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व्यंग्यकारों की सबसे अनूठी और दुर्लभ क़िस्म

व्यंग्यकारों की सबसे अनूठी और दुर्लभ क़िस्म

मुकेश नेमा

व्यंग्यकारों की सबसे अनूठी और दुर्लभ क़िस्म के बारे में बताएँ आज आपको। ये वो हैं जो अपने आप बने और क्यों बने पता नहीं , वाली क़िस्म के हैं। आप शरद जोशी ,हरिशंकर परसाई ,शंकर पुणताबेंकर ,रविन्द्रनाथ त्यागी ,ज्ञान चतुर्वेदी और प्रेम जनमेजय को बेझिझक शामिल कर सकते है इनमें। इन्होंने या इनके माँ बाप ने यह हरगिज़ तय नहीं किया था कि ये व्यंग्यकार बने।ये जो भी बने उसके अलावा व्यंग्यकार भी बने।उनके और कुछ बनने पर उनके अंदर का व्यंग्यकार इस कदर हावी हुआ कि ये बेबस होकर रह गए। ये व्यंग्यकार क्यों बने ,ये शायद खुद इन्हें ही पता ना हो। ये बने नहीं ,बने बनाये पैदा हुए।ये हवा मे गाँठ लगाने का हुनर जानते थे। लोग इन्हें पढ़कर मुस्कुराए ,ठिठके हैरान हुए, चौंके और सोचने पर मजबूर हुए। इनमें इतना अधिक तीखापन था कि दुनिया तिलमिला उठी और और यह मानने पर मजबूर हुई कि ये जो लिखते है वो व्यंग्य है।

 

व्यंग्यकारों की एक किस्म और होती है। डरते डरते बने वाली। सरकारी बाबू इस क़िस्म के व्यंग्यकार है। ये वो किताबी कीड़े है जो दुर्घटनावश व्यंग्यकार बने।वे लिखते तो है पर नौकरी से हाथ धो लेने का ख़तरा उनके लिखे का नमक कम कर देता है।ये खुद के लिेखे से डरते है ,लिखते के बाद यह सोचते है कि कोई उसका वो मतलब ना निकाल ले जो वाक़ई निकाला जाना चाहिए। डरे होने के बावजूद ये लगातार लिखते है।ये व्यंग्यकारों की एक निरापद क़िस्म है। इनके लिखे व्यंग्य आमतौर पर बेस्वाद होते है पर कभी कभी झोंक में ये भी पढ़ने लायक़ भी लिख जाते है।

शिवना साहित्य समागम सीहोर में व्यंग्यकारों की ऐसी ही दो किस्में मिली आपस मे। अपने आप बनी वाली किस्म चुटीली और खुशमिजाज थी। सरकारी वाली किस्म भी लगभग ऐसी ही थी। सो ये मिलना मजेदार था। सोचा आप को भी बता दिया जाए।