अपनी भाषा, अपना विज्ञान; एक आंटी- “मान न मान मैं तेरी मेहमान”

44

प्राणियों और मनुष्यों में रजोधर्म (Menstruation) का प्राकृतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान

The Biological and Social Science of Menstruation

How come a neurologist is talking about menstruation? Well, my wife Dr Neerja, Senior Obstetrician, Gynecologist and Lactation Consultant is a co-author with me.

The 56th Bimonthly essay in my science series on “अपनी भाषा अपना विज्ञान” covers evolution of estrous and menstruation, the biology and pathology of menstruation, the plight of women, religious taboos and myths, and changing scenario for the better.

Two QR codes are accompanying the article.

  • One is a Questionnaire for self-assessment of your knowledge.
  • Another is a Survey Form for your beliefs, opinions and facilities.

Please respond to both of them.

1.0 ‘मासिक धर्म’ के कारण स्त्रियों पर सामाजिक लांछन

1.1 “मान न मान”, “मैं तेरी मेहमान”

वर्ष 1979 में मेरे विवाह के बाद के कुछ महीनों में मैने नीरजा और उसकी सहेलियों की बातचीत में एक शब्द कुछ बार सुना।

“आन्टी”

“क्या करूं, मैं पिकनिक पर नहीं जा पाई, आन्टी आ गई थी”

“इस बार आन्टी ने बहुत दुख दिया”

“आन्टी जल्दी आ गई”

“आन्टी ज्यादा दिन तक रही”

मैं समझ नहीं पाता। पूछने पर मालूम पड़‌ा कि वे युवतियां मासिक धर्म (Menstruation) को ‘आन्टी’ कहती है।

मैंने कहा ‘गांव की स्त्रियां पति का नाम जुबान पर नहीं लाती, तुम शहरी लड़‌कियां क्यों सहज भाव से सबके सामने, मेरे सामने, नहीं कहती कि Menstrual Period आ गया या जारी है?

 

1.2 पत्नी नीरजा ने हमारी बेटी अन्विता के स्कूल के दिनों की घटना पर व्यथित होकर: “माहवारी को महामारी मत बनाइये” नाम की एक छोटी-सी पुस्तिका में लिखा था-

“मेरी बेटी 12 साल की थी, तब उसे स्कूल ट्रिप से उदयपुर ले जा रहे थे। वह बहुत ही खुश और उत्साहित थी, जिस दिन शाम को 7 बजे बस से जाना था, उसी दिन उसे पेट दर्द चालू हुआ, उसने मुझे कुछ नहीं बताया, शायद इस डर से कि मैं उसका जाना कैंसिल न कर दूं। खैर वो बस में रवाना हो गई और आधी रात को बस में ही उसका पेट जोरों से दुखने लगा और उसे पहली बार ‘पीरियड्स’ यानी मेंसेस आ गए। मुझे आज भी ये अफसोस है कि जिस समय उसे माँ के सहारे की जरुरत थी और मैं वहाँ नहीं थी। खैर उसकी टीचर ने और उसकी सहेलियों ने तीन दिन की ट्रिप में उसे बहुत अच्छे से संभाला।

पर जब-जब मंदिरों के दर्शन के लिए सब जाते, उसे बाहर बस में बैठे रहना पड़ता। उस छोटी सी किशोरी का दिल और दिमाग इस बात को समझ नहीं पा रहा था।

शारीरिक से ज्यादा उसे मानसिक कष्ट हो रहा था। घर आकर उसने मुझे सारी बाते बताई। दूसरे ही दिन मेरी बेटी के मना करने के बावजूद मैं उसके स्कूल गई, उसकी टीचर को पहले धन्यवाद दिया, कि उन्होंने मेरी बेटी को सम्भाला।  फिर उन्हें मेंसेस की फिजियोलॉजी समझाने लगी। फिर टीचर बोली आप एक गाईनोकॉलोजिस्ट है इसलिए मैं आपकी सारी बाते सुन रही हूँ पर महावारी या मेंसेस को लेकर ये सारी धारणायें बचपन से हमारे मन में इतने गहरी तक बिठा दी गई है, कि अगर हम इसका पालन नहीं करेंगे तो ऐसा लगता है कि हमें पाप लगेगा।”

फरवरी 2026 में हम लोग रणकपुर जैन मन्दिर, राजस्थान गये थे। भव्य कलात्मक वास्तु शिल्प और नक्काशी। लेकिन जगह-जगह लगे हुए नोटिस बोर्ड्स पढ़ कर मन में दुःख और क्षोभ हो रहा था।

“मासिक धर्म जारी रहने के दिनों महिलाएं कृपया मन्दिर में प्रवेश न करें। पवित्रता बनाए रखें।”

collage 1 1

रणकपुर जैन मन्दिर, राजस्थान

ये सूरत बदलनी चाहिये। ईसाई, सिख, मुस्लिम, बौद्ध धर्मस्थलों में ऐसी कोई रोक नहीं है।

 

1.3 आज भी अनेक घरों में शर्मनाक स्थितियां हैं। स्त्रियां गन्दे कपड़ों, राख, छाल आदि इस्तेमाल करती है, योनि (वेजाइना), गर्भाशय (यूटेरस) तथा पेढू (Pelvis) में, जिससे खतरनाक इन्फेक्शन होते रहते है।

रजस्वला स्त्रियों पर अनावश्यक अपमानजनक पाबन्दियां लगाई जाती है। पूजा में न बैठों। मांगलिक कार्यक्रम से दूर रहो। भोजन न पकाओ। जूट-टाट पर बेठों-सोओ। इसे न छुओ, उसे न छुओ। पानी अलग रखो। मन्दिर में प्रवेश न करों। भगवान के दर्शन मत करो।

1.3.1 नीरजा के पास प्राय: स्त्रियां अनुरोध करती है- “मेडम जी हमारे घर में पूजा है, मंगल कार्य है, उन्हीं दिनों मेरी माहवारी पड़‌ती है, कृपया टेबलेट लिख दो ताकि पीरियङ्‌स कुछ दिनों के लिये टल जावें।”

नीरजा सख्त मना करती है। लम्बा लेक्चर सुनाती है। इन मान्यताओं से ऊपर उठो। इन परिस्थितियों में प्रोजेस्टिन टेबलेट के साइड-इफेक्ट होते है। सिर दर्द, चक्कर और कभी-कभी (Thrombosis) खून का गाढ़ा होना, क्लाट बनाना आदि। हमारी सारी देवियाँ लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी, सीताजी के सभी को माहवारी होती होगी।

 

2.0 विभिन्न रिलिजन और संस्कृतियों में मासिक धर्म

2.1 कुछ कबीलों में Menarch (रजस्वला शुरुआत) का उत्सव मनाया जाता है। गर्व से साथ उजागर करने की परम्परा रहती है न कि छुप छुप कर खुसुर-पुसुर में बात करने की।

एक मजहब में यदि बालिका का मासिक धर्म शुरू हो गया हो तो उसे न केवल पर्दे में रहना पड़ता है वरन शादी के काबिल मानकर उसके साथ यौन सम्बन्ध बनाने को जायज माना जाता है।  सब लोग न सही लेकिन बहुत से दकियानूसी लोग ऐसा मानते हैं।

 

2.2 भारतीय संस्कृति और हिन्दु रिलीजन के पैरोकार गौहाटी में कामाख्या देवी शक्तिपीठ का उदाहरण देकर सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि हमारे यहां योनि (vagina), यौन (Sex) तथा मासिक धर्म (Menstruation) को लेकर टेबू नहीं थे। हम प्रगतिशील लोग है। मूल रूप से नारीवादी है। पितृसत्तात्मकता (Patriarchy) रही होगी लेकिन देवी का सम्मान और आराधना उससे बड़ी अवधारणा रही है, जो बंकिम बाबू के वन्देमातरम् में श्रेष्ठतम रूप में अभिव्यक्त हुई है।

