कैंसर इलाज के नाम पर 3.5 करोड़ खर्च :13 साल बाद भी नतीजा शून्य

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कैंसर इलाज के नाम पर 3.5 करोड़ खर्च :13 साल बाद भी नतीजा शून्य

▪️राजेश जयंत▪️

Jabalpur: मध्य प्रदेश में गोबर और गोमूत्र से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज का दावा करने वाली पंचगव्य आधारित शोध परियोजना अब अपने वैज्ञानिक उद्देश्य से अधिक वित्तीय अनियमितताओं के कारण कटघरे में है। यह परियोजना वर्ष 2011 में जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के माध्यम से शुरू की गई थी। लगभग 13 वर्षों तक चली इस योजना में 3 करोड़ 50 लाख रुपये से अधिक की सरकारी राशि खर्च की गई, लेकिन आज तक ऐसा कोई प्रमाणिक वैज्ञानिक निष्कर्ष सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि गोबर–गोमूत्र से कैंसर या किसी गंभीर बीमारी का प्रभावी इलाज संभव हुआ हो।

▪️कब और कैसे शुरू हुआ शोध

▫️यह शोध परियोजना 2011–12 में राज्य शासन की स्वीकृति से शुरू हुई थी। परियोजना का उद्देश्य देशी गाय के गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी (पंचगव्य) के औषधीय गुणों पर शोध कर कैंसर जैसी घातक बीमारियों के उपचार की संभावनाएं तलाशना बताया गया। प्रारंभ में परियोजना का प्रस्तावित बजट लगभग 8 करोड़ रुपये रखा गया था, लेकिन शासन ने चरणबद्ध रूप से 3.5 करोड़ रुपये स्वीकृत किए। यह राशि 2011 से 2018 के बीच अलग-अलग किश्तों में जारी की गई।

▪️शोध के नाम पर हुआ बेतहाशा खर्च

▫️प्रशासनिक जांच में सामने आया कि परियोजना के दौरान खर्च और वास्तविक आवश्यकता के बीच भारी अंतर रहा।

▫️गोबर, गोमूत्र और कच्चे माल की खरीद पर ही करीब 1 करोड़ 90 लाख रुपये खर्च दिखाया गया, जबकि जानकारों के अनुसार इतनी मात्रा की वास्तविक बाजार कीमत 15–20 लाख रुपये से अधिक नहीं बैठती।

▫️शोध के नाम पर एक चारपहिया वाहन (लगभग 7.5 लाख रुपये) खरीदी गई।

▫️ईंधन, रखरखाव और यात्रा व्यय में 7 लाख रुपये से अधिक खर्च दिखाया गया।

▫️फर्नीचर, एसी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और मशीनरी पर 15–20 लाख रुपये खर्च किए गए।

▫️परियोजना अवधि में 23 से अधिक हवाई यात्राएं दर्ज हैं, जिनमें गोवा, मुंबई, बेंगलुरु जैसे शहर शामिल हैं, जिनका शोध से प्रत्यक्ष संबंध स्पष्ट नहीं हो पाया।

▪️वैज्ञानिक परिणाम क्यों नहीं आए

▫️इतने लंबे समय और करोड़ों के खर्च के बावजूद परियोजना से कोई मान्यता प्राप्त रिसर्च पेपर, क्लीनिकल ट्रायल, या कैंसर उपचार से जुड़ा प्रमाणित फार्मूला सामने नहीं आया।

▫️न तो किसी मेडिकल काउंसिल ने इस शोध को स्वीकार किया और न ही इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में लागू किया गया।

▫️आज भी कैंसर का इलाज वही पारंपरिक पद्धतियों पर निर्भर है, जबकि यह परियोजना केवल फाइलों और खर्च विवरणों तक सीमित रह गई।

▪️जांच में क्या उजागर हुआ

▫️शिकायतों के बाद वर्ष 2024–25 में जिला प्रशासन के निर्देश पर गठित जांच समिति ने जब दस्तावेजों की पड़ताल की तो कई गंभीर विसंगतियां सामने आईं।

▫️खर्च कई मामलों में अनुपातहीन पाया गया। कुछ मदों में जरूरत से कई गुना अधिक भुगतान दर्शाया गया।

▫️शोध से होने वाली आय या उपयोगिता लगभग शून्य पाई गई।

▫️जांच रिपोर्ट अब कलेक्टर और संभागीय स्तर पर भेजी जा चुकी है।

▪️प्रशासन और विश्वविद्यालय का पक्ष

विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि सभी खर्च सरकारी नियमों और ऑडिट प्रक्रिया के तहत किए गए हैं। उनका दावा है कि परियोजना का उपयोग प्रशिक्षण और जागरूकता के लिए किया गया। हालांकि प्रशासनिक जांच के बाद यह पक्ष सवालों के घेरे में आ गया है और अब जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया चल रही है।

▪️राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया

▫️मामला उजागर होने के बाद इसे लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। एक पक्ष इसे आस्था और परंपरा से जुड़ा विषय बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या विश्वास के नाम पर विज्ञान और सरकारी धन दोनों से समझौता किया गया। आम जनता के बीच यह सवाल प्रमुख है कि जब अस्पतालों में संसाधनों की कमी है, तब ऐसे शोध पर करोड़ों खर्च करना कितना न्यायसंगत है।

▪️वर्तमान स्थिति और आगे क्यायह मामला पूरी तरह ताजा और प्रासंगिक है।

जांच रिपोर्ट के आधार पर अब यह तय किया जाना है कि-

▫️क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी

▫️क्या राशि की वसूली की जाएगी

▫️और क्या किसी स्तर पर कानूनी कार्रवाई या एफआईआर दर्ज होगी

▪️असल सवाल

▫️यह मामला सिर्फ गोबर–गोमूत्र शोध का नहीं, बल्कि सरकारी धन की जवाबदेही, वैज्ञानिक नैतिकता और नीतिगत प्राथमिकताओं का है।

सवाल साफ है- क्या शोध का मतलब सिर्फ खर्च दिखाना है या फिर समाज को ठोस परिणाम देना भी उतना ही जरूरी है❓

जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक यह पंचगव्य शोध परियोजना शासन प्रशासन की कार्यशैली पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह बनी रहेगी•••