
संगोष्ठी: संस्कार जन्मजात होते हैं या अर्जित किए जाते हैं?
इंदौर लेखिका संघ एवं पंडित दीनानाथ व्यास स्मृति प्रतिष्ठा समिति द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित संगोष्ठी
संस्कार,यह वे धार्मिक और सामाजिक भाव हैं, जो व्यक्ति के शरीर, मन और आत्मा को पवित्र कर उन्हें उन्नत बनाते हैं। यह मनुष्य के आचरण, व्यवहार और विचारों को परिष्कृत कर उत्तम गुण विकसित करने की प्रक्रिया है, जो व्यक्ति को समाज का एक जिम्मेदार सदस्य बनाती हैसंस्कारित शिक्षा ही जीवन की आधार शक्ति है। शिक्षा में जीवन व संस्कार बिना शिक्षा का महत्व नहीं है। संस्कार गुणों की खान है। हम कितने गुण विकसित करते हैं यह अपनी साधना व सार्थकता के चलते संभव है। संस्कार ग्रहण करने में सहजता, सभ्य व कोमलता का भाव जरूरी है। आदर्श नागरिक के जीवन में इसी का समावेश रहता है।आचरण व व्यवहार से हम शिक्षित कहलाते हैं। यह आचरण पढ़ने -लिखने बोलने व समझने मात्र से नहीं आने वाला है। इसे जीवन में उतारना पड़ता है । परिवार का श्रेष्ठ वातावरण संस्कारों के विकास में सहायक है। लेकिन कई बार यह भी कहा जाता है कि उसके तो ये जन्मजात संस्कार है .संस्कार परिवार से आते हैं। संस्कारों में परिवर्तन शाश्वत है। जीवन में संगति से बदलाव स्वाभाविक है,इन बातों को ध्यान दें तो एक सहज सा सवाल उठता है ,संस्कार जन्म जात होते है या उन्हें अर्जित किया जा सकता हैं .इस विषय पर चर्चा करने पर लेखकों एवं प्रबुद्ध जनों ने क्या कहा ,आइये जानते हैं -उनके विचार
संयोजक – डॉ.स्वाति तिवारी
1.यदि जन्मजात संस्कार ही सर्वस्व होते, तो मोक्ष असंभव होता- डॉ. तेज प्रकाश व्यास
संस्कार मानव जीवन के सूक्ष्म बीज हैं, जो आत्मा के अनंत यात्रा-पथ पर निर्धारित होते हैं। वेदांत दर्शन के अनुसार, संस्कार जन्मजात होते हैं, क्योंकि वे पूर्वजन्मों के कर्मों का फलस्वरूप होते हैं। भगवद्गीता के चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं, “बीजं मां सर्वभूतानां वासुदेवः सर्वमिति” – अर्थात् आत्मा में विद्यमान संस्कार अनादि हैं, जो सृष्टि चक्र में बंधे रहते हैं। जन्म के साथ ही ये संस्कार चेतना में जागृत हो जाते हैं, जैसे वृक्ष के बीज में वृक्षत्व का संस्कार निहित रहता है। उपनिषदों में ‘वासनाएं’ कहा गया है, जो अर्जित कर्मों से उत्पन्न होकर अगले जन्म में फलित होती हैं। उदाहरणस्वरूप, बालक जन्म से ही संगीत या गणित में निपुणता प्रदर्शित करता है, क्योंकि ये पूर्व संस्कार हैं।
जैन और बौद्ध परंपराओं में भी ‘संस्कार’ को कर्म-फल माना गया है, जो जन्मजात होते हुए भी वर्तमान जीवन की दशा पर निर्भर करते हैं। इस प्रकार, संस्कार जन्मजात हैं, पर वे शाश्वत चेतना के अंश हैं, न कि केवल भौतिक विरासत।फिर भी, संस्कार पूर्णतः अर्जित भी होते हैं, क्योंकि वर्तमान जीवन में सत्कर्म, साधना और गुरु-कृपा से इन्हें शुद्ध किया जा सकता है। गीता का सार है – “यथाकर्म तथाफलं”, अर्थात् नए संस्कार पुराने संस्कारों को परिवर्तित कर देते हैं। योगदर्शन में पतंजलि ऋषि कहते हैं, “अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः” – अभ्यास से संस्कारों का निरोध संभव है। यदि जन्मजात संस्कार ही सर्वस्व होते, तो मोक्ष असंभव