जब शिवजी क्रोध में भर कर दक्ष-पुत्री सती का शव कन्धे पर उठा कर विश्व में घूमते हुए ताण्डव कर रहे तब विष्णु ने अपने चक्र से देवी के विभिन्न अंगों को काटना शुरु किया जो 51 स्थानों पर गिर कर शक्ति पीठ कहलाए। गौहाटी (आसाम) में नीलांचल पर्वत पर कामाख्या मंन्दिर में सती की योनि (Vagina) स्थापित है। एक पत्थर में दरार के रूप में। वर्ष में एक बार आषाढ़ में मिथुन राशि के आरम्भ में प्रवृत्ति के दिन अम्बुबाची मेला लगता है। लाखों हिन्दू तीर्थयात्री आते है

collage 1 2

इस दिन देवी का वार्षिक Menstruation होता है। चार दिन मन्दिर, दर्शन, पूजा बन्द रहते है। देवी विश्राम करती है। यह शान्ति का उत्सव है। देवी के माध्यम से प्रकृति की उर्वरा प्रकृति का सम्मान है, प्रजनन का प्रतीक है। ब्रह्माण्ड में अचेतन और चेतन सभी की चक्रीय यात्रा (Cyclical Journey) का घोतक है। प्राणी मात्र की पीढ़ियों की निरन्तरता की पूजा है। यह अवसर मौन और शान्ति का है। देवी की चट्टान की दरार में से आता पानी और लाल कपड़ा वितृष्णा और जुगुप्सा के स्थान पर स्त्रीत्व के परम सत्य को मान्यता प्रदान करता है।

कालान्तर में पवित्र और अपवित्र (Pure तथा Impure) तथा छुआछूत के अन्धविश्वास विकसित हुए जिन्हें परिमार्जित किया जा सकता है, किया जा रहा है। हिन्दू रिलीजन की फिलासफी को घृणा की दृष्टि से न देखें। वरन उसमें Metaphysical को ढूंढना चाहिये।

देवी मां को रक्तस्राव होता है, यह विचार ही अपने आप में सरल और क्रान्तिकारी है।

मासिक धर्म छिपाने की बात नहीं बल्कि प्रकृति का एक सम्मान योग्य चमत्कार है।

2.3 केरल के साबरीमाला अय्यप्पा मंदिर में रजस्वला उम्र (15) से रजोनिवृत्ति उम्र (45) तक की महिलाओं का निषेध है। अन्य उम्र में अनुमति है।

अय्यप्पा देवता के बारे में मान्यता और आस्था है, शास्त्रों में उल्लेख है कि उन्होंने “नैसर्गिक ब्र‌ह्मचर्य” का व्रत लिया हुआ है। इसलिये Menstruating Women (वे स्त्रियां जिन्हें मासिक धर्म जारी है) इस मन्दिर में प्रवेश नहीं करती है। स्वेच्छा से नहीं करती है। अपने मन से प्रतीक्षा करती है। मीनोपॉज के बाद करती है।

इस आस्था और परम्परा को स्त्री के साथ भेदभाव नहीं माना जाना चाहिये।

अयप्पा भगवान के बीसियों दूसरे मन्दिर केरल व अन्य राज्यों में हैं, वहां ऐसा कोई निषेध नहीं है।

राजनैतिक और विचारधारात्मक रुप से अपने आपको प्रगतिशील और नारी-स्वातंत्र्य की समर्थक महिलाओं और उनके सम्बद्ध Activist लोगों ने इसे जानबूझ कर हिन्दू धर्म पर प्रहार करने के लिये एक मुद्दा बनाया हुआ है। ऐसा कौन सा बड़ा समाज सु‌धार कर लेंगे ये लोग? इनके मन में कोई आस्था नहीं है। सिर्फ दिखावा है। दर्शन के पूर्व उपवास, व्रत, अनुष्ठान, पूजा आदि की अनिवार्य विधियों का ये लोग पालन नहीं करते। बल्कि हंसी उड़‌ाते है। सैद्धांतिक रूप से मैं इस बात से सहमत हूँ कि साबरीमाला मन्दिर के आचार्यों को इस निषेध को हटा देना चाहिये। वे कहेंगे कि हर रिलिजन वालों को अपनी अपनी आस्थाओं को पालन करने का अधिकार है। गुरूद्वारे में आपको जूते उतारना है, सिर ठकना है, मक्का-काबा में गैर मुस्लिम नहीं जा सकते, चर्च में सिर पर से हैट हटाया जाता है। ऐसा कौनसा कहर ढा जायेगा यदि ये Benign सी परम्पराएं जारी रहें तो।

2.4 प्रत्येक रिलीजन और संस्कृतियों में से विरोधाभासी उद्धरण, और आख्यान मिलते है। लेखक बुद्धिजीवी अपनी-अपनी विचारधारा के अनुरूप चुनते रहते हैं। अंधविश्वासों पर वैज्ञानिक जामा पहनाने की हास्यास्पद कोशिशें करी जाती है।

सैद्धांतिक रूप से सत्य कुछ और हो सकता है, लेकिन दैनिक व्यावहारिक जीवन कैसे सलूक किया जाता है यह अधिक मायने रखता है।

कुछ लोग सफाई देने की कोशिश करते है कि ऐसा इसलिये चलाया गया कि स्त्री को उसके तकलीफ-पीड़ा के दिनों में आराम मिल जावे। सीधे-सीधे कहते तो भोली-भाली जनता को समझ नहीं आता, इसलिये घुमाफिरा कर Pure and Impure की धारणाएं गढ़ी गई। यह तो बेकार की लीपापोती है और एक तरह का Afterthought हुआ। “पिछली मति” की बात हुई।

दुःख की बात है कि सेक्यूलर चिन्तन के चलते माहवारी को हमारी पाठ्‌यपुस्तकों में मेडिकल भाषा के एक दो पैराग्राफ मे सीमित करके उसे जन-स्मृति से विलुप्त कर दिया है। उसी रिक्त स्थान की पूर्ति तथाकथित शुद्ध-अशुद्ध जैसी अवैज्ञानिक मान्यताओं से हुई है।

2.5 उपेक्षा की विडम्बना

हमारे पुरुष प्रधान समाज और पुरुष प्रधान मेडिकल कम्युनिटी ने स्त्रियों के स्वास्थ्य के इस महत्वपूर्ण पहलू की घोर उपेक्षा करी है। उनके दर्द, तकलीफों और लांछन को दबा कर रखा जाता है, छिपाया जाता है, चर्चा नहीं करी जाती, रिसर्च नहीं होती, शोध द्वारा नये उपचारों पर ध्यान नहीं दिया जाता।

मौन का एक षड्‌यंत्र चलता रहता है। उनकी पीड़ा को गौण बना दिया जाता है, उस‌का सामान्यीकरण (Normalizing) कर दिया जाता है।

“अरे, यह तो उनके साथ होता ही है।” कभी उनके अनुभवों, अपेक्षाओं, उम्मीदों पर चर्चा नहीं की जाती।

इस Normalization का विकृत स्वरूप (असामान्यीकरण) विपरीत दिशा में काम करता है। स्त्री अपवित्र और गन्दी हो जाती है, पास फटकने नहीं दी जाती।

“मौन – उपेक्षा, अज्ञान और लांछन” की संस्कृति के स्थान पर “संवाद – खुलापन – बेबाकी – ज्ञान-विज्ञान और सहानुभूति” की संस्कृति की जरूरत है।

3.0 प्राणियों में प्रजनन और माहवारी का विकास

वनस्पति और प्राणी जगत दोनों में Reproduction (प्रजनन) की ढेर सारी विधियां है, सबकी सब सफल है। किसी को ऊंचे दर्जे की या निचले दर्जे की नहीं कह सकते हैं। सबका तुलनात्मक अध्ययन मजेदार है।

