आदिवासियों का अलग धर्म कोड देश की जरूरत, इस पर जरूरी है सार्थक बहस…

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आदिवासियों का अलग धर्म कोड देश की जरूरत, इस पर जरूरी है सार्थक बहस…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

नेपानगर में 33वें आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आह्वान किया है कि

इस देश में आदिवासियों का भी अलग धर्म कोड होना चाहिए और इसके लिए अब एकजुट होकर निर्णायक आंदोलन की जरूरत है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में ही डेढ़ करोड़ से अधिक आदिवासी रहते हैं, यदि यह समाज संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद करे तो सरकार को अधिकार देना ही पड़ेगा। आदिवासी नेता होने के नाते नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता है लेकिन वास्तव में जब इस देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात चल रही हो तब अलग धर्म कोड की बात कितनी न्यायसंगत है, इस मुद्दे पर सार्थक बहस की जरूरत जरूर है।

अलग आदिवासी धर्म कोड को लेकर तर्क रखे जाते हैं। इनमें से एक यह है कि सन 1871 से लेकर 1951 तक के जनगणना प्रपत्र में आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड था। 1961 के जनगणना प्रपत्र से साजिश के तहत इसे हटाकर अन्य धर्म की कोटि में डाल दिया गया। इसके बाद आदिवासियों के समक्ष धार्मिक पहचान का संकट खड़ा हो गया। इस कारण आदिवासियों का बड़ी संख्या में धर्मांतरण होने लगा। जनगणना प्रपत्र या फिर सरकारी दस्तावेजों में भी अलग धर्म कॉलम नहीं होने के कारण आदिवासियों को भी हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध या फिर जैन में से किसी एक कॉलम में अपना धर्म दर्ज कराना पड़ा। इस कारण आदिवासियों की सही जनगणना नहीं हो पाती है। आदिवासियों को अपनी एक अलग धार्मिक पहचान दिलाने के लिए सर्वप्रथम अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के संस्थापक अध्यक्ष स्व. कार्तिक उरांव आगे आए। अगर यह बात है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है और किस उद्देश्य के तहत आदिवासियों के साथ यह खिलवाड़ किया गया। इस पर गहन जांच कर आदिवासियों को न्याय मिले, इसके प्रयास सर्वसहमति से होने चाहिए।

आदिवासी का मतलब है, जो आदिकाल से या पुराने समय से किसी जगह का रहने वाला हो। इसका ताल्लुक धर्म से नहीं, बल्कि मूल निवासी होने से है। हालांकि काफी समय से आदिवासियों को अलग-अलग धर्म में बांटा जाता रहा। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान हिंदू पूजा पद्धति को मानने वाले आदिवासियों ने ईसाई धर्म अपनाया। बहुत से आदिवासी मुस्लिम हो गए। लेकिन इसके बाद भी चर्चा होती रही कि उनका मूल धर्म सरना है, और उसे मान्यता मिलनी चाहिए। जनगणना के दौरान हर धर्म का अलग कोड होता है। ऐसे ही झारखंड समेत 4 और राज्यों के आदिवासी सरना कोड की डिमांड कर रहे हैं। अगर सेंटर इसे अप्रूवल दे दे तो सरना भी एक अलग धर्म हो जाएगा, जैसे हिंदू, मुस्लिम या बाकी धर्म होते हैं। पांच राज्यों झारखंड, उड़ीसा, असम, बंगाल और बिहार के लोग सरना धर्म की अलग कैटेगरी की मांग कर रहे हैं। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में अनुसूचित जनजातियों की आबादी करीब साढ़े 10 करोड़ है। सेंसस के दौरान 79 लाख से ज्यादा लोग ऐसे थे, जिन्होंने धर्म के कॉलम में ‘अन्य’ भरा था, लेकिन साढ़े 49 लाख से ज्यादा लोग ऐसे थे जिन्होंने खुद को ‘सरना’ लिखा था। इनमें से 40 लाख से ज्यादा लोग झारखंड से थे। नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड ट्राइब्स ने भी सरना धर्म को अलग श्रेणी देने की बात की। झारखंड विधानसभा में इस प्रस्ताव को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है। अब केवल केंद्र की सहमति का इंतजार है। वहीं बहुत से लोग इसका विरोध कर रहे हैं। यहां तक कि बहुत से आदिवासी भी खुद को हिंदू धर्म के करीब पाते हैं।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि अलग कोड के लिए राष्ट्रपति को आदिवासी समाज की ओर से ज्ञापन भेजा जाना चाहिए, जिसमें यह स्पष्ट मांग हो कि आदिवासियों को भी अलग धर्म कोड दिया जाए, यह उनका संवैधानिक और सामाजिक अधिकार है।नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि जिस तरह झारखंड के आदिवासियों ने अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया, उसी तरह मध्यप्रदेश के आदिवासी समाज को भी आगे आना होगा।

बात एक बार फिर वहीं आ जाती है कि आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड के नाम पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। वास्तव में आदिवासी बुद्धिजीवियों द्वारा धर्म कोड के मुद्दे पर

सभी पहलुओं से चर्चा की जानी चाहिए। 1951 के बाद निर्मित हुई स्थितियों पर भी समग्र रूप से चर्चा होनी चाहिए। बिना राजनीतिक हस्तक्षेप के तब निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि वास्तव में अलग धर्म कोड क्या आदिवासियों के हित में है अथवा नहीं। इसके बाद ही इस संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकारों को एकमत होकर आदिवासियों के हित की बात को स्वीकार कर लेना चाहिए… राष्ट्रहित के इस मुद्दे पर राजनीति कतई नहीं होना चाहिए।

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।