होता; किंतु रामकृष्ण परमहंस जैसे संतों ने तीव्र साधना से तामसिक संस्कारों को सात्त्विक में रूपांतरित किया। आधुनिक संदर्भ में, ध्यान, जप विशेष रूप से गायत्री मंत्र , ओम के जाप, के साथ सेवा से मस्तिष्क के न्यूरॉन्स पुनः संरचित होते हैं, जो वैज्ञानिक रूप से संस्कार-परिवर्तन को प्रमाणित करता है। इस प्रकार, संस्कार जन्मजात होने पर भी अर्जित किए जा सकते हैं, क्योंकि आत्मा स्वतंत्र इच्छा-शक्ति से बंधनों को तोड़ती है। संक्षेप में, संस्कार जन्मजात आधार पर अर्जित शिखर प्राप्त करते हैं, जो आध्यात्मिक उन्नति का द्वार खोलते हैं.
2.संस्कार कोई “एक बार इंस्टॉल” होने वाला सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी चलने वाला अपडेट है-राजेश जयंत
कभी ध्यान दिया है- एक ही घर में पले दो बच्चे बिल्कुल अलग क्यों निकलते हैं••? एक शांत, जिम्मेदार और समझदार… दूसरा उतावला, गुस्सैल या लापरवाह। माता-पिता वही, घर वही, स्कूल वही… फिर फर्क कहां से आ गया••? यहीं से संस्कार की असली कहानी शुरू होती है। सच यह है कि हर बच्चा अपने साथ कुछ स्वभाव लेकर आता है- कोई निडर, कोई संवेदनशील, कोई जिद्दी। लेकिन जिंदगी उस स्वभाव को किस दिशा में मोड़ेगी, यह माहौल तय करता है। जिद्दी बच्चा सही हाथों में पड़े तो “दृढ़ निश्चयी” बनता है, गलत हाथों में पड़े तो “मुश्किल इंसान” कहलाता है। यानी जन्म हमें किरदार देता है, पर कहानी जीवन लिखता है।
घर असल में ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि संस्कारों की फैक्ट्री है। बच्चे उपदेश नहीं, माहौल कॉपी करते हैं। यदि घर में सम्मान, सच्चाई और अपनापन है, तो बच्चा वही सीखता है, अगर हर समय झगड़ा, झूठ और स्वार्थ है, तो वही उसकी दुनिया बन जाती है। आपने देखा होगा- कुछ लोग कम साधनों में भी बेहद संस्कारी और सुलझे हुए होते हैं, जबकि कुछ लोग सब कुछ होने के बावजूद भीतर से खाली लगते हैं। कारण साफ है: पैसा सुविधा दे सकता है, संस्कार नहीं। संस्कार तो व्यवहार, संगत और अनुभव से ही बनते हैं।
असल में संस्कार कोई “एक बार इंस्टॉल” होने वाला सॉफ्टवेयर नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी चलने वाला अपडेट है। हर घटना, हार, जीत, प्यार, धोखा, संघर्ष हमें थोड़ा बदलती है, थोड़ा सिखाती है।
अच्छे संस्कार वही हैं जो इंसान को ताकतवर होने के साथ इंसानियत भी बनाए रखें। इसलिए सच सीधा सा है: हम जैसे पैदा होते हैं, उससे ज्यादा मायने रखता है कि हम किन लोगों के बीच जीते हैं और क्या सीखते हैं। सही दिशा मिल जाए तो साधारण व्यक्ति भी असाधारण बन सकता है… और दिशा गलत हो तो वरदान भी अभिशाप बन सकता है।
यही संस्कार की असली ताकत है- अदृश्य, लेकिन पूरी जिंदगी चलाने वाली।
3.संस्कार केवल भीतर से नहीं, बाहर से भी गढ़े जाते हैं- कीर्ति कापसे
जब हम किसी व्यक्ति के बारे में कहते हैं कि “यह बहुत संस्कारी है”, तो वास्तव में हम उसके व्यवहार, उसकी सोच और उसके निर्णयों की प्रशंसा कर रहे होते हैं। मनुष्य की पहचान केवल उसके रूप या धन से नहीं, बल्कि उसके संस्कारों से होती है। लेकिन मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है क्या ये संस्कार जन्म के साथ ही आते हैं, या जीवन की परिस्थितियाँ इन्हें गढ़ती हैं?
