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The Horrors of War: आँचल का कफन

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युद्ध की विभीषिका 

The Horrors of War:आँचल का कफन

डाॅ.दविंदर कौर होरा

युद्ध खत्म नहीं हुआ था,
सिर्फ गोलियां थम गई थीं,
धुआं अब भी हवा में था
और
मातम हर गली में चुपचाप बैठा था।
गाँव के बाहर पीपल के नीचे
जब तिरंगे में लिपटा शरीर पहुंचा,
तो हवा भी ठहर गई,
जैसे समय ने अपनी सांसे रोक ली हों।

माँ आगे बढ़ी, ना आंसू, ना चीख,
बस एक अजीब सी दृढ़ शांति,
उसने कांपते हाथों से तिरंगे को सहलाया,
फिर अपने आँचल को फैलाया और धीरे से बोली,
” बेटा, जब तू छोटा था,
मैं इसी आँचल में तुझे छुपा लेती थी,
हर डर से, हर बुरे सपने से,
आज भी छुपा लेती हूँ,
बस फर्क इतना है कि इस बार तू मुझे मां कह के मेरे आंचल में नहीं लिपट जाएगा ।
मुझे गले नहीं लगाएगा ”

उसने आँचल से अपने शहीद बेटे का चेहरा ढक लिया,
जैसे धूप से बचा रही हो,
जैसे ठंड लग जाएगी उसे।
धरती उस क्षण माँ के साथ रो पड़ी।

पीछे खड़ा बूढ़ा बाप,
जिसकी कमर समय ने पहले ही तोड़ दी थी,
आज और झुक गई।
डगमगाते कदमों से वह आगे आया,
लोगों ने सहारा देना चाहा,
पर उसने हाथ हटा दिए।
“जब चलना सिखाया था, मैंने इसे,
तो ऊँगली थामे था मेरा बेटा।
आज आखिरी बार मैं उसको कंधा दूँगा,”
और वह काँपते कंधों पर अपने
जवान बेटे का भार उठा लेता है।

हर कदम मानो एक युग हो,
हर साँस मानो सीने में धंसता हुआ पत्थर।
लोग कहते हैं वह वीर था,
देश के लिए शहीद हुआ,
पर उसके उस बूढ़े बाप के लिए वह अब भी वही बच्चा है,
जो खेतों में दौड़ता था,
जो कंधों पर बैठकर मेले देखता था।

और तभी भीड़ को चीरती हुई
एक नन्ही सी आवाज आती है,
“दादी, अब मेरी रक्षा कौन करेगा…?

सबकी निगाहें उस छोटी बच्ची पर टिक जाती हैं,
उसकी आँखों में आँसू नहीं,
एक डर है जो शब्दों से बड़ा है,

वह तिरंगे को पकड़ पूछती है,
“पापा उठेंगे ना?
उन्होंने कहा था, मुझे कभी रोने नहीं देंगे,” ।

उसका प्रश्न आकाश में तीर सा
अटक जाता है,
कोई उत्तर नहीं,
सिर्फ सन्नाटा,
इतना गहरा कि युद्ध की सारी
तोपें उसके सामने बौनी लगे।
माँ अपनी पोती को सीने से लगाती है,
पर उसकी अपनी छाती पहले ही खाली हो चुकी है,

बूढ़ा बाप आसमान की ओर देखता है,
शायद पूछता है कि क्या यही जीत है?

हे युद्ध…,

तुम्हारी विजय घोषणाओं
में ये दृश्य क्यों नहीं दिखते?

क्यों नहीं लिखी जाती माँ के आँचल की यह नमी?
बाप के काँपते कंधों की थकान
और उस बच्ची का प्रश्न।

शहीद का नाम पत्थर पर खुद जाएगा,
स्मारक बनेगा, मालाएँ चढ़ेंगी,
पर इस घर की दीवारों पर जो
खालीपन उभरा है,
उसे कौन भरेगा?

रात को जब सब लौट जाएँगे,
माँ फिर उसी बिस्तर को देखेगी,
जहाँ कभी उसका बेटा सोता था,

बूढ़ा बाप दरवाजे की ओर ताकेगा,
आदत से मजबूर
और नन्ही बच्ची आँखें बंद करके सोचेगी,
शायद कल पापा वापस
सचमुच लौट आएँगे।

युद्ध की असली विभीषिका
सीमा पर नहीं,
इन घरों में जलती है,
जहाँ आँचल कफन बन जाता है,
कंधे अर्थी बन जाते हैं
और ..
मासूम सवाल अनुतरित रह जाते हैं।

दोस्त,
अगर कोई पूछे युद्ध क्या है?
तो बस इतना कहना,
यह वह दिन है
जब एक माँ अपने बेटे को,
आखरी बार आँचल ओढ़ाती है।
और ..
एक बच्ची दुनिया से पूछती है,
“अब मेरी रक्षा कौन करे?”

डाॅ.दविंदर कौर होरा