3.1 अनेक स्तनपायी (Mammals) स्पीशीज में Estrous Cycle का विकास हुआ। इस्ट᳙स अर्थात “मद” अवस्था। साल में एक बार। दो-चार सप्ताह के लिये। किसी-किसी नियत महीनों में, मादा में अण्डाशयों द्वारा Estrogen हार्मोन अधिक बनने लगते हैं। गर्भाशय की अन्दरुनी परत (Endometrium) मोटी व अधिक रक्त से भरपूर होने लगती है। बाह्य जननांग (योनि – Vagina) का आकार बड़ा हो जाता है। वे अधिक दिखाई पड़ने लगते है। पशुपालक जानते है कि गाय, भैंस, कुतिया, बकरी आदि इन दिन “मदमस्त” है – “Heat” पर है, गरम है। मैथुन की इच्छुक है, सेक्स के लिये तैयार है। उनके अंग से गन्ध निकलती है जो नर पशु को आकर्षित करती है। गर्भावस्था सम्भव होती है। यदि गर्भ न ठहरे तो Endometrium (अन्दरूनी परत) बाहर नहीं झड़ती, वरन अन्दर ही अन्दर सोख ली जाती है।

‘मदकाल’ (Estrous Period) के दौरान अण्डकोष में अण्डा (ovum) बनता है, बाहर निकलता है। इसे Ovulation कहते है। इसके बाद Ovary में कार्पस ल्युटियम नामक रचना बनती है, जो Progesterone हार्मोन बनाती है। वह गर्भ की स्थापना और उसे ठहराये रखने के लिये जरूरी होता है।

3.2 मनुष्य जाति की स्त्रियां साल भर 365 दिन यौन क्रिया कर सकती हैं, आनन्द लेती है। गर्भ ठहरने की सम्भावना प्रति माह बनती है। मनुष्यों (Homo Sapiens) के आविर्भाव के चार करोड़ वर्ष पूर्व से अनेक प्राणियों में Estrous के बजाय Menstruation (मासिक रक्त स्राव) की शुरुआत हो चुकी थी। इसके मूल में भी Progesterone हार्मोन के रक्त स्तर का घटना रहता है।

Menstruating species (मादा में मासिक रक्त स्राव वाले प्राणी)

·        एलिफेंट श्रियु

·        चमगादड़

·        कुछ प्रकार के चूहे

·        बंदर

·        गोरिल्ला

·        चिंपाजी

·        मनुष्य

 

इन सभी प्राणियों में गर्भावस्था के दौरान Uterus में आंवल (Placenta) भी बनता है जिसके माध्यम से शिशु पोषण प्राप्त करता है।

प्राणी विकास में Menstruation तीन अलग कालों में स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आया। गर्भ न ठहरने की अपनी स्थिति मे एन्डोमेट्रियम को त्यागना पड़ता है।

उसकी मोटी, अनेक परतों वाली, रक्त नलिकाओं से लबालब एण्डो मेट्रियम रूपी कालीन झड़ने लगती है। 3 से 5 दिन लगते है। योनि से पतला रक्त व जमे हुए क्लॉट आते हैं। यह रक्त Arterial होता है, धमनियों वाला होता है। आक्सीजन युक्त होता है। शिराओं वाला (veins) खून नहीं होता।  न जाने कैसे मान्यता बन पड़ी कि मासिक रूप से स्रावित होना वाला खून गन्दा और अशुद्ध होता है। ऐसा कुछ नहीं है। यह शुद्ध, Sterile (जीवाणु विहीन) रक्त है।

वार्षिक इस्ट्रस की जगह मासिक Menstruation क्यों शुरु हुआ? डार्विनियन Evolution की दृष्टि से इसका क्या योगदान रहा होगा? क्या प्रकृति इसके बिना अपना काम नहीं चला सकती थी?

जो लोग प्रकृति या ईश्वर को सवश्रेष्ठ रचनाकार (Perfect Designer) मानते हैं, उनसे दुनिया की आधी आबादी पूछती है कि यह कैसी Design, यह कैसी व्यवस्था जिसमें प्रति माह पाँच दिनों तक योनि से खून बहता रहे, साथ-साथ में दर्द होते रहे?

शायद आंवल (Placenta) को गर्भाशय में साधने लिये अधिक मोटी Endometrium की जरूरत रही होगी। इतनी मोटी कि गर्भ न ठहरने की स्थिति में उसे अन्दर ही अन्दर सोख लेना सम्भव नहीं हो पाता होगा। इस मासिक सफाई के चलते शायद बैक्टीरिया आदि के इन्फेक्शन कम होते होंगे? शायद शुक्राणु (Sperm) के साथ आने वाले बेक्टीरिया से बचने के लिये ऐसा होता हो?

उर्जा की खपत की दृष्टि से Endometrium को सारे समय गर्भावस्था के लिये तैयार बनाये रखने के बजाय प्रति माह 10-14 दिन की तैयारी कम खर्चीली होती होगी।

गर्भस्थ शिशु की काया के प्रोटीन अणु, माता के लिये विजातीय होते हैं। इम्यून प्रतिक्रिया हो सकती है। इसलिये भी Placenta (आंवल) जरुरी है, जो माता और शिशु के रक्त के बीच चुनिंदा पदार्थों का आदान-प्रदान तो होने देता है लेकिन उन्हें आपस में मिलने नहीं देता।

एक अन्य विचार के अनुसार Decidualization (एण्डोमेट्रि‌यम की मासिक तैयारी) डिम्ब के चयन में भूमिका निभाता होगा। विकृत, खराब डिम्ब को पहचान कर उसका स्वत: गर्भपात करवाने की क्षमता Menstruation के साथ विकसित हुई होगी। यह भी सम्भव है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऐसी भली जीन्स इकठ्ठा होती गई जो Endometrium की मासिक तैयारी को बढ़ावा देती हों।

 

4.0 मासिक धर्म का विज्ञान

महावारी या मेंसेस एक हर महीने होने वाला डिस्चार्ज है, जिसमें हमारे शरीर का शुद्ध रक्त, योनी या वेजाईना से बाहर आता है।

ये साईकल या चक्र 28 दिन की होती है, कभी-कभी 21 से 35 दिन की भी हो सकती है। महिलायें ज्यादा खून जाने को अच्छा मानती है, सोचती है कि गंदगी निकल रही है। ऐसा नहीं है।

खून जाना या ब्लीडिंग 3-5 दिन में बंद हो जाना चाहिए। अगर ज्यादा दिन चल रहा है, क्लाट्स जा रहे है, तो गलत है। आपको एनीमिया यानि खून की कमी हो सकती है। हर 15-20 दिन में आपको मेंसेस हो रहा है, तो में तुरंत अपने डॉक्टर को बताईये।

पहली बार मेंसेस या पीरियड्स का होना मिनार्की कहलाता है। एक किशोरी में 9 साल की उम्र के बाद बहुत सारे बदलाव आते है, स्तन का आकार बढ़ने लगता है। थोड़े मुँहासे आते हैं, भावुकता बढ़ती है, और दो ढाई साल के अन्दर अन्दर मिनार्की यानी महावारी आती है। ये परिवर्तन हॉरमोंस के द्वारा ब्रेन से नियंत्रित होती है। हायपोथेलेमस, पिट्यूटरी और अंडाशय में एक क्रिटिकल बैलेंस या नाजुक संतुलन के रूप में ये सब होता है।

