1.विवाह एक संस्कार था, अब उत्सव हो गया-मनीष मिश्रा

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1.विवाह एक संस्कार था, अब उत्सव हो गया-मनीष मिश्रा
रायपुरफ़ोटो के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.

विवाह एक संस्कार था, अब उत्सव हो गया, पहले एक स्त्री और पुरुष की शादी नहीं होती थी, परिवारों की शादी हुआ करती थी। थोड़ा बहुत अभी अग्रवालों, जैनों में यह व्यवस्था बची हुई है। पहले घर के बड़े बुजुर्ग शादी में ठुमके लगाते नहीं दिखते थे, उनको बारात के डांस में लाना याने एक टास्क होता था, वह सम्मान था, उनका। परिवारों में बुजुर्गों ने एक डिग्निटी बना कर रखी हुई थी। आधुनिकता और शिक्षा के ग़लत मायने निकाल कर, वह दूरियाँ हटा दी गईं। अब बुजुर्ग पुराने ख्याल के आउटडेटेड हो गए। शादी पहले 5 दिन और बाद में 3 दिनों में सिमटी। अब डेढ़ दिन का समय आ गया।

रिश्तों की जान अपेक्षा और उपेक्षा में बदल गई, जैसा आप करोगे, वैसा व्यवहार हम करेंगे, ने रिश्तों में गर्माहट कम कर दी। यहाँ तक की बिना काम के रिश्ते भी बंद से हो गए हैं। परिवारों में रिश्तों से ऊपर आर्थिक पक्ष महत्वपूर्ण हो गया। पहले संस्कार से रिश्ते थे, अब कौन कितना पैसे वाला, उसको वैसी अहमियत ने विवाह की रौनक समेट दी। खाने की पंगत में बैठने वालों से प्लेट लेकर रिसेप्शन में खड़े होकर खाने के सफ़र में मँहगाई 30 रुपये के खाने से 3000 रू पर प्लेट ने ख़ास रिश्तेदारों और स्वजन की सूची सीमित कर दी। काम आपस में रिश्तेदारों को बाँटना नहीं चाहते। फिर उम्मीद की सब खड़े रहें, बेमानी होगी। विवाह में सबको काम बाँटेंगे तभी ख़ुशबू लौटेगी ।

