
‘Animal Love’ Takes a Dangerous Turn: जानवरों से प्रेम ‘इबादत’ है या ‘सनक’? जब कुत्ते के चक्कर में टूट गया मंडप !
वेद माथुर

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर से एक अजीबोगरीब खबर आई। एक शादी समारोह चल रहा था, खुशियों का माहौल था, लेकिन तभी दुल्हन के पालतू कुत्ते को लेकर विवाद शुरू हुआ। दूल्हे पक्ष के किसी व्यक्ति ने कुत्ते को डांटा या मार दिया, और देखते ही देखते लाठी-डंडे चल गए। नतीजा? दुल्हन ने शादी तोड़ दी। हालांकि बाद में ड्रामा जारी रहा और वह वापस दूल्हे के घर पहुंच गई, लेकिन इस घटना ने एक बड़े सामाजिक सवाल को जन्म दे दिया है।
क्या हमारा पशु प्रेम अब एक ‘मानसिक सनक’ बनता जा रहा है?
प्रेम करिए, पर अंधे मत बनिए:
पशुओं के प्रति दया भाव रखना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है, लेकिन आज के दौर में यह ‘एनिमल लव’ एक खतरनाक मोड़ ले चुका है। कई लोग कुत्तों के प्रेम में इस कदर अंधे हो रहे हैं कि उन्हें इंसानी जान की कीमत कम लगने लगी है।
तथ्य डराने वाले हैं:
* हर साल हजारों लोग रेबीज और कुत्तों के हमलों में अपनी जान गंवा रहे हैं।
* लाखों बच्चे और बुजुर्ग आवारा कुत्तों के आतंक के कारण सड़कों पर निकलने से डरते हैं।
* गंभीर रूप से घायल होने वालों की संख्या का तो कोई सटीक आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है।
यूरोप का उदाहरण: वहां ‘आवारा’ शब्द ही नहीं है
अक्सर हम पश्चिम की नकल करते हैं, लेकिन क्या हमने गौर किया कि पूरे यूरोप में आपको सड़कों पर एक भी आवारा कुत्ता नहीं दिखेगा?
वहां नियम सख्त हैं। अगर आप कुत्ता पालते हैं, तो उसकी पूरी जिम्मेदारी आपकी है। अगर वह सड़क पर है, तो वह लीश (पट्टे) पर होगा।
हमारे यहाँ स्थिति इसके विपरीत है। हम सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाकर पुण्य कमाना चाहते हैं, लेकिन वही कुत्ता जब किसी राहगीर को काटता है, तो खिलाने वाले अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं।
नगर पालिकाओं की विफलता और हमारा कड़वा सच
सच तो यह है कि हमारी नगर पालिकाएं और प्रशासन आवारा पशुओं को मैनेज करने में पूरी तरह फेल हो चुके हैं।
* वैक्सीनेशन का अभाव: न तो समय पर नसबंदी होती है, न ही रेबीज के इंजेक्शन लगते हैं।
* बंदरों का आतंक: शहरों में घुस आए बंदरों ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है।
जब सिस्टम फेल हो जाए, तो समाधान कड़वे होते हैं। क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम भावनाओं को किनारे रखकर ‘एलिमिनेशन’ (पूर्ण समाधान) जैसे कड़े विकल्पों पर विचार करें? आवारा कुत्तों और बंदरों की बढ़ती संख्या अब एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (Public Health Emergency) बन चुकी है।
पशु प्रेम का अर्थ यह नहीं है-
पशु प्रेम का अर्थ यह नहीं है कि आप समाज को खतरे में डाल दें। अगर किसी पालतू या आवारा कुत्ते की वजह से इंसान का खून बह रहा है या सालों पुराने रिश्ते टूट रहे हैं, तो समझ लीजिए कि यह प्रेम नहीं, एक मनोविकार है।
हमें यह तय करना होगा कि गलियां इंसानों के चलने के लिए हैं या जानवरों के राज के लिए।
प्रेम और पागलपन के बीच एक बारीक रेखा होती है, उसे पहचानिए।
क्या आप भी मानते हैं कि आवारा कुत्तों की समस्या का अब अंतिम समाधान जरूरी है? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।
वेद माथुर
लेखक, बैंकर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर
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