गर्भाशय के साथ जुड़े हुए दो अंडाशय, बादाम के साइज की सफेद रंग की होती हैं। उसके साथ ही जुडी हुई है, फेलोपियन ट्यूबस या नलियां। गर्भाशय यानी बच्चेदानी के अन्दर की परत को हम एंडोमेट्रियम या झिल्ली कहते है। अंडा ओवरी में से निकलकर यहाँ तक आता हैं। एंडोमेट्रियम या झिल्ली हर महीने ब्लीडिंग के रूप में हमारे शरीर से बाहर आती हैं।

शुरुआत में HPO यानी हायपोथेलेमस पिट्यूटरी और ओवरी की एक्सिस परिपक्व या मेच्यूर नहीं होती है, इसलिए पीरियड एक बार आकर कई महीनों तक या कभी कभी 4-5 महीनों तक नहीं आते है। ये बिलकुल सामान्य बात है। चूंकि ये सारी गतिविधियां मस्तिष्क यानी ब्रेन से नियंत्रित होती है, तो जरा सा भी तनाव या चिंता हुई तो हमारा पीरियड आगे बढ़ जाता है या जल्दी आ जाता है। ये चीजें भी बहुत सामान्य है

collage 1 3

4.1 मासिक चक्र की एनाटमी

हाइपोथेलेमस, पिट्यूटरी व ओवरी (अण्डाशय) की तिकड़ी का बेहतरीन संयोजन

collage 1 4

माहवारी-हाइपोथेलेमस, पिट्यूटरी व अंडाशय से निकालने वाले हार्मोन्स के एक नाजुक संतुलन के रूप में नियंत्रित होती है।  जिसमें एंडोमेट्रियम हर महीने रक्तस्त्राव के रूप मे बाहर आती है। यह रक्त oxygenated होता है।  (ऑक्सिजन युक्त यानि शुद्ध होता है, न की अशुद्ध जैसी की आम धारणा है ।)

 

4.2 मासिक चक्र की फिजियोलाजी

मासिक धर्म (Menstrual Cycle) महिलाओं के शरीर में हर महीने होने वाली एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो गर्भधारण (Pregnancy) के लिए शरीर को तैयार करती है। यह लगभग 28 दिनों का चक्र है, लेकिन इसकी Range 21 से 35 दिनों तक की हो सकती है। जो एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन द्वारा नियंत्रित होता है। इसमें गर्भाशय की परत (Endometrium) का मोटा होना, अंडा निकलना (Ovulation), और गर्भावस्था न होने पर उस परत का रक्त के रूप में बाहर निकलना शामिल है।

मासिक चक्र के मुख्य चरण (Phases of Menstrual Cycle):

  1. मासिक धर्म चरण (Menstrual Phase – दिन 1-5): जब प्रेगनेंसी नहीं होती, तो पिछले महीने बनी गर्भाशय की परत टूटकर योनि (vagina) से रक्त के रूप में बाहर आती है। इसे ही पीरियड्स कहते हैं।
  2. फॉलिकुलर चरण (Follicular Phase – दिन 1-13): पिट्यूटरी ग्रंथि FSH हार्मोन रिलीज करती है, जिससे अंडाशय (Ovary) में एक अंडा परिपक्व (mature) होता है और गर्भाशय की परत फिर से बनने लगती है।
  3. ओवुलेशन (Ovulation लगभग 14वां दिन): मिड-साइकिल में परिपक्व अंडा अंडाशय से बाहर निकलकर फैलोपियन ट्यूब में आता है। यह वह समय है जब प्रेगनेंसी की संभावना सबसे अधिक होती है।
  4. ल्यूटियल चरण (Luteal Phase – दिन 15-28): अंडा निकलने के बाद, अंडाशय प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बनाता है, जो गर्भाशय की परत को मोटा और तैयार करता है ताकि निषेचित अंडा वहां चिपक सके। अगर प्रेगनेंसी नहीं होती, तो यह परत टूट जाती है और नया चक्र शुरू हो जाता है।

 

5.0 साफ-सफाई (हाइजीन) के उपाय

5.1 आजकल सेनेटरी पैड्स सब जगह मिलते हैं। पुराने जमाने में पैड्स की जगह कपड़े का उपयोग होता था। कुछ महिलायें, राख को कपड़े में लपेट कर लगाती थी, जो कि हमारे शरीर को नुकसान पहुंचा सकता हैं।

आजकल पुन: उपयोगी (रीयूसेबल) पैड्स भी मार्केट में मिलते हैं, पर्यावरण की दृष्टि से ज्यादा अच्छे होते हैं। पर इन्हें धूप में सूखाना और प्रेस करना जरुरी हैं, जो कि हमारे समाज में बुरा माना जाता हैं। खुले में तो क्या इन्हें कोठरी में, कोने में बंद जगह पर सुखाया जाता हैं।

कुछ पैड्स बैम्बू और केले के फाइबर्स के भी मिलते हैं। ये सस्ते और इकोफ्रेंडली भी होते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि एक सेनेटरी पैड को नष्ट या डीकम्पोस होने में 500 से 800 साल लगते हैं। सब से बड़ी समस्या हैं इन पैड्स को किस तरह से डिस्पोस किया जाएँ???

सबसे अच्छा तो ये होगा कि पुन: उपयोग में आने वाली (रीयुसेबल) चीजों का हम उपयोग करना शुरू कर दें। पर इन सब चीजों को चलन में आने में थोड़ा समय लग सकता हैं।

सेनेटरी पैड्स को टॉयलेट में फ्लश नहीं करना हैं, नहीं तो ड्रेनेज ब्लाक हो जाते हैं।

इन्हें कागज में लपेटकर अलग डस्टबिन में डाला जाना चाहिऐं। स्कूल-कॉलेजो में, सार्वजनिक स्थानों पर हर शौचालय में, बंद ढक्कन वाला डस्टबिन होना चाहिए। शौचालयों की कमी के कारण, या गंदे होने के कारण इस दौरान कई लड़कियां स्कूल जाने से कतराती हैं।

खुले में सेनेटरी पैड्स पड़े होने के कारण उन पर मक्खियाँ बैठती हैं, और बीमारियाँ फैलती हैं। कुछ लोग नदियों और समुद्र में इसे फैकतें हैं जो कि सरासर गलत हैं। कुछ इन्सिनरेटर (भस्मक) आते है जिसमें कि सेनेटरी पैड्स को जलाकर डिस्पोस ऑफ कर सकते हैं।

 

5.2 सेनीटरी पैड्स के साथ समस्याएं

अक्षय खन्ना और राधिका आप्टे अभिनीत फिल्म “पैडमैन” में इस विषय पर सही संदेश मनोरंजक तरीके से दिये गये थे।

  1. गरीब वर्ग के लिये महंगे है। शासकीय या NGO स्रोतों से मिलना चाहिये।
  2. पैड में अनेक केमिकल्स होते है। प्रजनन आदि पर बुरा असर हो सकता है।