अगर हम अपने आसपास देखें तो पाएँगे कि हर बच्चा अलग स्वभाव लेकर जन्म लेता है। कोई बच्चा जन्म से ही शांत और सहनशील होता है, तो कोई चंचल और जिज्ञासु। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि आत्मा अपने पूर्व जन्म के कर्मों और प्रवृत्तियों को साथ लेकर आती है। भगवद्गीता में भी कर्म और स्वभाव के संबंध की बात कही गई है। कई बार छोटे बच्चे बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के ही किसी कला में अद्भुत क्षमता दिखा देते हैं। जैसे प्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर बचपन से ही संगीत में विलक्षण थीं। यह देखकर लगता है कि कुछ गुण शायद जन्मजात होते हैं।
लेकिन क्या केवल जन्मजात गुण ही किसी व्यक्ति का भविष्य तय कर देते हैं? शायद नहीं। यदि ऐसा होता तो हर प्रतिभाशाली बच्चा महान बनता और हर साधारण बच्चा पीछे रह जाता। वास्तविकता इससे अलग है। मनुष्य का परिवेश उसका परिवार, उसकी शिक्षा, उसकी संगति उसके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित करता है।
उदाहरण के लिए, महात्मा गांधी बचपन में कोई असाधारण बालक नहीं माने जाते थे। परंतु उनकी माता की धार्मिकता, सत्यनिष्ठा और नैतिकता ने उनके भीतर सत्य और अहिंसा के बीज बोए। आगे चलकर यही संस्कार उनके जीवन का आधार बने और उन्होंने पूरे राष्ट्र को दिशा दी।
वास्तव में, इंसानी सोच हमें यही सिखाती है कि संस्कार जन्म और जीवन दोनों की देन हैं। जन्म हमें कुछ प्रवृत्तियाँ देता है, लेकिन जीवन उन्हें आकार देता है। जैसे बीज में वृक्ष बनने की क्षमता होती है, परंतु सही देखभाल के बिना वह फल-फूल नहीं सकता; वैसे ही जन्मजात गुण भी उचित मार्गदर्शन और वातावरण के बिना विकसित नहीं हो पाते।
अंततः यह कहना उचित होगा कि संस्कार न पूरी तरह जन्मजात हैं और न ही केवल अर्जित। वे दोनों का सुंदर संगम हैं। मनुष्य अपने भीतर की संभावनाओं को पहचानकर और सही दिशा में प्रयास करके अपने संस्कारों को निखार सकता है। यही इंसानी सोच की सबसे बड़ी ताकत है जिस से व्यक्ति परिवर्तन और विकास की क्षमता का योग्य प्रदर्शन कर पता है ।
4.संस्कार जन्म से नहीं आते हैं बल्कि वो धीरे-धीरे हमारे भीतर पोषित होते हैं–नीलम सिंह सूर्यवंशी
संस्कार हमारे भीतर के भाव हैं, विचार हैं जो हम अपने बच्चों को देते हैं।संस्कार जन्म से नहीं आते हैं बल्कि वो धीरे-धीरे हमारे भीतर पोषित होते हैं,जैसे-जैसे हम बच्चों की परवरिश करते हैं वैसे ही हमें थोड़े-थोड़े संस्कार देना पड़ता हैं।हर एक बात को प्यार से समझाना पड़ता हैं, ताकि बच्चा बड़ा होकर देश का एक अच्छा नागरिक बन सके।उसमें मानवता का विकास हो,महिलायें पुरुषों को और पुरुष महिलाओं को सम्मान और इज्जत की दृष्टि से देख सकें।प्रकृति के प्रति प्रेम हो।
