आज फिर आई भोजशाला में वसंत बहार

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आज फिर आई भोजशाला में वसंत बहार

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भोजशाला में वसंत

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[ अब से एक हजार साल पहले ]
🍂मुरलीधर चाँदनीवाला
यह भोजशाला है,
नालंदा-तक्षशिला के बाद
भारत का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय।
आज फिर वसंत-बहार है यहाँ,
कुलपति भोजदेव
बैठ चुके हैं आसन पर ,
सुंदर प्रतिमा में से निकलती हुई वाग्देवी
घूम आई है पूरे परिसर में,
प्राणवान् वसंत का कोई अग्रदूत
उसके पीछे-पीछे चल रहा
नियमबद्ध सिपाही की तरह वासंती बाने में,
चौदह सौ पंडित
अपनी-अपनी ग्रंथ-लेखनी की पूजा में
बैठे अपने-अपने प्रकोष्ठ में,
नवमालिकाओं से सजी है भोजशाला,
किंशुक-स्तबक
जगह-जगह सजी वेदिकाओं पर
स्वस्तिगान में तल्लीन।
काशी,अवन्तिका की ललनाएँ
आई हैं धारा नगरी में
bhojshala
नृत्य-महोत्सव की इन्द्रध्वजा उठाकर,
शास्त्र-चर्चा में कोई नहीं लौटेगा
पराजित होकर,
प्रस्थान करेंगे सब
विजयी भाव से समृद्ध।
सदा की भाँति
राजपथ,चौपालों पर
वार्ताएँ चल रही हैं शंकर के अद्वैत पर,
शंकर के दिग्विजय की चर्चाएँ
अब भी हवा में है यहाँ।
वह लकड़हारा राजा से पुरस्कृत
बैठा है द्वारपंडित बना हुआ,
जिसने टोक दिया था
भाषा की अशुद्धि पर भोजदेव को।
शिलाओं पर उत्कीर्ण पारिजातमंजरी
सुरभित होने लगी हैं,
परिमल,धनंजय,भट्टगोविंद
घूम-घूम कर देख रहे उत्सव की तैयारी,
विद्यापति भास्कर
कुछ लिख रहे बहिरंग -भित्ति पर स्वस्तिसूत्र।
जगह-जगह गूँज रहा है-
“अद्य धारा सदा धारा सदालम्बा सरस्वती”।
बड़े द्वार से भीतर तक चला आया
गोधूम की हरी-भरी बालियाँ हाथ में लेकर
यह वसंत कितना सुकुमार,कितना प्राञ्जल?
सोलह सिंगार कर बैठी जूही,
पोर-पोर खिल उठा है लता का उपवन में,
शीतल,मंद,सुगन्धित हवाओं पर तैरता वसंत
घुल गया पुरवासियों के भीतर-बाहर।
मातृकाएँ उतर रही हैं
आम की मञ्जरियाँ झुलाती हुई
शाला की मध्यभूमि में वहाँ,जहाँ
पीले वसन पहने बैठे हैं बटुक
अक्षरारम्भ के लिये,
निसर्ग का अक्षरारम्भ हुआ कोकिल के पञ्चम से।
त्रिविधवीर चूड़ामणि भोज के साथ बैठे
श्रोत्रिय-पुरोहितों के मंगलाचरण से
भरने लगा है विश्वविद्यालय,
राजमार्तण्ड से टकराते वैदिक मंत्रों के स्वर
भारतीभवन से लगाकर शारदासदन तक
फैल गये हैं,
सरस्वती की वीणा झनझना उठी है,
अलंकार,योग-शिल्प-संगीत-कविता की आत्माएँ
विचर रही हैं यहाँ की वीथियों में,
ज्ञानवापी से उलीच रहा कोई अमृत
श्रद्धालु-जनों के लिये।
सब कुछ शृंगारमय, लयबद्ध है काव्यात्मक।
कुलपति लोकार्पित करेंगे आज ही
“युक्ति कल्पतरु” और “समरांगण सूत्रधार”।
प्रदर्शन होगा विशाल प्रांगण में
आकाशचारी विमान का,
जो पारद से उड़ेगा अभी भोजशाला के ऊपर
पुष्पवृष्टि करता हुआ।
सभा सजी है,
कुलपति उत्तरीय डाले हुए चले आये मंडप में,
उनके दक्षिण-वाम
कवि,वैज्ञानिक,शिल्पी,आचार्य,वेदज्ञ।
सब तरह के वाद्य बज उठे,
नर्तकियाँ प्रसन्न मुद्रा में मंगलकलश उठाये हुए,
कुलपति ने करयुगल ऊपर कर घोषणा की
वसंत-समागम की,
और आरम्भ हुआ रंग-उत्सव का
यह महापर्व।
सच ही है,
जहाँ भोजशाला है,
वहाँ सरस्वती सदा विद्यमान,
और जहाँ ये दोनों हैं वहाँ
वसंत तो होगा ही।
कवि-वैदिक साहित्य के नव रूपान्तरकार के रूप में मुरलीधर चाँदनीवाला एक महत्वपूर्ण नाम हैं।