मनीष मिश्रा
रायपुर

2.आजकल विवाह एक संस्कार नहीं प्रतियोगिता बन गया है —-डॉ अनिता नाईक

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आजकल विवाह एक संस्कार नहीं प्रतियोगिता बन गया है पहले विवाह घर में ही संपन्न हो जाते थे, मिट्टी का आँगन… आम के पेड़ के नीचे बिछी दरी… और औरतों के गले से निकलते वे पारम्परिक गीत, जिनमें हँसी भी थी और आशीर्वाद भी। उस समय हल्दी की रस्म की महक घर की दीवारों तक बस जाती थी। औरतें हँसते-गाते हल्दी लगातीं, ढोलक बजती, सखियाँ चुटकियाँ लेतीं। अब हल्दी भी थीम के अनुरूप हो गई है। फोटोशूट के लिए रंगों का चुनाव होता है, रस्मों की आत्मा के लिए नहीं।
अब विवाह का आयोजन रोशनी से जगमगाते बड़े बड़े बैंक्वेट हॉल में होता है। सजावट ऐसी होती है कि मानो किसी फिल्म का सेट हो। डीजे की तेज धुन पर बच्चे-बड़े सब झूमते हुए मिलते है। सजावट के लिए फूल विदेशों से मंगवाए जाते हैं, खाना पचास प्रकार का बनता है और मेहमानों के स्वागत के लिए भी अलग से इवेंट मैनेजमेंट कंपनी के लोग मिलते है तो अब पहले जैसी खुश्बू कहाँ मिलेगी ?
वर्तमान के विवाह परिवार के लिए एक चुनौती बन चुका है इस नई परम्परा को कोई भी माता-पिता पसंद नहीं करते है और यदि बेटी की शादी है उसमें कोई कमी न रह जाए। समाज क्या कहेगा? रिश्तेदार क्या सोचेंगे? महँगाई आसमान छू रही है। सोने के गहने, बैंक्वेट हॉल का किराया, कैटरिंग, कपड़े, गिफ्ट — हर चीज़ ने बजट की सीमा तोड़ दी। पर बेटी की खुशी और परिवार की प्रतिष्ठा के सामने माता पिता अपनी चिंताएँ छुपाएँ न छुपा सकते है ।
अब प्रतिष्ठा की होड़ में विवाह केवल दो आत्माओं का मिलन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रदर्शन का मंच बन गया है। किसने कितने बड़े होटल में शादी की? कितने व्यंजन थे? दूल्हा किस गाड़ी में आया?
कई माता-पिता अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर देते हैं — कर्ज़ तक ले लेते हैं — ताकि मान-सम्मान बना रहे। पर इस दौड़ में कहीं भावनाएँ पीछे छूट जाती हैं।
ऐसे में हम ढूंढते है कि इन रस्मों की खुश्बू जिससे हमें संतोष और सुकून प्राप्त होता था।
असल में वो असली खुश्बू क्या थी? वह खुश्बू थी, अपनेपन की।
वह खुश्बू थी, रिश्तों की सादगी की।
वह खुश्बू थी सामूहिक श्रम की — जब पूरा मोहल्ला मिलकर शादी करवाता था।
आज सब ‘पेशेवर’ हो गया है — सजावट से लेकर मेहमाननवाज़ी तक, इसी से रिश्तों की गर्माहट ठंडी पड़ती जा रही है।
परंपरा केवल रस्मों में नहीं, भावना में होती है।
यदि हम दिखावे की जगह भावनाओं को महत्व दें, तो भव्यता और परंपरा साथ-साथ चल सकती हैं।
आज आवश्यकता है कि खर्च कम हो तो भी चलेगा, पर रिश्तों की मिठास बनी रहनी चाहिए।
क्योंकि यादें रोशनी की नहीं, उस पारम्परिक खुश्बू की आती है… जो दिलों में बसती है।
-डॉ अनिता नाईक

3. शादियों पर भी बाजारवाद हावी हो गया है-राघवेंद्र दुबे 

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हमारे विवाह समारोह टीवी सीरियल और फिल्मों के प्रभाव से ग्रस्त हो चुके हैं। शादियों पर भी बाजारवाद इतना हावी हो चुका है की मूल धार्मिक कर्मकांड – दूल्हे की एंट्री, दुल्हन के मेकअप, कपड़ों के प्रदर्शन, रिसेप्शन की दिखावट में दबकर रह गया है।
चलताऊ गानों पर भोंडा नृत्य प्रदर्शन इतनी देर तक चलता है कि जिस शुभ घड़ी में लग्न का मुहूर्त निकाला जाता है उसका कोई महत्व ही नहीं रह गया है। पहले कोई ना कोई बुजुर्ग इस प्रकार के होते थे जो डांट फटकार कर समय से कार्य करने पर जोर देते थे। आजकल वह पीढ़ी उपेक्षा के कारण मौन होकर तमाशा देखने वाली हो गई है।
अगर इस स्थिति में परिवर्तन लाना है तो प्रयास नई पीढ़ी को ही करना होगा।

4.भव्य होते विवाह समारोह सांस्कृतिक गंध से रीते-डॉ आरती दुबे

भव्य होते विवाह समारोह सांस्कृतिक गंध से रीते क्यों?

वाह… विषय ही ऐसा है कि सीधे दिल में उतरता है।आज सच में यह प्रश्न खड़ा होता है — रोशनी बढ़ी है, पर उजाला घटा क्यों है?

भव्य होते विवाह समारोह सांस्कृतिक गंध से रीते ?

भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो वंश परंपराओं का संगम माना गया है। वैदिक परंपरा में विवाह को संस्कार कहा गया — अर्थात जीवन को परिष्कृत करने की प्रक्रिया। पर आज के दौर में प्रश्न उठता है कि जब विवाह समारोह पहले से अधिक भव्य, खर्चीले और तकनीकी रूप से आकर्षक हो गए हैं, तो उनमें वह सांस्कृतिक सुगंध क्यों क्षीण होती जा रही है?

1. विवाह: संस्कार से इवेंट तक

पहले विवाह का केंद्र विधि-विधान और संस्कारिक अर्थ हुआ करता था। सप्तपदी के मंत्र, कन्यादान की भावना, अग्नि की साक्षी — सबका एक आध्यात्मिक आधार था।आज विवाह एक “इवेंट” बन चुका है। वेडिंग प्लानर, थीम डेकोर, प्री-वेडिंग शूट, डेस्टिनेशन मैरिज — सब कुछ है, पर अर्थ का गहरापन कम होता दिखता है। मंत्रों का उच्चारण होता है, पर उनके अर्थ से जुड़ाव नहीं होता।

2. प्रदर्शन की संस्कृति और सामाजिक प्रतिस्पर्धा

आज विवाह सामाजिक प्रतिष्ठा का मंच बन गया है। कौन सा रिसॉर्ट? कितने कोर्स का भोजन? किस डिजाइनर का लहंगा? किस सेलिब्रिटी सिंगर की प्रस्तुति?भव्य सजावट, लाइटिंग और आतिशबाज़ी के बीच विवाह की आत्मा कहीं दब जाती है।
यह प्रतिस्पर्धा संस्कृति नहीं, उपभोक्तावाद को जन्म देती है।

3. लोक परंपराओं का क्षरण

भारतीय विवाहों में क्षेत्रीय लोकगीत, पारंपरिक वेशभूषा, घरेलू रस्में और सामूहिक सहभागिता की गहरी परंपरा रही है।
आज डीजे की तेज धुनों में वे लोकगीत दब गए हैं।हल्दी और मेहंदी की रस्में भी “फोटो-सेशन” का हिस्सा बन गई हैं।
जहाँ पहले पूरा गाँव या मोहल्ला सहभागी होता था, अब आयोजन सीमित मेहमानों और दिखावे तक सिमट गया है।

4. आध्यात्मिकता से दूरी

विवाह का मूल उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की संतुलित यात्रा का आरंभ था।अग्नि के समक्ष लिए गए वचन जीवन के नैतिक अनुबंध होते थे।पर आज अधिकांश नवदंपत्ति स्वयं उन वचनों का अर्थ नहीं जानते।संस्कार की आत्मा अनुवाद की प्रतीक्षा में खड़ी है।

5. मीडिया और बाज़ार का प्रभाव

फिल्मों और सोशल मीडिया ने विवाह को एक “ड्रीम प्रोजेक्ट” बना दिया है।तस्वीरें और वीडियो प्राथमिक हो गए हैं, अनुभव और भाव गौण।जब विवाह का केंद्र “कैमरा” हो जाता है, तब संस्कार की गंध स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है।

तो फिर प्रश्न है कि समाधान की दिशा क्या हो ?तो क्या भव्यता त्याज्य है? नहीं।भव्यता समस्या नहीं है — अर्थहीन भव्यता समस्या है।

मंत्रों का अर्थ समझाया जाए।
लोकगीत और पारंपरिक रीति-रिवाजों को पुनर्जीवित किया जाए।
विवाह को सामाजिक प्रतिस्पर्धा नहीं, सांस्कृतिक उत्सव बनाया जाए।
सादगी और गरिमा का संतुलन रखा जाए।
जब आधुनिकता और परंपरा का समन्वय होगा, तब विवाह पुनः अपनी सांस्कृतिक सुगंध से महकेगा।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि विवाह कम भव्य हों, बल्कि इस बात की है कि वे अधिक अर्थपूर्ण हों।
रोशनी, सजावट और संगीत के बीच यदि संस्कार की लौ जलती रहे, तो भव्यता भी संस्कृति की सहचरी बन सकती है।
अन्यथा, हम केवल चमकते मंचों पर संस्कारों की छाया भर देख पाएँगे।

