
प्रसंगवश; हमने पानी का सम्मान नहीं किया

हमने पानी का सम्मान नहीं किया। उस पानी का, जो हमारा जीवन है। पानी तो स्वभाव से ही शुद्ध है, वह हमें भी शुद्धता देता है, पवित्रता देता है। हमने कृतघ्न होकर पानी को दूषित किया है, तो हमारा ही जीवन दूषित हुआ। अभी कुछ दशक पहले तक हमारे घर का सबसे पवित्र स्थान वह होता था, जहाँ पीने के पानी से भरे हुए कलश रखे होते थे। देवघर से भी ज्यादा, धार्मिक ग्रंथों से भी ज्यादा पूजाभाव पानी के प्रति होता था। आज पानी को भी बाजार दिखा दिया गया है। पानी सरकार भी बेच रही है, छोटी-छोटी कम्पनियाँ भी। जब से पानी का बाजार भाव लगाया गया, उसे प्लास्टिक की बोतलों में बंद कर मंत्रियों, अफसरों, पैसा फैंक कर हर चीज खरीदने वालों और अय्याशों के आगे पेश किया गया, तब से ही पानी की पवित्रता लुट गई। कुछ समय पहले तक दूर-दराज के गाँवों में जगह-जगह लिखा मिलता था-‘गुरु करो जान, पानी पीयो छान’। अब हम न गुरु की महिमा बरकरार रख सके, न पानी की। ‘वस्त्रपूतं जलं पिबेत्’ तो एक प्रसिद्ध सुभाषित का पानीदार अंश हुआ करता था। सचमुच जब कुए से ,वापी से हमारी माँ-बहनें बहुत श्रम कर पानी भरकर लाती थीं, तब घर के सब बड़े- बुजुर्गों को, बच्चों को, घर आये मेहमानों को पानी का मूल्य समझ में आता था। आज? आज तो पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, और पैसों की तरह पानी। त्रास में डालने वाला भयावह दृश्य हमारे सामने है। पानी दूषित है, तो हम सब अकाल मृत्यु के द्वार पर जा पहुँचे हैं। प्राचीन ऋषियों ने पानी के महत्व को बहुत पहले समझ लिया था। आज मेरे सामने आया यह आपःसूक्त। कृपा कर आप भी इसे देखिए।
तू है, तो हमारी जन्मकथा है
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ऋग्वेद के दशम मंडल का आप:सूक्त बहुत प्रसिद्ध है। इस सूक्त में नौ ऋचाएँ हैं। यह सूक्त यजुर्वेद और बाद के धर्मग्रंथों में भी मिलता है। धार्मिक अनुष्ठानों में प्राणायाम के बाद मार्जन के विनियोग में इस सूक्त के मंत्रों के उच्चारण की दीर्घ परम्परा है। इस सूक्त की काव्य-भंगिमा का आनंद नहीं लिया, तो सब अनुष्ठान अर्थहीन।
आपो हिष्ठा मयो भुवस्तान ऊर्जे दधातन।
महे रणाय चक्षसे।।
यो व: शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह न:।
उशतीरिव मातर :।।
तस्माअरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ।
आपो जनयथा च न:।।
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ऋग्वेद १०.९.१,२,३
हे जल!
तू हमें अपनी ऊर्जा से भर दे।
मेरी वाणी में तेरी सरलता हो,
मेरी आँखों में तेरी तरलता हो।।१।।
हे जल!
तेरे भीतर छिपा हुआ रस
सबके कल्याण के लिये है।
हमारे जीवन में वह रस
वैसे ही घुल जाये,
जैसे माँ का दूध घुल जाता
हम सबमें ममता बन कर।।२।।
हे जल!
हम तेरे ही गीत गाते हैं,
क्योंकि तू हमारे होने की
अभीप्सा से भरा है।
तू है तो हमारी जन्मकथा है,
तू है तो गूँज उठती जीवन-ऋचाएँ।।३।।
हे जल!
तू दिव्य कृपा से भरा हुआ है।
हमारे जीवन में शान्ति की वर्षा कर।
तू हमें अभीष्ट है, हमारी रक्षा कर ।
हमारे चारों ओर
शान्तिपूर्वक प्रवाहित हो।।४।।
हे जल!
तू हमारी आशाओं का स्वामी है,
तू ही हमारी कामनाओं का आश्रय।
उस ओषधि की याचना करता हूँ मैं
जो तेरी बूँद-बूँद में व्याप्त है।।५।।
हे जल!
तेरे भीतर ओषधियों का भंडार है,
यह बात मुझे सोम ने बताई।
तुम्हारे भीतर वह अग्नि है,
जो सब रोगों का शमन करने में
सदा समर्थ।।६।।
हे जल!
तेरे पास दिव्य ओषधियाँ हैं।
मेरी देह से रोगों का निवारण कर ,
ताकि मैं दीर्घकाल तक
सूर्य को देखता रह सकूँ।।७।।
हे जल!
जो कुछ भी मुझमें अपवित्र हो,
उसे बहा दे।
मेरे अवचेतन में बैठी
द्रोह की भावना को बहा दे।
मेरे क्रोध को शान्त कर।
मेरे सभी अनृत, सभी पातक
नष्ट हो जाएँ।।८।।
हे जल!
मेरा आचरण अब तेरे जैसा हो,
तेरा रसायन मेरे पोर-पोर में समा जाये।
तू प्रवाहमान अग्नि है,
तू आ, मुझे तेजस्वी बना।
वर्चस्व प्रदान कर।९।।
{ चित्र : ऋतम् उपाध्याय }





