
चंद्रशेखर साकल्ले की 2 कविताएं
1.कविता: बस इतना बचा देना
बस इतना बचा देना
बस इतना पानी बचा देना
कि वह नहाकर धूप में
अपने बाल सुखा सके
बस इतनी लकड़ियाँ बचा देना
कि वह अपने घर का चूल्हा
जला सके
बस इतना अनाज बचा देना
कि वह दो जून खाना पका सके
बस इतना कपास बचा देना
कि वह अपने बदन पर कपड़ा
लपेट सके
बस इतनी ज़मीन बचा देना
कि वह कथरी बिछा कर
चैन से सो सके
शेष दुनिया तुम्हारी है
उसे लूटो और नष्ट कर दो।
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2. प्रेम
एक पौधा है
धीरे-धीरे पनपता
एक आग है
धीमे-धीमे सुलगती
एक फूल है
धीरे-धीरे खिलता
एक सुगंध है
धीरे-धीरे मदहोश करती।
एक पुल है
फूलों से बना
प्रेम पथिक है।
एक जगह है मुझमें
जिसमें तुम स्वीकार
एक जगह है तुममें
जिसमें मैं स्वीकार
खुशी की तरह।
एक चुंबक है
खींचता है सारी धाराएँ
मन की।
एक द्वीप है हरा-भरा
जिसमें सिर्फ तुम और मैं।
एक ॠतु है प्रसन्न
दूसरी दुनिया की
फूलों, सुगंध, उत्सव और
आनंद से भरी।

चंद्रशेखर साकल्ले
वरिष्ठ कवि,एक कविता संग्रह प्रकाशित।