डॉ आरती दुबे

5.आज शादी में केवल प्रदर्शन रह गया है तेल ,मंडप, बन्ना -बन्नी चाक-भात,घोड़ी,रतजगा सब गायब -आशा जाकड़ ‘आस’

आजकल के विवाह भव्य होने के बाद भी घरों में वैवाहिक आयोजनों में पारंपरिक खुशबू क्यों नहीं आती ,ना रीति रिवाज में पारंपरिक रस्में में दिखाई देती है?
विवाह वैदिक परम्परानुसार विवाह एक पवित्र संस्कार है। इसकी सुगंध परिवार को ही नहीं बल्कि आसपास के वातावरण को भी सुगंधित करती थी। आज आपाधापी, सुविधा संपन्न और व्यस्तता के दौर में विवाह परंपरागत ना होकर एक औपचारिक उत्सव बन गया है जिसमें परंपराएं और रीति रिवाज सब गौण हो गए हैं ।बस चटक- मटक ,भड़कीली पोशाक ,नाच गाना रह गया है ।
जो शादी पहले आठ/ 10 दिन में होती थी अब दो दिन में हो रही हैं। 2 दिन में शादी का क्या गाना क्या बजाना ।आज सभी परंपराएं परंपराओं ने औपचारिकता का बाना पहन लिया है। पूरी शादी में ढोल बजता है या डीजे बजता है
आज रीति रिवाज सब खोते जा रहे हैं। शादी एक इवेंट मात्रा हो गई है। मेहंदी हल्दी ने आधुनिक रूप ले लिया है मेहंदी में सभी हरे वस्त्र पूरी सजावट हरी चाहे हाथों में मेहंदी हो या ना हो, हल्दी में सब पीत वर्ण चाहे दूल्हा -दुल्हन के हल्दी ठीक से लगी ही ना हो ।आज शादी में केवल प्रदर्शन रह गया है तेल ,मंडप, बन्ना -बन्नी चाक-भात,घोड़ी,रतजगा सब गायब हो गए हैं जिन पर पहले गीतों की बौछार होती थी। चाक-भात का उत्सव बड़ी धूमधाम से होता था पर आज समयाभाव के कारण यह उत्सव भी छूमंतर सा हो गया है। दो दिन पूरे होते ही मेहमानों का जाना शुरू हो जाता है लड़की की विदाई से पूर्व ही अतिथियों की विदाई प्रारंभ हो जाती है।
विवाह दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो परिवार ,दो संस्कृतियों का मिलन होता है ।पंडित जी श्लोक के द्वारा विवाह का अर्थ बतलाते हैं आज वह भी बड़े संक्षेप में किया जाने लगा है। आज शादी पहले की अपेक्षा बहुत खर्चीली, भव्य सजावट और तकनीकी साधनों से परिपूर्ण होती है।आज शादी में पवित्रता ,आत्मीयता व अपनी संस्कृति व आदर्शवाद सब लुप्त होता जा रहा है।
आजकल प्री वेडिंग शूट होता है जिसमें बहुुत खर्च हो जाता है।जो फूहड़ता का प्रतीक है। आजकल काॅकटेल पार्टी का प्रचलन बढता जा रहा है। जो पाश्चात्य संस्कृति का प्रतीक है। हमारी भारतीय संस्कृति कहां जा रही है, विवाह उत्सव की गरिमा व पवित्रता कम होती जा रही है।