तालिका: सेनीटरी पैड के अवयव

Dioxins – for Bleaching रंग उड़ाना
Phthalates पैड को मुलायम व कमनीय बनाना
Fragrances खुशुबु
VOC (Volatile Organic Compounds) उड़नशील कार्बनिक यौगिक
EDC (Endocrine Disrupting Chemicals) हार्मोन्स को बिगाड़ने वाले रसायन (समस्या – Endometriosis)
प्लास्टिक पदार्थ- कृत्रिम सिन्थेटिक्स (Polyethylene, Polypropylene) ग्रामीण क्षेत्रों में कचरा निपटान की सुविधाएं नहीं हैं।
माइक्रोप्लास्टिक्स महीन कण वातावरण में घुलमिल कर हमारे भोजन-पानी-श्वास की हवा के माध्यम से शरीर मे घुस कर धीरे-धीरे जमा होते जाते हैं, स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते है।
  1. पर्यावरण दृष्टि से इन पैड्स का Degradation (क्षरण, गलन, प्रकृति में घुलमिल जाना) आसानी से नहीं होता। इन्हें कहां फेंके, कहां डाले, कहां Disposal करें की समस्या रहती है।
  2. चमड़ी में खुजली होती है; लालपन आता है। दराद उठती है, इन्फेक्शन पूरी तरह से नहीं रुकते। योनि में सामान्य रूप से मौजूद रहने वाले लाभकारी बैक्टीरिया की पापुलेशन गड़बड़ा जाती है।
  3. कुछ महिलाओं को इन्हें पहले रखने में दिक्कत होती है। मासिक धर्म का रक्त व सफेद पानी, पैड के आजू-बाजू से लीक हो सकता है।
  4. अनेक स्त्रियों को ये ‘पैड’ भारी-भरकम लगते हैं, पहने रहना अच्छा नहीं लगता।
  5. स्कूल और ऑफिस में इन्हें बदलने के लिये उचित स्थान नहीं मिलता।
  6. अनेक कम्पनियों के पैड में सिन्थेटिक मटीरियल, खुशुबु व चिपकाने वाले गोंद पदार्थ रहते है जिनके दीर्घकालिक प्रभावों तथा नियामक (Regulatory Standards) कसौटियों पर काम अधूरा है, उनका ठीक से परिपालन नहीं होता।
  7. पारदर्शिता की कमी – पैड बनाने वाली व्यावसायिक कम्पनियां प्राय: उपरोक्त केमिकल्स के सम्भावित दुष्परिणामों के बारे में उपभोक्ताओं को पूरी जानकारी नहीं देते हैं।

 

5.3 सेनीटरी पैड का विकल्प क्या?

क्या पुराने गन्दे तौर-तरीकों को अपना लें? कतई नहीं। कितनी पीड़ा, शर्म, लांछन महसूस होता है जब स्त्री अपने रक्त से सने घरेलू कपड़ो को छिप छिप कर धोती है, छिप-छिप कर सुखाती है, छिप-छिप कर पहनती और उतारती है।

एक सामान्य फिजियोलॉजिकल प्रक्रिया को लेकर इतनी शर्म क्यों? हमारे समाज में जरा ज्यादा ही है।

ग्रामीण, गरीब व कम पढ़े-लिखे समुदायों में अधिक है। हालांकि शहरी, सम्पन्न, शिक्षित, आधुनिक वर्ग भी इन गई-गुजरी पुरानी गलत-सलत मान्यताओं से मुक्त नहीं हुआ है।

WHO तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य नियामक संस्थाओं द्वारा बेहतर मानदण्ड बनाए जा रहे है, उत्पादनकर्ता नयी तक्नालाजी का उपयोग कर रही है। स्कूली शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा में Menstrual Health के बारे मे विस्तार से बताया जा रहा है।

 

5.4 मेनस्ट्रुअल कप

पैड्स की तुलना में “कप” बहुत ही सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ पर्यावरण मित्र साबित हो सकता है। पर मासिक धर्म को लेकर जो गलत मान्यताये है, उसके कारण इसका चलन अभी भी इतना नहीं हैं। मासिक धर्म के दौरान अपनी योनि को छूना, रक्त को हाथ लगाना या किसी वस्तु को योनि मार्ग में डालने की कल्पना से कई महिलायें बड़ी असहजता महसूस करती हैं। कुछ महिलाओं को इस कप को खाली करना, और रक्त को देखना अच्छा नहीं लगता।

हालांकि धीरे धीरे मेन्स्ट्रुअल कप्स का चलन अब बढ़ रहा है।  ये सिलिकॉन के बनना शुरू हो गये हैं तथा अलग-अलग साइज में उपलब्ध है। सबसे छोटा साइज जिसे कि अविवाहित लडकियाँ (जी हाँ, आपने सही पढ़ा कुंवारी कन्याएं) भी इस्तेमाल कर सकती हैं। स्त्री रोग विशेषज्ञ होने के नाते डॉ नीरजा के पास सबसे ज्यादा किशोरियों की माँ, चिंता लेकर आती हैं, कि इन कप्स से बच्ची के शरीर को कोई नुकसान तो नहीं होगा? बस एक बार इस्तेमाल करने का तरीका अपने डॉक्टर से सीख लें फिर तो कोई चिंता की बात ही नहीं हैं। सिलिकान से बने होने के कारण यह योनि मार्ग (वजाईना) में जाकर फिट हो जाते है।

इसे लगाने के बाद न केवल हम चलना फिरना आसानी से कर सकते हैं, बल्कि दौड़ना, खेलना, कूदना, तैरना भी आसान हो जाता है।

जो लड़कियाँ तैराकी करती है, या एथेलीट है, उन्हें मासिक धर्म के दौरान सबसे ज्यादा परेशानी होती थी, किन्तु इसके उपयोग से न केवल तैरना आसान हो गया, बल्कि हाईजेनिक भी है। माहवारी के दौरान पैड्स या टेम्पून लगाकर तैरना बहुत कठिन होता है।

कोरोना काल में नर्सेस, डॉक्टर्स 10 से 12 घंटे पी.पी.ई. किट पहनकर ड्यूटी करती थीं, उस समय मेन्स्ट्रुअल कप्स इन स्वास्थ्यकर्मियों के लिए वरदान साबित हुए थे।

एक बार यह योनी मार्ग पर यूटरस (बच्चेदानी) के मुंह (सर्विक्स) पर फिट हो जाता है, तब चित्र में दिखाई गई अवस्था में दिखता है।

collage 1 5

इसे वजाइना में डालने से पहले इसे ऊ या मछली के मुंह के आकार में साइज छोटा मोड़कर (फोल्ड करके) करना होता है। कप की एक रीम या किनारी को दबाने से उसका आकार बहुत छोटा हो जाता है, मछली के मुंह जैसा दिखने लगता है।

जेली या क्रीम, तेल आदि का उपयोग नहीं करना है। इसे निकालना सरल है, या तो आप उकडू बैठ कर (पाँव पर) इसे निकाल सकते है, या फिर किसी स्टूल पर एक पाँव रखने की स्थिति में मेन्स्ट्रुअल कप की डंडी या स्टेम को आसानी से आप पकड़ सकती है, और उसे दबा कर वजाइना में से निकाल सकती है।

ध्यान रखना है कि कप को आप सीधा निकाले नहीं तो उसमें इकट्ठा खून बाहर ढूल सकता है। अगर आपको सिलिकॉन या रबर से एलर्जी हैं तो आप इसका उपयोग न करें। एक कप लगभग 5-7 साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर कप का रंग बदल गया है, या उसके ऊपर की रिम में क्रेक आ गया है, तो उसे बदलना जरुरी है। कप को पहनने के बाद यह ध्यान रखना जरुरी हैं कि उसकी डंडी कही योनी मार्ग से बाहर तो नहीं आ रही है, इसकी डंडी को काटना नहीं है।

कप की साफ सफाई और रख रखाव आसान है। साफ पानी और साबुन से धो कर इसे इस्तेमाल कर सकते है, या उबलते हुए पानी को आँच से उतारकर उसमें कप को तीन से चार मिनट रखकर साफ किया जा सकता है।

आप अगर अपनी माहवारी के आसपास के समय में यात्रा कर रहे है तो इसे बहुत ही आसानी से अपने पर्स में रखकर ले जा सकते है। मार्केट में यह बहुत आसानी से उपलब्ध नहीं है, हाँ! मेडिकल की दुकान या फिर ‘ऑनलाइन’ भी इसको मंगाया जा सकता है।

एक कप 300 से 400 रुपए तक मिलता है। पर ध्यान रहे, मेड इन चाइना वाले कप काफी सस्ते मिलते है, पर इनकी गुणवत्ता अच्छी नहीं होती, लीकेज की समस्या आम होती है। मेन्स्ट्रुअल कप के साथ एक पर्स स्ट्रींग पाउच भी आता है, जिससे कि कप को हम रखकर अपने साथ ले जा सकते है।

