मे ऐसे छोटे मोटे मामलों में 80 प्रतिशत पीड़ित पिछड़ा वर्ग के गरीब लोग ही होते हैं।
 
याचिका में ये भी कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के नए कानून को असंवैधानिक करार दे और जब तक ये याचिका लंबित रहे, तब तक कोर्ट नए कानून के अमल पर रोक लगाए.

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