अतः हम कह सकते हैं कि आजकल के विवाह भव्य होने के बाद भी घरों में वैवाहिक आयोजनों में पारंपरिक खुशबू की महक लुप्त होती जा रही है और न रीति रिवाजों में पारंपरिक रस्में दिखाई देती है। वह एक प्रदर्शन उत्सव बनता जा रहा है जिसमें लोग आते हैं खाते पीते हैं लिफाफा देते हैं और जाते हैं। वहाँ भी आजकल सी.सी.टी.वी लगा दिए जाते हैं ताकि मालूम पड़े कौन आया था किसने लिफाफा दिया ,किसने नहीं दिया।

आशा जाकड़ ‘आस’

6.सजावट के साथ संवेदना भी हो और मंच के साथ आंगन की स्मृति भी जीवित रहे, तभी विवाह उत्सव-

आजकल के विवाह पहले से कहीं अधिक भव्य हैं। रोशनी आसमान छूती है, सजावट आंखों को बांध लेती है, आयोजन में कोई कमी नहीं रहती। सब कुछ बड़ा है, व्यवस्थित है, प्रभावशाली है।

लेकिन कभी कभी लगता है कि इस बड़ेपन में कुछ छोटा सा बहुत जरूरी तत्व पीछे छूट गया है- वह अपनापन।

कभी शादी घर की दीवारों से शुरू होती थी। हल्दी की खुशबू रसोई तक जाती थी। मेंहदी लगाते समय हंसी बिना कारण फूट पड़ती थी। दादी की आवाज में गाया गया बन्ना गीत किसी माइक्रोफोन का मोहताज नहीं होता था। विदाई के आंसू सजाए नहीं जाते थे, वे अपने आप आ जाते थे।

आज सब कुछ समय से बंधा है। रस्में पूरी होती हैं, पर उनमें ठहराव कम है। काम किराए के कलाकार करते हैं, अब रस्मों में रिश्तों का हाथ कम लग पाता है।

भव्यता बुरी नहीं है। आधुनिकता भी नहीं। पर विवाह की असली गरिमा रोशनी की ऊंचाई से नहीं, रिश्तों की गहराई से बनती है।

सजावट के साथ संवेदना भी हो और मंच के साथ आंगन की स्मृति भी जीवित रहे, तभी विवाह सच में उत्सव बनता है- “केवल आंखों का नहीं, हृदय का”

7.अब सिर्फ फ़ैशन शो भव्य विवाह रह गया है अतः पारस्परिक रस्में न दिखाई देती- प्रभा तिवारी

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क्योंकि आज के परिवेश में परिवार में ही एक दूसरे को अपना स्टेटस,दिखावा , शोबाजी आडम्बर में व्यक्ति इतना ग्रसित हो गया है कीअपने घर में बुजुर्गों, अपने माता-पिता का, दादा दादी का वो सम्मान, महत्व नही रहा जो पहले के जमाने में था पहले दादा दादी नाना नानी के इर्द-गिर्द बैठकर शादी का मीनू तैयार करते थे औरपहले शादी में 8:15 दिन पहले से परिवार के लोग मामा मामी मौसी, काका काकी सब मिलकर हर काम ,रीति रिवाज से लेकर हंसी मजाक, शादी के गीत ढोलक पर गाती थी भुआ,मामी,मौसी गाती थी डांस करती थी।अब वो सब नगण्य हो गया ।
इसलिए वो जो पारंपरिक खुशबू जो माता पूजन से शुरू होती थी और बेटी की बिदाई तक जो रस्में निभाई जाती थी वो आज के परिवेश में धूमिल हो गई।
पहले महिलाएं पुरुष साधारण सज-धज कर तैयार होते थे और ज्यादा हमारी भारतीय संस्कृति, रीति रिवाज को शादी में मान्यता देते थे अब सिर्फ फ़ैशन शो भव्य विवाह रह गया है अतः पारस्परिक रस्में न दिखाई देती है।

