आओ आज ‘रमाबाई’ को याद करते हैं, जिनके त्याग से ‘अंबेडकर’, संविधान निर्माता बन पाए…

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आओ आज ‘रमाबाई’ को याद करते हैं, जिनके त्याग से ‘अंबेडकर’, संविधान निर्माता बन पाए…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

“हर सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है” यह एक पारंपरिक कहावत है जो पुरुष की सफलता में महिला (पत्नी, माँ, या बहन) के अटूट समर्थन, त्याग, और प्रेरणा को रेखांकित करती है। यह विचार महिलाओं की भावनात्मक मजबूती और उनके योगदान की सराहना करता है, जो उन्हें मानसिक शांति प्रदान कर, कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करती हैं। यह कहावत, संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर के जीवन पर सौ फीसदी खरी साबित होती है। अंबेडकर के जीवन में वह स्त्री थी उनकी पहली पत्नी रमाबाई अंबेडकर।

भीमराव अंबेडकर प्रेम से रमाबाई को ‘रमो’ कहकर पुकारा करते थे। उन्होंने जो पुस्तक “थॉट्स ऑफ़ पाकिस्तान” लिखी, वह उन्होंने अपनी पत्नी ‘रमो’ को भेंट की थी। भीमराव अंबेडकर को विश्वविख्यात महापुरुष बनाने में रमाबाई का ही हाथ था। रमाबाई ने अतीव निर्धनता में भी बड़े संतोष और धैर्य से घर का निर्वाह किया और प्रत्येक कठिनाई के समय डॉ. अंबेडकर का साहस बढ़ाया। सभी तरह की कमियों से जूझते हुए त्याग और समर्पण की मूर्ति बनकर रमाबाई ने अंबेडकर की सफलता मैं कोई बाधा नहीं आने दी। और उन्होंने अंबेडकर के लिए अपना सर्वस्व जीवन न्योछावर कर 37 साल की उम्र में ही इस दुनिया को अलबिता कह दिया।

रमाबाई अंबेडकर ( जन्म- 7 फरवरी,1898, महाराष्ट्र; मृत्यु- 27 मई,1935) भारतीय संविधान निर्माता डॉ.भीमराव अंबेडकर की पहली पत्नी थीं। उन्हें माता रमाबाई, माता रमाई और ‘रमाताई’ के नाम से भी जाना जाता है। जब भीमराव अंबेडकर चौदह वर्ष के थे, तभी रमाबाई का विवाह उनसे हो गया था। रमाबाई एक कर्तव्यपरायण, स्वाभिमानी, गंभीर और बुद्धिजीवी महिला थीं, जिन्होंने आर्थिक कठिनाइयों का सामना सुनियोजित ढंग से किया और घर-गृहस्थी को कुशलतापूर्वक चलाया। उन्होंने हर कदम पर अपने पति भीमराव अंबेडकर का साथ दिया और उनका साहस बढ़ाया। रमाबाई आम्बेडकर का जन्म 7 फ़रवरी, सन 1898 को महाराष्ट्र के दापोली के निकट वानाड नामक गाँव में हुआ था।इनके पिता का नाम भीकू वालंगकर था। रमाबाई के बचपन का नाम ‘रामी’ था। रामी के माता-पिता का देहांत बचपन में ही हो गया था। उनकी दो बहनें और एक भाई था। भाई का नाम शंकर था। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के कारण रामी और उनके भाई-बहन अपने मामा और चाचा के साथ मुंबई में रहने लगे थे। रामी का विवाह 9 वर्ष की उम्र में सुभेदार रामजी सकपाल के सुपुत्र भीमराव अंबेडकर से सन 1906 में हुआ। भीमराव की उम्र उस समय 14 वर्ष थी। तब वे पाँचवी कक्षा में पढ़ रहे थे। विवाह के बाद रामी का नाम रमाबाई हो गया।

भीमराव अंबेडकर परेल, मुंबई में इम्प्रूवमेन्ट ट्रस्ट की चाल में एक मजदूर मौहल्ले में दो कमरों में, जो कि एक-दूसरे के सामने थे, वे रहते थे। वह वेतन का एक निश्चित भाग घर के खर्चे के लिए अपनी पत्नी रमाबाई को देते थे। रमाबाई घर की बहुत ही सुनियोजित ढंग से देखभाल करती थीं। रमाबाई ने प्रत्येक कठिनाई का सामना किया। उन्होंने निर्धनता और अभावग्रस्त दिन भी बहुत साहस के साथ व्यतीत किये। माता रमाबाई ने कठिनाईयां और संकट हंसते-हंसते सहन किये, परंतु जीवन संघर्ष में साहस कभी नहीं हारा। रमाबाई घर खर्च चलाने में बहुत ही किफायत बरततीं और कुछ पैसा जमा भी करती थीं। क्योंकि उन्हें मालूम था कि भीमराव अंबेडकर को उच्च शिक्षा के लिए पैसे की जरूरत पड़ेगी।