कई बार हम देखतें हैं दीवाली पर घर में लक्ष्मी पूजा करते हैं, बाहर जाकर ख़ुद के मजे के लिए बेजुबानों की पूछ में फटाके बांध कर जला देते हैं, ये सोचे समझे बिना की उसे कितनी तकलीफ़ होगी। फिर ऐसी पूजा-पाठ किस काम की।नादियों में ठंडा करने के नाम पर पूजन सामग्री बहा देते हैं ये सोचे समझे बिना की इससे हमारी जीवन दायनी नदी प्रदूषित होगी।
इंदौर में लगभग दस वर्षों से सफाई अभियान चल रहा है, लोगो को गीला कचरा और सूखा कचरा , काँच इत्यादि का कचरा अलग-अलग रखना सिखाया जा रहा है।लेकिन मैं जिस बिल्डिंग में रहती हूँ वहाँ लोगो को बार बार समझानें पर भी ये काम नहीं करते हैं और तो और सेनेट्री पैड, डायपर तक उसी में रख देते हैं।
जबकि सफ़ाई वाले भैया, दीदी अपने हाथों से ये सब अलग करते हैं। ऐसे लोगों को आप क्या कहेंगे ?जबकि ये सभी लोग बहुत अधिक उच्च स्तर के उच्च शिक्षित लोग हैं ।संस्कार सिर्फ बड़ों के पैर छूने से नहीं आते हैं और ना ही बहुत अधिक पूजा पाठ करने से आतें हैं।
संस्कार बहुत बारीकी से दिनचर्या में बदलाव करने से आते हैं,इंसान को इंसान प्रति प्रेम होने में है,हर जीव के प्रति संवेदना हो,प्रकृति से प्यार हो। ईश्वर इन सब में है।ये सभी बाते हमारे बच्चों को बताने से उनमे धीरे धीरे सींचित होगी ।
संस्कार देने काम जन्म देने वाली पीढ़ी का होता है जो अपने बच्चों को उचित शिक्षा संस्कार प्रदान करे।
5.संस्कार न तो केवल जन्मजात होते हैं और न ही केवल अर्जित, बल्कि यह दोनों का सुंदर समन्वय हैं–सुषमा शुक्ला
संस्कार मनुष्य के व्यक्तित्व की वह सुगंध हैं, जो उसके व्यवहार, वाणी और दृष्टिकोण में सहज रूप से प्रकट होती है। यह प्रश्न सदैव विचारणीय रहा है कि संस्कार जन्म से ही मनुष्य में होते हैं या जीवन के अनुभवों और शिक्षाओं से विकसित होते हैं।
जन्मजात संस्कार का पक्ष यह कहता है कि मनुष्य अपने पूर्वजों और परिवार की प्रवृत्तियों का कुछ अंश लेकर जन्म लेता है। जैसे किसी बालक में बचपन से ही करुणा, विनम्रता या सत्यप्रियता दिखाई देती है, जबकि उसे औपचारिक रूप से यह सब सिखाया नहीं गया होता। परिवार का वातावरण, माता-पिता की सोच और वंशानुगत गुण बालक के स्वभाव में प्रारंभ से ही झलकने लगते हैं। इस दृष्टि से संस्कार एक बीज के समान हैं, जो जन्म के साथ ही मन में विद्यमान रहते हैं।
अर्जित संस्कार का पक्ष मानता है कि संस्कार जीवन की पाठशाला में सीखे जाते हैं। बालक को परिवार, समाज, विद्यालय और गुरु से जो शिक्षा और उदाहरण मिलते हैं, वही उसके संस्कार बनते हैं। यदि बालक को सत्य, अनुशासन और सम्मान का वातावरण मिलता है, तो वह वैसा ही बनता है; और यदि उसे विपरीत परिस्थितियाँ मिलती हैं, तो उसके संस्कार भी प्रभावित होते हैं। संगति, अनुभव और शिक्षा संस्कारों