प्रभा तिवारी

8.शादी सिर्फ़ एक घर में होती थी किंतु उत्सव पूरा मोहल्ला मनाता था-सपना उपाध्याय

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आज का विषय मेरे अन्तर्मन में कई वर्षों से उमड़ – घुमड़ रहा था आज अपने विचार इस संदर्भ में व्यक्त करने का अवसर प्राप्त हुआ है ।
हमारी प्राचीन सामाजिक व्यवस्था को चार भागो में बाँटा गया था -(१ )ब्रह्मचर्य आश्रम ०-२५ वर्ष (२) गृहस्थाश्रम २५-५० वर्ष (३) वानप्रस्थ आश्रम ५०-७५ वर्ष (४) सन्यास आश्रम ७५-१०० वर्ष
वैसे तो सभी सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण थे किंतु इनमे गृहस्थाश्रम जीवन को पूर्णता प्रदान करने के कारण अति महत्व रखता था ।
समय बीतता गया और संस्कारों की जगह आडंबर ने लेली ।
पुराने समय की शादी में बेन -बेटियों ,मासी , बुआ का बेसब्री से इंतजार होता था।हर रस्म को बखूबी निभाया जाता था ,कम पकवान सही किंतु साथ बैठ कर हँसी ठिठोली के साथ खाना खाने का स्वाद बड़ा देता था ,अपने -अपने प्रांत बोली अनुसार लोकगीत ,भजन गाने का अपना ही ढंग था दोनों पक्षों द्वारा गाली गाने का मज़ा तो भारत – पाक क्रिकेट देखने जितना आनंद देता था ।सिर्फ़ वर-वधू नहीं दो परिवारों का आजीवन के लिए मिलन होता था ।कोई दिखावा नहीं कोई आडंबर नहीं सिर्फ़ और सिर्फ़ आत्मीयता ।शादी सिर्फ़ एक घर में होती थी किंतु उत्सव पूरा मोहल्ला मनाता था ।मनुहार ऐसी की नावन सात दिन पहले से कुटुंब संग् पामना (मेहमान ) का न्योता दे आती थी ।यदि किसी कन्या के पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती थी तो सब राशि इखट्टा कर कन्या को ब्याह देते थे ।
चलिए अब वर्तमान के विवाह की तरफ़ रुख़ करते है ।
सबसे पहले तो यह तय किया जाता है कि किस दिन के कार्यक्रम में किसको बुलाना है फिर मनुहार पत्रिका ताकि तय हो जाए की कौन -कौन आ रहा है ? किसको कहा ठहराना है इत्यादि सब आपकी आर्थिक स्थिति को देख कर तय किया जाता है । सारे रस्मों रिवाज को ताक पर रखकर बच्चों से लेकर बूढ़ो का रुझान सिर्फ़ कपड़ो और अन्य दिखावे की वस्तुओं पर केंद्रीत रहता है । वर वधू अपनी मस्ती में मस्त और रिश्तेदार सेल्फी और रील बनाने में मस्त 😃
खाने का तो पुछो ही नहीं साल भर का खाना दो दिनों में खिला दिया जाता है चावल -६ प्रकार के , दाल -४ प्रकार की सब्ज़िया अनगिनत ,मिठाइयाँ ,मेवे और ना जाने क्या क्या माँ अन्नपूर्णा भी सोचती होगी की मेरा क्या हाल कर दिया है ?
सभी शादिया वर्तमान में ऐसी होती है ऐसा भी नहीं है कुछ लोग आज भी बहुत समृद्ध होते हुए भी सादगी पसंद शादिया करते है । शादिया भव्य नहीं शालीन होनी चाहिए जिसमे दिखावा नहीं रीतरिवाज और परंपरा को अधिक महत्व देना चाहिए ।
काश हम सब मिलकर पुनः इस संस्कार को एक नवीन सुंदर रूप दे सके ।

सपना उपाध्याय