Tuesday, August 20, 2019
चांद से मुलाकात

चांद से मुलाकात

मीडियावाला.इन।

सच, चंद्रयान से एक बात पूछने का बड़ा मन है। चांद पर जा तो रहे हो, लेकिन वहां देखोगे क्या। क्या सिर्फ वहां की मिट्टी खोदोगे, फोटो क्लिक करोगे, पानी ढूंढने की कोशिश करोगे और लौट आओगे। क्या सच में ये इतना आसान होगा, तुम्हारे लिए। सिर्फ इसलिए कि मशीन हो, जज्बात से तुम्हारा कोई लेना-देना नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जमाने में भी इतने आर्टिफिशियल तरीके से चांद से लौट पाओगे क्या? और वह भी हिंदुस्तान के चंद्रयान होकर।

मुझे सबसे ज्यादा यह रोमांचित कर रहा है कि तुम्हारा यह सफर दो महीने का होगा। सोचो, कैसे कटेंगे तुम्हारे ये दिन। एक शून्य में आगे बढ़ते हुए, तुम क्या सोचोगे। कितने चक्कर लाओगे, धरती की कक्षा का। उसके बाद अंतरिक्ष के निर्वात में भटकना होगा। चांद से मिलने जा रहे हो, मन में कैसी उथल-पुथल मची होगी। दिल तुम्हारा है नहीं, सांस तुम लेते नहीं, वरना तुम्हारी धडक़न और सांसों की गति जरूर नाप कर देखता। तुम तो बस ईंधन पीते रहोगे, कोई और होता तो भले कितने भी दिन लग जाते, निवाला तो दूर एक घूंट पानी भी उसके कंठ से नीचे उतर नहीं पाता। एक-एक कदम बढ़ाना मुश्किल हो जाता। पूरे समय यही सोचते रहते कि मिलूंगा तो कहूंगा क्या। कैसे बढ़ाऊंगा बात, थामूंगा हाथ।

वैसे एक मामले में जरूर तुम हमारे जैसे हो। तुम्हारी इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है। विज्ञान हो या महोब्बत ये मसला ऐसा ही है। यहां भी कोई अपने चांद की तरफ एक कदम बढ़ाए तो हजारों आंखें उस पर जम जाती है। ऐसा लगता है, जैसे आंखों से ही खा जाएंगे। क्या जाने शायद खुद की महोब्बत मुकम्मल न हो पाने की खीज मिटाते हैं। ऐसे ही तुम्हारी भी हर हरकत पर न जाने कितनी नजरें होंगी। लाइव कमेंट्रियां चलेंगी। रोज के अलग-अलग एंगल के फोटो देखे जाएंगे। अंदाजा लगाया जाएगा कि सब ठीक है ना। चांद की तरफ बढ़ते हुए तुम्हे देखना मुझे भी रोज गुदगुदाता रहेगा।

मैं भी रोज उन खबरों की राह देखूंगा कि तुम आज कितना बढ़े, कहां तक पहुंचे और तुम्हारा मिजाज कैसा है। इंतजार की अकुलाहट से झुंझालाते हुए कहीं तुम पैर पटककर वापस तो नहीं लौट रहे। या रास्ते में कहीं रुक कर खड़े हो गए कि मैं इतना चला हूं तुम्हारे लिए तो क्या तुम कुछ कदम मेरे लिए नहीं चल सकते। हालांकि जानता हूं चांद अंतरिक्ष का हो या जमीं का, उसे ऐसी चुनौती देना हर किसी के बूते में नहीं। और तुम्हे तो इस खेल की ए बी सी भी नहीं पता है।

बात आखिर चांद की है। तुम कैसे महसूस करोगे, उस दूधिया रोशनी को, जो जब चेहरे पर पड़ती है तो रोम-रोम खिलखिलाने लगता है। उस पर नजर पड़ती है तो न जाने कितने किस्से-कहानियां और मन के दरीचों में छुपे अहसास बाहर आ जाते हैं। कोई लाख समझाए कि नील आर्मस्ट्रांग बता चुके चांद पर बड़े-बड़े गड्ढ़े हैं। कितनी ही दूरबीन लगाकर खींचे गए फोटो हमें दिखाए जा चुके हैं, लेकिन हम नहीं मानते, क्योंकि हमारा दिल नहीं मानता ना। हमें उसके गड्ढ़ों से कोई लेना-देना भी नहीं है। हम तो बस आसमान में चमकते हुए उसे देखते रहना चाहते हैं। चाहे फिर वह अमावस की रात ही क्यों न हो।

वैसे उसे देखते रहने का सुकून भी तुम समझ नहीं पाओगे। आंखें जब उसे छूती है तो पूरा जिस्म झनझना उठता है। तुम्हारे अंदर जो करंट बह रहा है, वह भी उसके आगे कुछ नहीं है। तुम्हारा करंट तो एक बार झटका देता है, चांद का एक झटका पूरी उम्र रूह के साथ चिपक जाता है। जब भी उस पर नजर पड़ती है, सिर घूमने लगता है। क्योंकि चांद सिर्फ चांद नहीं है। हमने उसके साथ जिंदगियां बिताई हैं। इसलिए मैं जानना चाहता हूं कि जब तुम वहां कदम रखोगे तो वहां सिर्फ मिट्टी, पहाड़ और गड्ढ़े ही मिलेंगे या वहां हमारी आहे भी गूंज रही होंगी। चांद, चांद करके फना हो गए आशिकों की रूहें भी क्या वहीं भटक रही होंगी।

देखो ना तुम मशीन होकर कितनी बातों से बच गए। वैसे तुम्हे बदनसीब कहना ज्यादा ठीक लगेगा, इस मामले में। काश तुम यह सफर सिर्फ तय नहीं करते, उसे इसी शिद्दत के साथ महसूस भी कर पाते कि तुम चांद पर जा रहे हो। और कुछ नहीं तो हमारा सलाम ही साथ लेते जाओ। जवाब भले न मिले, यह सुकून बहुत है कि हमारा पैगाम वहां तक पहुंच गया। 
 

0 comments      

Add Comment


अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.