को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वास्तव में संस्कार न तो केवल जन्मजात होते हैं और न ही केवल अर्जित, बल्कि यह दोनों का सुंदर समन्वय हैं। जन्म के साथ संस्कारों का बीज अवश्य होता है, परंतु उसे विकसित और पुष्पित करने का कार्य परिवार, समाज और शिक्षा करते हैं। यदि उचित वातावरण मिले, तो साधारण बीज भी महान वृक्ष बन सकता है। इसलिए यह हमारा कर्तव्य है कि हम स्वयं भी श्रेष्ठ संस्कार अपनाएँ और आने वाली पीढ़ी को भी उत्तम संस्कारों की विरासत दें।
7.संस्कार जन्मजात भी होते है और अर्जित भी करना पड़ते है-प्रभा तिवारी
संस्कार एक ऐसा शब्द है जो किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को देखकर चाहे वो अमीर मां-पिता की संतान हो या मिडिल क्लास की या आर्थिक परिस्थिति से कमजोर परिवारों का होउसके आचरण, व्यवहार, स्वभाव को देखकर ही आप के मुंह से सबके पहले यही निकलता है कि कितने अच्छे संस्कार मिले हैंऔर किसी का अजीब आचरण, स्वभाव, व्यवहार को देखकर मन में यही सवाल उठता है क्या मां-पिता ने कुछ भी संस्कार नही दिए।इसके दोनों पहलू है संस्कार जन्मजात भी होते है और अर्जित भी करना पड़ता है।
इसका एक कारण यही है कि बचपन में मां-पिता से, दादा दादी के सानिध्य में बच्चे रहते है
और उनका आपस का आचरण देख कर मासुम बच्चों पर काफी असर पड़ता है और वो बड़े होने पर उसी सांचे में ढलता जाता है
ऐसे जन्म जात से बच्चा मां के गर्भ में रहता है तभी वह मां के सानिध्य में रहता है मां धार्मिक प्रवृत्ति की होती है तो वो असर भी बच्चे को आता है जन्म के बाद भी बच्चा जैसे थोड़ा बड़ा होता है मां जैसे परिवेश में ढालती है पिता, दादा,दादी जैसा सिखाते है वो उस तरह बड़ा होता है अतः जन्म से संस्कार का असर पड़ता था लेकिन जन्म जात संस्कार का असर आज के परिवेश में बहुत कम आज की पीढ़ी में देखने को मिलता है क्योंकि एकल परिवार के होने से बचपन में कितनी भी अच्छी परवरिश पर ध्यान दें बड़े होने पर वह व्यवहारिकता, संस्कार नही मिल पाता न ग्रहण कर पाता क्योंकि मां पिता दोनों अपनी व्यवसायिक गतिविधियों में लगे रहते हैं।
ऐसे में संतान बड़ी होने पर उसको अपने दोस्तों का संगती का असर होने लगता है और अच्छी संगत मिल गई तो ठीक है वर्ना आज के परिवेश में बच्चों को धैर्य, विवेक न के बराबर है।अगर कुछ उनको बनना है आगे चलकर समाज में, परिवार में, नोकरी में तो स्वयं के विवेक पर ही संस्कार अर्जित करना पड़ता है और क ई ऐसे उदाहरण भी हमें देखने में आते है जिनके माता-पिता ने अपने व्यवहार से, स्वभाव से, समाज में ख्याति अर्जित नही की पर संतान ने अपने व्यवहार से, स्वभाव से समाज में, परिवार में अपनी ख्याति अर्जित की है।
8.भारतीय चिंतन के अनुसार संस्कारों का प्रारंभ गर्भकाल से ही माना गया है-डॉ. अनिता नाईक
