
10 मिनट की दलील और पलटा फैसला: जबलपुर के छात्र अथर्व ने बिना वकील सुप्रीम कोर्ट में जीती बड़ी लड़ाई
Jabalpur: मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर का 12वीं का छात्र अथर्व चतुर्वेदी इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह है उसकी वह कानूनी लड़ाई, जो उसने देश की सर्वोच्च अदालत में खुद अपने दम पर लड़ी, बिना किसी वरिष्ठ वकील की पैरवी के।
मामला मेडिकल प्रवेश से जुड़ा था। अथर्व ने NEET परीक्षा में 530 अंक प्राप्त किए थे और वह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी EWS श्रेणी के अंतर्गत पात्र था। इसके बावजूद उसे निजी मेडिकल कॉलेजों में EWS कोटे के तहत प्रवेश नहीं मिल सका। राज्य स्तर पर कोटे के क्रियान्वयन में अस्पष्टता और तकनीकी कारणों के चलते उसका नाम चयन सूची में शामिल नहीं किया गया।
अपने भविष्य पर मंडराते संकट को देखते हुए अथर्व ने पहले संबंधित प्राधिकरणों से गुहार लगाई। राहत न मिलने पर उसने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। वहां से संतोषजनक निर्णय न मिलने पर उसने सीधे Supreme Court of India में विशेष अनुमति याचिका दायर की।
*● खुद रखी दलील, खुद बनाया पक्ष*
सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि अथर्व ने अदालत में स्वयं अपनी पैरवी की। उसने संविधान के प्रावधानों, समान अवसर के अधिकार और नीति के समुचित क्रियान्वयन का हवाला देते हुए अपनी बात रखी। बताया कि यदि केंद्र स्तर पर EWS आरक्षण मान्य है तो राज्य स्तर पर उसके प्रभावी पालन में देरी या त्रुटि का खामियाजा पात्र छात्र को नहीं भुगतना चाहिए। बताया जाता है कि सुनवाई के दौरान उसने लगभग 10 मिनट में अपनी दलीलें स्पष्ट और तथ्यात्मक तरीके से रखीं। अदालत ने उसके तर्कों को गंभीरता से सुना और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए पूर्व निर्णय में हस्तक्षेप किया।
*● अदालत का रुख और राहत*
सर्वोच्च अदालत ने यह माना कि यदि कोई छात्र योग्यता सूची में है और नीति की अस्पष्टता के कारण वंचित रह गया है तो उसके भविष्य को अनिश्चितता में नहीं छोड़ा जा सकता। अदालत ने संबंधित प्राधिकरणों को निर्देश दिए कि पात्रता के आधार पर उसे उचित राहत दी जाए और प्रवेश प्रक्रिया में न्यायसंगत समाधान सुनिश्चित किया जाए।
यह फैसला केवल अथर्व के लिए ही नहीं, बल्कि ऐसे अन्य छात्रों के लिए भी उम्मीद बना, जो तकनीकी कारणों से अवसर से वंचित रह जाते हैं।
*● क्यों चर्चा में है यह मामला*
देश में शायद ही ऐसे उदाहरण मिलते हैं जब कोई 19 वर्षीय छात्र बिना विधि शिक्षा के सर्वोच्च अदालत में स्वयं अपनी पैरवी करे और सफल भी हो। यह मामला युवा आत्मविश्वास, तैयारी और संवैधानिक समझ का उदाहरण बन गया है।
जबलपुर का यह छात्र अब केवल एक परीक्षार्थी नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मविश्वास की मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
अथर्व का यह संघर्ष बताता है कि न्याय की राह कठिन जरूर हो सकती है, लेकिन यदि तथ्य, तैयारी और साहस साथ हों तो आवाज दूर तक जाती है- यहां तक कि देश की सर्वोच्च अदालत तक।