 

5.5 मासिक धर्म के रक्त स्राव के दिनों में सेक्स

यदि स्त्री और पुरुष दोनों इच्छुक व सहमत हो तो कोई नुकसान नहीं। हालांकि अनेक स्त्रियां शायद इसे पसन्द न करते हुए भी अपने पति के दबाव या प्यार का लिहाज करते हुए राजी हो जाती होंगी। यौन क्रिया से माहवारी दर्द कुछ कम हो सकता है।

 

6.0 माहवारी के रोग

बिना रोग के, सामान्य स्वस्थ महिलाओं के लिये माहवारी यूँ ही एक परेशानी तो है।

ऊपर से कुछ रोग हो सकते हैं। करेला और नीम चढ़ा।

दुबले को दो आषाढ़

  1. खून ज्यादा बहना – Menorrhagia

अधिक दिनों तक बहना। पैड्स जल्दी-जल्दी बदलना पड़‌ते हैं।

अनेक महिलाओं में इस वजह से हीमोग्लोबिन कम हो जाता है। एनीमिया हो जाता है।

  1. माहवारी जल्दी-जल्दी आना – Polymenorrhea पालीमिनोरिया
  2. माहवारी कम आना – Oligomenorrhea Hypomenorrhea

माहवारी देर देर से आना। लम्बे लम्बे गेप हो जाना। कम खून बहना।

आम तौर पर यह चिंता की बात नहीं होती। अनेक स्वस्थ महिलाओं में ऐसा हो सकता है। लोग सोचते है गन्दा खून अन्दर ही रह जाना खराब बात है। ऐसी सोच गलत है। माहवारी का मकसद शरीर की गन्द‌गी निकालना नहीं होता है। यह खून शुद्ध साफ होता है जिसका हर महीने बाहर आना सामान्य प्रक्रिया है।

  1. माहवारी के समय पेढू (Pelvis) में दर्द होना Dysmenorrhea.
  2. माहवारी के दिनों के अलावा खून बहते रहना। Metrorhagia
  3. M.S. Pre-mensternal Syndrome

मासिक धर्म (पीरियड्‌स) शुरू होने के 5-7 दिन पहले अनेक स्त्रियों को शारीरिक और भावनात्मक लक्षण सताते है। चिड़‌‌चिड़‌ापन, मूड में उतार चढ़ाव, उदासी और रुलाई, गुस्सा आना, चिंता करना, मन न लगना, काम में थक जाना।

पेट में के निचले भाग (Pelvis या पेढू) में भारीपन या सूजन जैसा लगना, स्तन में दर्द, कब्ज, मुंहासे, नींद टूटना।

अधिकांश महिलाओं में स्वस्थ जीवन शैली और आत्मिक नियंत्रण से इसका सामना किया जाना चाहिये। नमक, चाय, काफी, शक्कर आदि कम लें। साबुत अनाज, फल, सलाद अधिक लें।  नियमित व्यायाम करें। योग करें। नींद पूरी लेने की कोशीश करें। Meditation (ध्यान) लगाना सीखें।

कुछ महिलाओं ये लक्षण जारा ज्यादा ही तीव्र हो जाते हैं। तब इस अवस्था को कहते है-

  1. PMDD (Premenstrual Dysphoric Disorder)

प्री-मेन्स्ट्रअल अर्थात माहवारी के पहले, डिस्फोरिया अर्थात भावनात्मक पीड़ा।

ऐसी स्थितियों दर्द निवारक और बैचेनी कम करने वाली औषधियां लेना पड़ सकती है।  Pain Killers और Anti-Anxiety, Anti-Depressant. Diuretics (पेशाब बढ़ा कर शरीर पानी कम करना) ।

परिवार नियोजन के उद्देश्य से ली जति वाली Oral Contraceptive Pills (जिनमें इस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रान होते है) से PMS के लक्षण दब जाते है।

  1. Catamenial exacerbations of other disease

मिर्गी, माइग्रेन और कुछ अन्य बिमारियों के लक्षण माहवारी दिनों में बढ़ जाते हैं

 

6.1 माहवारी के रोगों की प्रमुख पैथालाजी

ये रोग क्यों पैदा होते है? बहुत सी महिलाओं में तमाम जाचें करवाने के बाद भी कारण नहीं मिलता। हरेक व्यक्ति का हार्मोन चक्र अलग अलग होता है।  एक लिमिट से थोड़ा कम ज्यादा हो जावे तो मुश्किलें आती है।

  1. फाइब्राइड – गर्भाशय में Benign गांठे
  2. गर्भाशय, ओवरी, सर्विक्स, वेजाइना आदि में संक्रमण (Infection)
  3. उपरोक्त अंगों में केन्सर
  4. Endometriosis (एण्डो मेट्रि‌योसिस), एण्ड्रोमेट्रियम अर्थात गर्भाशय की अन्दरूनी झिल्ली या परत अपनी टिपिकल जगह के अलावा दूसरे स्थानों पर जा पहुंचती है –

गर्भाशय की मोटी Muscular दीवार, ओवरी, ट्यूब, पेल्विस

  1. Adenomyosis एडिनोमयोसिस
  2. खून में थक्का बनने की सामान्य क्षमता का कम हो जाना – (Coagulopathy) बोल-चाल की भाषा में खून का पतला होना।

 

6.2 माहवारी के रोगों के लिये प्रयोगशाला जांचे

  1. C.BC, हीमोग्लोबिन व रक्त मे विभिन्न कणों की संख्या
  2. 2. ब्लड शुगर
  3. थायराइड हार्मोन T3 T4 TSH
  4. इस्ट्रोजन, FSH, LH (रक्त में हार्मोन्स की मात्रा)
  5. पेल्विस की सोनोग्राफी (अल्ट्रासाउण्ड)
  6. Colposcopy, Hysteroscopy, वेजाइना और गर्भाशय के अन्दर दूरबीन डाल कर देखना।
  7. सी.टी. स्कैन, एम. आर. आई.
  8. बयोप्सी – सर्विक्स और बच्चेदानी की अन्दरूनी परत से टिशु का टुकड़ा काट कर निकालना और सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा जांच के लिये भेजना।

 

7.0 Hysterectomy आपरेशन का दुरुपयोग

बच्चे दानी निकालने का बड़ा आपरेशन “हिस्टरेक्टॉमी” अपने देश में जरा ज्यादा ही किया जाता है। अनेक अवसरों पर उसे टाला जा सकता है। कुछ प्रमुख कारण निम्न है—

·        फाइब्राइड (गर्भाशय में Benign गांठ)

·        Menorrhagia (मासिक के समय खून अधिक बहना)

·        Polymenorrhea (माहवारी जल्दी-जल्दी आना)

·        Dysmenorrhea (माहवारी समय निचले पेट व पेढू में दर्द होना)

·        थोड़ा सा Prolapse (बच्चे दानी का नीचे खिसकना)

·        Pelvic Inflammatory Disease (पेल्विस/पेढू में इन्फेक्शन होना)

उपरोक्त अवस्थाओं में बिना आपरेशन के, दवाइ‌यों और अन्य उपायों से लाभ हो सकता है। हमारे डाक्टर जरा जल्दी ही आपरेशन की सलाह देते है। महिलाओं की मानसिकता भी इस विकल्प को आसानी से स्वीकार करने की और खुद हो कर इसकी Demand करने की बन गयी है।

यह गलत है, विज्ञान सम्मत नहीं है। मेनोपॉज आयेगा जब आयेगा। 45-50 की उम्र के बाद। यहां तो हालत यह है कि 25-30 वर्ष आयु की महिलाओं के यूटेरस निकाल बाहर किये जाते हैं।

