Saturday, December 15, 2018
ग्वालियर-चंबल में सपाक्स  ने बिगाड़ा कांग्रेस-बीजेपी का गणित

ग्वालियर-चंबल में सपाक्स ने बिगाड़ा कांग्रेस-बीजेपी का गणित

मीडियावाला.इन।सपाक्स उतरा चुनावी मैदान में
सामान्य, पिछड़ा एवं कर्मचारी संघ (सपाक्स) ने भी मध्य प्रदेश की सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. इसके बाद से ही बीजेपी और कांग्रेस ने टिकट बांटने के लिए जो भी राजनीतिक समीकरण सोच कर रखे थे वो अब बेकार हो गए हैं. सपाक्स ग्वालियर के प्रमुख ब्रिजेश भदौरिया खुलकर कहते हैं कि बीजेपी ने सवर्ण समाज को अपनी जागीर समझा हुआ था लेकिन इस बार उन्हें अक्ल आ जाएगी. सपाक्स ने बीते दिनों अपनी मांगों में भी परिवर्तन कर दिया. पहले वे एससी/एसटी एक्ट को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक लागू करने की मांग कर रहे थे, अब वे इसे पूरी तरह ख़त्म करने की मांग कर रहे हैं.

शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर, कमलनाथ, प्रभात झा, थावरचंद गहलोत के साथ रविवार को लाल सिंह आर्य भी उस लिस्ट में शामिल हो गए जिन्हें सपाक्स ओर सवर्ण संगठनों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है. मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहलेएससी/एसटी एक्ट के विरोध में शुरू हुआ सवर्ण आंदोलन काफी आक्रामक रूप अख्तियार करता जा रहा है.

सवर्ण संगठन सपाक्स, ब्राह्मण सभा और करणी सेना के बाद अब दलितों के संगठन अजाक्स ने भी रैली निकालकर सवर्ण उम्मीदवारों को वोट न करने की अपील की है. भले ही कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही इसके पीछे एक दूसरे का हाथ बताएं लेकिन करीब से देखने पर पता चलता है कि इस आंदोलन ने ग्राउंड पर दोनों का ही खेल बिगाड़ दिया है.

सपाक्स कांग्रेस और बीजेपी दोनों का ही विरोध करेगी और किसी का भी साथ नहीं देगी. बीजेपी में ही मतभेद शुरू
ग्वालियर-चंबल संभाग वो इलाका है जहां से शिवराज कैबिनेट में सात मंत्री- नरोत्तम मिश्रा, यशोधरा राजे सिंधिया, रुस्तम सिंह, जयभान सिंह पवैया, लाल सिंह आर्य, नरेंद्र कुशवाहा शामिल हैं. केंद्रीय मंत्री और एमपी बीजेपी चुनाव प्रचार समिति के मुखिया नरेंद्र सिंह तोमर भी ग्वालियर से ही सांसद हैं. इस इलाके के बीजेपी के तीन बड़े नेताओं में नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा और अनूप मिश्रा शामिल हैं. अनूप मिश्रा इलाके के पुराने ब्राह्मण नेता माने जाते हैं और बीते दिनों उन्होंने सवर्ण आंदोलन को अपना समर्थन देकर तोमर को बड़ा झटका दे दिया. इसके अलावा बीजेपी से विधायक रहे रघुनंदन शर्मा ने भी इस मुद्दे पर इस्तीफ़ा दे दिया है.

दूसरी तरफ दिल्ली हाईकमान के आदेशों का पालन कर रहे तोमर इस मामले पर कुछ भी बोलने से बचते नज़र आते हैं. कुछ दिन पहले मामला तब और बिगड़ गया जब तोमर के कार्यक्रम में सपाक्स और करणी सेना के लोग विरोध दर्ज कराने पहुंचे और किसी उत्साही आन्दोलनकारी ने तोमर समर्थकों के सामने ही उनके पोस्टर पर कालिख पोत दी. सवर्ण समाज के लोग आरोप लगाते हैं कि इसके बाद तोमर के समर्थकों ने उनके साथ मारपीट भी की.मानना है कि असल में ऐसे किसी सवर्ण आंदोलन से निपटने की तैयारी किसी भी पार्टी की नहीं थी. सबसे पहले तो 2 अप्रैल को दलित इतना बड़ा आंदोलन कर देंगे इसका अंदाज़ा किसी को नहीं था फिर वो सरकार जिसे सवर्ण अपना मानते हैं वो ऐसा कानून पास कर देगी ये भी किसी को अंदाज़ा नहीं था.

सवर्ण आंदोलन कि खासियत ये है कि ये अपनों का अपनों के खिलाफ आंदोलन है. ग्वालियर में उग्र इसलिए दिखाई देता है क्योंकि यहां सवर्णों की आबादी भी 28% है और एससी/एसटी की 30% के आस-पास है. ऐसे में अब सारा खेल 32% ओबीसी और अल्पसंख्यकों के हाथ में रह गया है. इसी के चलते कांग्रेस और बीजेपी टिकट बंटवारे की तारीखों को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं. सवर्ण आंदोलन नहीं थमा तो टिकटों के बंटवारे में भारी फेरबदल भी देखने को मिल सकता है.

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