जब भीमराव अंबेडकर अपनी उच्च शिक्षा हेतु अमेरिका गए थे तो रमाबाई गर्भवती थीं। उन्होंने एक पुत्र रमेश को जन्म दिया। परंतु वह बाल्यावस्था में ही चल बसा। भीमराव के लौटने के बाद एक अन्य पुत्र गंगाधर उत्पन्न हुआ, परंतु उसका भी बाल्यकाल में ही देहावसान हो गया। उनका इकलौता बेटा यशवंत ही था, परंतु उसका भी स्वास्थ्य खराब रहता था। रमाबाई यशवंत की बीमारी के कारण पर्याप्त चिंताग्रस्त रहती थीं, परंतु फिर भी वह इस बात का पूरा विचार रखती थीं कि डॉ. अंबेडकर के कामों में कोई विघ्न न आए और उनकी पढ़ाई खराब न हो।

साधारणतः महापुरुषों के जीवन में यह एक सुखद बात होती रही है कि उन्हें जीवन साथी बहुत ही साधारण और अच्छे मिलते रहे। भीमराव अंबेडकर भी ऐसे ही भाग्यशाली महापुरुषों में से एक थे, जिन्हें रमाबाई जैसी बहुत ही नेक और आज्ञाकारी जीवन साथी मिली थी। इस बीच भीमराव अंबेडकर के सबसे छोटे पुत्र ने जन्म लिया। उसका नाम राजरत्न रखा गया। वह अपने इस पुत्र से बहुत प्यार करते थे। राजरत्न के पहले रमाबाई ने एक कन्या को जन्म दिया था, वह भी बाल्यकाल में ही चल बसी थी। रमाबाई का स्वास्थ्य खराब रहने लगा। इसलिए उन्हें दोनों लड़कों- यशवंत और राजरत्न सहित वायु परिवर्तन के लिए धारवाड़ भेज दिया गया। भीमराव अंबेडकर की ओर से अपने मित्र दत्तोबा पवार को 16 अगस्त, 1926 को लिखे एक पत्र से पता लगता है कि राजरत्न भी शीघ्र ही चल बसा।

डॉ. भीमराव अंबेडकर जब अमेरिका में थे, उस समय रमाबाई ने बहुत कठिन दिन व्यतीत किये। पति विदेश में हो और खर्च भी सीमित हों, ऐसी स्थिति में कठिनाईयाँ पेश आनी एक साधारण सी बात थी। रमाबाई ने यह कठिन समय भी बिना किसी शिकायत के बड़ी वीरता से हंसते-हंसते काट लिया। भीमराव अंबेडकर प्रेम से रमाबाई को ‘रमो’ कहकर पुकारा करते थे। दिसम्बर, 1940 में भीमराव अंबेडकर ने जो पुस्तक “थॉट्स ऑफ़ पाकिस्तान” लिखी, वह उन्होंने अपनी पत्नी ‘रमो’ को भेंट की। भेंट के शब्द इस प्रकार थे-

मैं यह पुस्तक रमो को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सदवृत्ति, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दुःख झेलने में, अभाव व परेशानी के दिनों में जब कि हमारा कोई सहायक न था, अतीव सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरूप भेंट करता हूँ।

उपरोक्त शब्दों से स्पष्ट है कि रमाबाई ने भीमराव अंबेडकर का किस प्रकार संकटों के दिनों में साथ दिया और डॉ. अंबेडकर के हृदय में उनके लिए कितना आदर-सत्कार और प्रेम था। पर 27 मई, 1935 को नृशंस मृत्यु ने उनसे पत्नी रमाबाई को भी छीन लिया। डॉ.अंबेडकर की उस समय की मानसिक अवस्था अवर्णनीय थी। दरअसल उनको विश्वविख्यात महापुरुष बनाने में रमाबाई का ही साथ था। रमाबाई ने अतीव निर्धनता में भी बड़े संतोष और धैर्य से घर का निर्वाह किया और प्रत्येक कठिनाई के समय उनका साहस बढ़ाया। उन्हें रमाबाई के निधन का इतना धक्का पहुंचा कि उन्होंने अपने बाल मुंडवा लिये। उन्होंने भगवे वस्त्र धारण कर लिये और गृह त्याग के लिए साधुओं का सा व्यवहार अपनाने लगे। वह बहुत उदास, दुःखी और परेशान रहते थे। वह जीवन साथी जो गरीबी और दुःखों के समय में उनके साथ मिलकर संकटों से जूझता रहा और अब जब कि कुछ सुख पाने का समय आया तो वह सदा के लिए बिछुड़ गया।

तो अंबेडकर के कठिन काल की साथी रमाबाई को लोग भले ही याद न करते हों लेकिन यह कहा जा सकता है कि यदि रमाबाई ने पत्नी के रूप में असीमित त्याग और संघर्ष न किया होता तो अंबेडकर संविधान निर्माता कहलाने की स्थिति में शायद ही पहुँच पाते। यह विडम्बना ही है कि अंबेडकर को सभी राजनैतिक दल पूजते हैं और पूरा राष्ट्र

जानता है लेकिन रमाबाई का नाम भी कोई नहीं जानता। तो आओ आज हम रमाबाई को याद करते हैं, जिनके त्याग से अंबेडकर संविधान निर्माता बन पाए…।

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।