उनकी माहवारी बन्द हो जाती है।

शायद उन्हें अच्छा लगता हो? शायद नहीं? मासिक धर्म एक छोटा मोटा Nuisance भले ही हो लेकिन उसे समय से पहले खो देना अनेकों महिलाओं के लिये “स्त्रीत्व की पहचान के एक अंश” को खोने के बराबर होता है।

Ovary (अण्डाशय) प्राय: अन्दर छोड़ दिये जाते हैं। लेकिन यूटेरस की अनुपस्थिति में अण्डाशय Confuse हो जाते हैं। उनका परिवार टूट जाता है। उनके एनाटॉमिकल, फिजियालाजिकल और हार्मोनल सन्तुलन गड़बड़ा जाते है। अण्डाशय द्वारा निकलने वाले हार्मोन जो 45-55 की उम्र की बाद कम होते, वे पहले ही घटने लगते है। शिष्य रुपी यूटेरस की अनुपस्थिति के कारण गुरु रूपी ओवरी में सन्यास भाव आने लगता हैं।

Surgical menopause नामक इस अवस्था के अनेक दीर्घगामी दुष्परिणाम होते हैं।

 

7.1 कुंवारी बालिकाओं का यूटेरस निकाला गया

अनेक दशकों पूर्व समाचार पत्रों से एक विवाद के बारे में जाना था। मन्द बुद्धि बालिकाओं के एक रिहायशी स्कूल बनाम होस्टल में गर्भाशय निकालने के आपरेशन करवा दिये गये थे। सबकी सहमति थी। होस्टल के टीचर्स, प्रबन्धक, सहायक स्टाफ, बच्चियों के माता-पिता और डाक्टर्स। ये लड़‌कियां स्वयं की साफ-सफाई का ध्यान नहीं रख सकती थी। Sexual शोषण के चलते गर्भ धारण की आशंका बनी रहती थी। इसी सोच के चलते आपरेशन किये गये थे। अभी भी कहीं-कहीं किये जाते होंगे। अनेक प्रगतिशील Feminists ने इसका घोर विरोध किया था। इसे बिना एक व्यक्ति की अनुमति के उसके शरीर से छेड़छाड़ कहा था। लानत-मलामत भेजी थी, समस्त स्टाफ और माता-पिता पर कि नैतिक और मानवीय जिम्मेदारी से पल्ला झाड़‌ने के लिये वे अबोध लड़‌कियों का Mutilation (देह विकृतीकरण) कर रहे है।

बदले में लोगों ने इन नारीवादियों को खूब खरी-खोटी सुनाई थी। “पर-उपदेश कुशल बहुतेरे।”

यदि आपके परिवार में ऐसी बच्ची होती तो हम देखेंगे कि आप क्या करेंगे?

8.0 Menopausal Hormone Therapy (रजोनिवृत्ति हार्मोन उपचार)

स्त्रीत्व की पहचान केवल जननांगों से नहीं होती। पूरी काया के रुप निर्माण में तथा फिजियोलॉजी पर हार्मोन्स का निर्णायक असर रहता है।

मासिक धर्म के शुरू होने (Menarche) से लेकर प्रति माह रक्त स्राव होने, गर्भ के ठहरने और न ठहर पाने, से लेकर प्रौढ़ावस्था में Menstruation बन्द हो जाने तक एण्डोक्राईन सिस्टम का आर्केस्ट्रा लीडर अपनी छड़ी घुमाता रहता है।

ययाति की पौराणिक गाथा को आधुनिक सन्दर्भ के साथ जानना हो तो मूर्धन्य मराठी साहित्यकार वि.स. खाण्डेकर का इसी नाम का उपन्यास पढ़िये।

ययाति जैसे नायक के समान यौवन की लालसा वाले नारी पात्र शायद होते होंगे लेकिन पुराण कथाओं, लोक कथाओं और आधुनिक साहित्य में पढ़‌ने को नहीं मिले।

रजोनिवृत्ति (Menopause) के साथ होने वाले एनाटॉमिकल और फिजियोलाजिकल परिवर्तनों को अधिकांश महिलाएं जीवन के एक सामान्य अनिवार्य दौर के रूप में स्वीकार करती हैं। करना भी चाहिये। बढ़ती उम्र को गरिमा के साथ जीना चाहिये। फिर भी “ये दिल मांगे मोर।” मालूम है बुढ़ापा आना है। उसे तनिक सा टालने का मन करता है।

स्त्री और पुरुष दोनों चाहते है कि उनकी चमड़ी पर झुर्रियां कम पड़े, दाँत और बाल बने रहे, चश्मा और Hearing Aid न लगाना पड़े। यौन क्रिया में रुचि, सामर्थ्य और आनन्द बना रहे।

इस चक्कर में कुछ महिलाएं सोचती है, ओवरी ने इस्ट्रोजन हार्मोन बनाना कम कर दिया तो क्या, मैं उसकी टेबलेट क्यों न लेना शुरू कर दूं। ईस्ट्रोजन की क्रीम लगाने से मेरी वेजाइना का सूखापन कम हो जायेगा, सेक्स करते समय दर्द नहीं होगा। मेरे पुरुष साथी से जुड़ाव का एक पहलू जारी रहेगा।

अधिकांश स्त्री रोग विशेषज्ञ मीनोपॉज के बाद Menopausal Hormone Therapy (MHT) की मनाही करते हैं। वर्ष 2002 में अमेरिका में एक बड़ा अध्ययन प्रकाशित हुआ था। Women’s Health Initiative Study (WHI) । हजारों महिलाओं का अनेक वर्षों तक लेखा-जोखा रखा गया था। उसके निष्कर्ष MHT के विरुद्ध थे।

स्तन, बच्चेदानी की अन्दरुनी परत (Endometrium), ओवरी जैसे अंगों के कैंसर का खतरा माना जाता था। हार्ट अटैक और ब्रेन अटैक (स्ट्रोक) की आशंका जताई जाती थी।

बाद के वर्षों में क्लीनिकल रिसर्च विशेषज्ञों ने WHI स्टडी की गम्भीर खामियां बताई। उस अध्ययन में 60 वर्ष से अधिक की महिलाओं का बाहुल्य था। अब माना जाता है कि 60 वर्ष की उम्र से कम या मेनोपॉज के दस वर्ष के भीतर भीतर वाली स्त्रियों में उपरोक्त दुष्परिणाम नहीं होते।

पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि MHT अनेक मामलों में लाभदायी है हालाँकि सटीक केस सिलेक्शन अत्यंत आवश्यक है।

अगले दो दशकों तक मीनोपॉज के अनेक कठिन दुष्प्रभावों से प्रभावित महिलाएं हार्मोन उपचार से वंचित रखी गई। भय का माहौल बना दिया गया था।

  1. रजोनिवृत्ति के बाद 10-15 वर्षों तक Hot Flashes या Hot Flashes एक बड़ी समस्या रहती है। दिन में अनेक बार खूब गर्मी लगती है, पसीना आता है। MHT से तुरन्त फायदा होता है।
  2. वेजाइना का सूखापन और खुजली कम होती है, सेक्स करने में दर्द नहीं होता।
  3. मूड के उतारचढ़ाव कम हो जाते है। चिड़‌चिड़‌ापन, गुस्सा, उदासी, रुलाई आदि पर नियंत्रण होता है।
  4. नींद बेहतर होती है।
  5. हड्डियों की मजबूती बनी रहती है। Osteoporosis कम होता है।
  6. डाइबिटीज और हार्ट अटैक की आशंका 30-50% घट जाती है।
  7. बाद की उम्र में होने वाले बुद्धिक्षय, डिमेन्शिया, अल्जाइमर रोग को कुछ वर्षों के लिये टाला जा सकता है।
  8. आयु बढ़ती है।
  9. जिन महिलाओं में कम उम्र में ही बच्चेदानी निकालने का आपरेशन (Hysterectomy) करने से या अन्य कारणों से समय से पूर्व जरा जल्दी ही माहवारी चली जाती है (Premature menopause) उनमें HRT की जरूरत और भी अधिक होती है।

एक तर्क ये भी दिया जाता है कि जब पुराने जमाने में MHT नहीं था तब भी तो स्त्रियां मेनोपाज के बाद की जिन्दगी को सहज भाव से स्वीकार करती थी। उन्हें लगता है कि MHT बुढ़ापे को टालने का एक लालची, कृत्रिम उपाय है। मृगतृष्णा है। कब तक टालोगे? नये-नये तरीके इजाद होंगे। बुढ़ापे के साथ आने वाले अनुभवों और गरिमा को क्यों नकारना?

