
वकील की अवैध हिरासत पर पुलिस को कड़ी फटकार:हाईकोर्ट का सख्त संदेश- गिरफ्तारी प्रक्रिया कानून से ऊपर नहीं
Gwalior: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के चित्र से जुड़े एक विवादित मामले में बड़ा और दूरगामी प्रभाव वाला निर्णय सुनाया है। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता एडवोकेट अनिल मिश्रा की गिरफ्तारी को लेकर अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून की प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई गिरफ्तारी अस्वीकार्य है। अदालत ने उन्हें जमानत देते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। यह मामला केवल एक अधिवक्ता की जमानत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अदालत ने इसे नागरिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत अधिकार और विधिक प्रक्रिया की कसौटी पर परखा।
▪️पहले गिरफ्तारी, बाद में एफआईआर
मामले में अदालत ने माना कि प्रक्रिया का उल्लंघन हुआहै। अदालत के अनुसार 27 दिसंबर 2025 को अनिल मिश्रा को अन्य व्यक्तियों के साथ ग्वालियर में हिरासत में लिया गया। आरोप था कि डॉ. अंबेडकर के चित्र को जलाने से संबंधित घटना में उनकी भूमिका रही। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह पाया कि गिरफ्तारी से पूर्व आवश्यक कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामान्यतः पहले एफआईआर दर्ज होती है, फिर जांच और आवश्यकता पड़ने पर गिरफ्तारी की जाती है, जबकि इस मामले में क्रम उल्टा रहा। डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की कि गिरफ्तारी को अंतिम उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि प्रारंभिक कदम के रूप में।
▪️परिवार को सूचना न देना भी गंभीर चूक
▫️अदालत ने यह भी संज्ञान लिया कि गिरफ्तारी के बाद अनिल मिश्रा के परिजनों को समय पर सूचना नहीं दी गई। यह स्थिति कानून में निहित प्रावधानों के विपरीत पाई गई। न्यायालय ने कहा कि किसी भी नागरिक को हिरासत में लेने के बाद उसके परिवार को जानकारी देना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों से जुड़ा विषय है।
▪️एफआईआर वैध, लेकिन हिरासत अवैध
▫️हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मामले में दर्ज एफआईआर को इस स्तर पर रद्द नहीं किया गया है और जांच जारी रह सकती है, लेकिन जिस प्रकार से गिरफ्तारी और हिरासत की गई, वह कानून के अनुरूप नहीं थी। अदालत ने इसे प्रक्रिया का उल्लंघन मानते हुए अवैध ठहराया।
▪️जमानत के साथ सख्त संदेश
▫️तीन दिनों तक चली सुनवाई के बाद 6 जनवरी 2026 को अदालत ने अनिल मिश्रा को एक लाख रुपये के व्यक्तिगत बांड और समान राशि की जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही पुलिस को भविष्य में गिरफ्तारी से संबंधित प्रावधानों का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए।
▪️न्यायालय की व्यापक टिप्पणी
▫️अदालत ने अपने मौखिक अवलोकन में कहा कि कानून का शासन केवल आरोप लगाने से नहीं चलता, बल्कि प्रक्रिया की शुचिता से चलता है। यदि प्रक्रिया ही कमजोर की जाएगी तो नागरिकों का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि चाहे व्यक्ति कितना ही प्रभावशाली या विवादास्पद क्यों न हो, कानून की प्रक्रिया सभी के लिए समान है। हाईकोर्ट ने यह स्थापित किया है कि पुलिस विवेक का प्रयोग केवल कानून के दायरे में रहकर ही किया जा सकता है। यह निर्णय न केवल एक वरिष्ठ अधिवक्ता के अधिकारों की रक्षा करता है, बल्कि हर आम नागरिक के लिए यह भरोसा भी पैदा करता है कि न्यायालय आज भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सबसे मजबूत प्रहरी है।





