
Kissa-A-IAS : Manisha Dharve: MP की आदिवासी बेटी का आंगनबाड़ी में पढ़ने से IAS बनने का सफर
सुरेश तिवारी
मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के झिरनिया विकासखंड के छोटे से आदिवासी गांव बोंदरन्या की बेटी मनीषा धारवे ने इतिहास रच दिया है। संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में सफलता हासिल कर मनीषा धारवे न केवल IAS अधिकारी बनी हैं, बल्कि उन्होंने मध्य प्रदेश की पहली आदिवासी महिला IAS अधिकारी बनने का गौरव भी अपने नाम किया है। यह उपलब्धि सिर्फ एक व्यक्तिगत सफलता नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज, विशेषकर आदिवासी बेटियों और ग्रामीण अंचलों के युवाओं के लिए नई उम्मीद, आत्मविश्वास और प्रेरणा का प्रतीक बन गई है।

● आदिवासी परिवार में जन्म, संघर्ष से भरी शुरुआत
वर्ष 1999 में जन्मी मनीषा धारवे बारेला आदिवासी समुदाय से आती हैं। सीमित संसाधनों और ग्रामीण परिवेश में पली-बढ़ी मनीषा की कहानी संघर्ष से शुरू होकर सफलता तक पहुंचती है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत सच्ची हो, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता।

● गांव की आंगनवाड़ी से शिक्षा की नींव
मनीषा की प्रारंभिक शिक्षा गांव की आंगनवाड़ी से शुरू हुई। बचपन के शुरुआती पांच वर्ष उन्होंने वहीं शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद कक्षा 1 से 8 वीं तक उन्होंने स्थानीय जनजातीय कार्य विभाग के सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। गांव के साधारण स्कूल से निकलकर बड़े सपने देखना आसान नहीं था, लेकिन मनीषा के मन में कुछ अलग करने की चाह बचपन से ही थी।
● माध्यमिक शिक्षा और इंदौर तक का सफर
माध्यमिक शिक्षा के दौरान भी उन्होंने लगातार मेहनत जारी रखी। कक्षा 10 वीं में उन्होंने 75 प्रतिशत और कक्षा 12 वीं में 78 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे इंदौर पहुंचीं, जहां उन्होंने शासकीय होलकर कॉलेज से बीएससी कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई पूरी की। यहीं से उनके जीवन की दिशा स्पष्ट होने लगी और उन्होंने प्रशासनिक सेवा को अपना लक्ष्य बनाया।

● शिक्षक माता-पिता और सादगी भरा संस्कार
मनीषा के माता-पिता दोनों ही शिक्षाकर्मी हैं। पिता गंगाराम धारवे पहले इंजीनियर थे, लेकिन समाज सेवा के उद्देश्य से उन्होंने नौकरी छोड़कर शिक्षक बनना चुना। मां जमना धारवे भी सरकारी स्कूल में शिक्षिका रहीं। माता-पिता ने हमेशा सादगी और शिक्षा को जीवन का आधार बनाया। बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाकर उन्होंने यह संदेश दिया कि सफलता संसाधनों से नहीं, संस्कार और मेहनत से मिलती है।
● UPSC की तैयारी का कठिन फैसला
ग्रेजुएशन के दौरान मनीषा ने UPSC की तैयारी करने का निर्णय लिया। दोस्तों और शिक्षकों ने उनकी क्षमता को पहचानते हुए उन्हें सिविल सेवा परीक्षा की ओर बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि UPSC जैसी कठिन परीक्षा के लिए गांव से निकलकर बड़े शहर में संघर्ष करना पड़ता है। शुरुआत में परिवार को चिंता थी, लेकिन बाद में उन्होंने मनीषा के फैसले का पूरा समर्थन किया।

● दिल्ली में तैयारी, लगातार असफलताएं
बेहतर तैयारी के लिए मनीषा दिल्ली गईं। वहां रहकर उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की गंभीर तैयारी शुरू की। वर्ष 2020 में उन्होंने पहली बार UPSC परीक्षा दी, लेकिन सफलता नहीं मिली। इसके बाद 2021 में दूसरा प्रयास भी असफल रहा। लगातार असफलताओं के बावजूद मनीषा ने हार नहीं मानी।
● हार से सीख, आत्मविश्वास बना ताकत
तीसरे प्रयास में भी उन्हें सफलता नहीं मिली, लेकिन इस बार भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। कई बार आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक चुनौतियां सामने आईं, लेकिन मनीषा का आत्मविश्वास डगमगाया नहीं। वे बीच-बीच में अपने गांव लौटतीं, परिवार के साथ समय बितातीं और फिर नई ऊर्जा के साथ तैयारी में जुट जातीं।

● चौथे प्रयास में IAS बनने का सपना पूरा
अंततः चौथे प्रयास में वर्ष 2023 की UPSC सिविल सेवा परीक्षा में उन्होंने सफलता हासिल की। ऑल इंडिया रैंक 257 के साथ उनका चयन IAS के लिए हुआ। इस सफलता के साथ ही मनीषा धारवे ने मध्य प्रदेश की पहली आदिवासी महिला IAS अधिकारी बनने का ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया। यह पल न सिर्फ मनीषा के लिए, बल्कि पूरे गांव, जिले और प्रदेश के लिए गर्व का क्षण बन गया।

● प्रदेश की पहली आदिवासी महिला IAS के रूप में पहचान
IAS बनने के बाद मनीषा धारवे को प्रदेश की पहली आदिवासी महिला IAS अधिकारी के रूप में पहचान मिली। उनकी यह उपलब्धि उन हजारों आदिवासी बेटियों के लिए प्रेरणा बन गई है, जो आज भी सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को अधूरा मान लेती हैं।

● सम्मान और कृतज्ञता का भाव
मनीषा की सफलता के बाद उन्हें विभिन्न मंचों पर सम्मानित किया गया। प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर उनकी उपलब्धि को सराहा गया। खुद मनीषा का कहना है कि उनकी सफलता का श्रेय उनके माता-पिता, शिक्षकों और उन सभी लोगों को जाता है, जिन्होंने मुश्किल समय में उनका साथ दिया।
● गांव से शासन तक का प्रेरक संदेश
आज मनीषा धारवे की कहानी सिर्फ एक IAS अधिकारी बनने की कहानी नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश की पहली आदिवासी महिला IAS बनने की वह ऐतिहासिक यात्रा है, जो यह संदेश देती है कि गांव, गरीबी या सामाजिक पृष्ठभूमि कभी भी सफलता की राह में दीवार नहीं बन सकती। उनकी यात्रा यह सिखाती है कि निरंतर प्रयास, धैर्य और आत्मविश्वास के बल पर किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
मनीषा को उत्तर प्रदेश कैडर आवंटित हुआ है और वर्तमान में उनकी ट्रेनिंग चल रही हैं।