किन्तु मनुष्य की जिजीविषा नितान्त प्राकृतिक है। चिकित्सा विज्ञान बना ही इस काम के लिये है। हर इन्सान को लम्बे समय तक स्वस्थ रहने का मौलिक अधिकार है।

तथाकथित “Natural” से इतना मोह है तो समस्त आधुनिक उपचार लेना बन्द कर दो। यदि मनुष्य अनेक वर्षों तक सक्रिय और आत्मनिर्भर बना रहना चाहे तो उसमें अप्राकृतिक या अनैतिक क्या है?

 

9.0 माहवारी की समस्याओं / तकलीफों से परेशान स्त्रियों के लिये
मेडिकल प्रगति के माध्यम से बेहतर भविष्य की संभावनाएं

हाल के रुझान बताते हैं कि लंबे समय से उपेक्षित महिलाओं के स्वास्थ्य मुद्दों विशेषकर मासिक धर्म संबंधी विकार, एंडोमेट्रियोसिस और रजोनिवृत्ति की ओर अब गंभीर और सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। इसके पीछे मेडिकल रिसर्च, जन जागरूकता और शासकीय स्तर पर बेहतर नीतियां है। मासिक धर्म से जुड़े “टैबू और चुप्पी” को तोड़ा जा रहा है और इसे एक मौलिक मानवाधिकार तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।

 

9.1 मेडिकल रिसर्च: न केवल माहवारी बल्कि समग्र रूप से स्त्रियों की स्वास्थ्य समस्याओं पर रिसर्च फण्डिंग बढ़ी है, अच्छे और अधिक संख्या में शोध पत्र प्रकाशित हो रहे है।

A.I. (आर्टीफिशियल इन्टेलिजेन्स) के माध्यम से बड़ी संख्या में आंकड़े (Big Data) इकठ्ठा करना और उन्हें विश्लेषित करना आसान हो गया है । लाखों महिलाओं के मासिक चक्र का फालोअप किया जा रहा है।

 

9.2 आर्थिक परिदृष्य: बाजारी शक्तियां (Market Forces) इस बात को समझ रही है कि स्त्रियों में शिक्षा, जागरूकता, रोजगार आदि बढ़ने से उनकी आवश्यकताओं को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता । FemTech उद्योग 50 अरब डालर से अधिक का हो गया है।

 

9.3 स्वास्थ्य नीतियों में प्रगतिशीलता: भारत सरकार के 2024 में लागू “मासिक धर्म स्वस्छता नीति” के तहत स्कूल जाने वाली बालिकाओं को सेनीटरी उत्पाद उपलब्ध कराना शामिल है।

शासकीय और निजी आफिस, कारखाने आदि जगहों पर रजस्वला महिलाओं के लिये सुविधाएं बताई जा रही है। विशेष अवकाश की स्वीकृति मिलने लगी है। World Bank और WHO दुनिया के समस्त देशों को इस दिशा में प्रोत्साहित कर रहे है।

टेम्पून, सेनीटरी पैड्स, मेन्स्ट्रुअल कप आदि पर से टैक्स कम किये जा रहे हैं।

 

9.4 एडवोकेसी / पैरवी: दुनिया भर में 28 मई को मासिक धर्म स्वच्छता दिवस मनाया जाने लगा है। इसका उद्देश्य “PeriodFriendlyWorld” को बढ़ावा देना है। अनेक सामाजिक संगठन (NGO) इस दिशा में काम कर रहे हैं। Society for Women’s Health Research जैसी संस्थाएं स्त्री-पुरुष के स्वास्थ्य में अन्तर को कम करने में लगी है।

 

9.5 सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव: अब महिलाओं के दर्द को “सामान्य” मानकर अनदेखा करने के बजाय उसे गंभीरता से लिया जा रहा है। इसी बदलाव ने शोध और निवेश में वृद्धि को प्रेरित किया है, भले ही यह अभी भी पर्याप्त न हो।

समग्र रूप से, यह परिवर्तन केवल चिकित्सा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक सोच, नीति निर्माण और आर्थिक निवेश में भी व्यापक बदलाव का संकेत देता है।

 

10.0 References (सदर्भ स्रोत)

  1. “जानवरों में एस्ट्रस (estrous) और मासिक धर्म (menstruation) के विकास” पर कुछ अच्छे यूट्यूब वीडियो
  2. A. Oestrus Cycle | क्या जानवरों को भी Periods होते हैं

यह वीडियो एस्ट्रस साइकिल क्या है, जानवरों में पीरियड्स क्यों नहीं होते (ज्यादातर मामलों में), और कुछ प्रजातियों में मासिक धर्म कैसे विकसित हुआ, इसकी सरल व्याख्या करता है।

लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=IH12eKd2Hzk

(लगभग 5-10 मिनट, आसान भाषा में समझाया गया)

  1. B. Difference Between Menstrual Cycle And Oestrus Cycle | इंसानों और जानवरों के Periods में अंतर

यह वीडियो मनुष्यों के मासिक चक्र और अधिकांश जानवरों के एस्ट्रस चक्र के बीच मुख्य अंतर बताता है, साथ ही विकासीय (evolutionary) कारणों पर भी चर्चा करता है।

लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=cIaLiCyDO-k

(संक्षिप्त और तुलनात्मक व्याख्या, अच्छा क्लैरिफिकेशन देता है)

  1. C. 12th Biology Chapter 1 | Mammals, Menstrual Cycle and Estrus Cycle | By Jitish Sir

कक्षा 12 बायोलॉजी के अनुसार स्तनधारियों में मासिक चक्र और एस्ट्रस चक्र की तुलना, विकास और हार्मोनल नियंत्रण पर फोकस। अच्छा अकादमिक वीडियो।

लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=IHgavIoV1Sk

(लंबा लेकिन विस्तृत, NCERT आधारित)

  1. Why do women have periods?

Link: https://www.youtube.com/watch?v=cjbgZwgdY7Q

  1. Three Surprising Questions about Periods

Link: https://www.youtube.com/watch?v=fUxRKKvwTCU

  1. Van Lonkhuijzen, R. M., Garcia, F. K., & Wagemakers, A. (2023). The Stigma Surrounding Menstruation: Attitudes and Practices Regarding Menstruation and Sexual Activity during Menstruation. Women’s Reproductive Health, 10(3), 364–384.

Link: https://doi.org/10.1080/23293691.2022.2124041

  1. Alhelou N, Kavattur PS, Olson MM, Rountree L, Winkler IT. Menstruation, Myopia, and Marginalization: Advancing Menstrual Policies to “Keep Girls in School” at the Risk of Exacerbating Inequalities. Health Hum Rights. 2022

Dec;24(2):13-28. PMID: 36579303; PMCID: PMC9790947.

————-

Questionnaire – Google form

माहवारी के बारे में आपकी जानकारी

The Biological and Social Science of Menstruation in Animals & Humans

https://forms.gle/WMzhmPjJsrbreoi56

Survey Form – Google form

माहवारी के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण और अनुभव

https://forms.gle/9PxTohKM6vdubcn76

 

***