मानव जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों की यात्रा नहीं है, बल्कि यह मूल्यों, मर्यादाओं और आदर्शों से निर्मित एक सुसंस्कृत पथ है और संस्कार वह आंतरिक शक्ति हैं, जो हमें सही और गलत का भेद सिखाती हैं और जीवन को संतुलित तथा सार्थक बनाती हैं।
हमारे शास्त्रों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थ का उल्लेख मिलता है। इनमें अर्थ का महत्व सदैव रहा है, किंतु बदलते दौर में जीवन जीने के केंद्र में अर्थ (धन) ने स्थान बना लिया है। वह साधन से बढ़कर साध्य बन गया है। धन की चमक ने मानो जीवन के अन्य मूल्यों को धुंधला कर दिया है। प्रतिस्पर्धा की दौड़ में मनुष्य कभी-कभी संबंधों की ऊष्मा और नैतिकता की गरिमा को भी भूल जाता है।
आज स्त्री-पुरुष समान रूप से शिक्षित और आत्मनिर्भर हैं। यह परिवर्तन समाज की प्रगति का प्रतीक है। परंतु जब आर्थिक उपलब्धि ही सफलता का मापदंड बन जाती है, तब परिवार और बच्चों पर उसका प्रभाव अनिवार्य रूप से पड़ता है। माता-पिता दोनों के अत्यधिक व्यस्त रहने से बच्चों को वह समय, स्नेह और मार्गदर्शन नहीं मिल पाता, जो उनके व्यक्तित्व निर्माण के लिए आवश्यक है। बालमन अत्यंत कोमल होता है; वह शब्दों से अधिक व्यवहार से सीखता है। जब प्रेम के स्थान पर सुविधाएँ और समय के स्थान पर वस्तुएँ दी जाती हैं, तब अनजाने में यह संदेश जाता है कि धन ही जीवन का सबसे बड़ा आधार है।
वर्तमान सामाजिक वातावरण भी इस बात को और बल दे रहा है। यदि कोई परिवार अपने बच्चों को संयम, मर्यादा और नैतिकता का पाठ पढ़ाता है, तो उसे कभी-कभी “पुरानी सोच” कहकर उपेक्षित किया जाता है। ऐसे में बालक के मन में द्वंद्व उत्पन्न होता है — एक ओर घर के संस्कार, दूसरी ओर समाज की भौतिक वादी धारा। यही परिस्थिति यह प्रश्न उठाती है कि संस्कार वास्तव में जन्मजात होते हैं या अर्जित?
भारतीय चिंतन के अनुसार संस्कारों का प्रारंभ गर्भकाल से ही माना गया है। माँ के विचार, भावनाएँ और जीवनशैली शिशु के मन पर गहरा प्रभाव डालते हैं। इस दृष्टि से संस्कारों के बीज जन्म से पूर्व ही रोपित हो जाते हैं। किंतु बीज मात्र से वृक्ष नहीं बनता,उसे उचित भूमि, जल और प्रकाश की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार जन्मजात संस्कारों का विकास परिवार, समाज और परिवेश के सतत प्रभाव से होता है।
यदि वातावरण प्रेम, त्याग, सत्य और धर्म से ओतप्रोत होगा, तो बालक का व्यक्तित्व भी उन्हीं मूल्यों से आलोकित होगा। यदि वातावरण स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और अर्थ-प्रधानता से भरा होगा, तो वही उसके चरित्र की दिशा निर्धारित करेगा। इसलिए संस्कार न तो पूर्णतः जन्मजात हैं और न ही केवल अर्जित — वे दोनों का सुंदर समन्वय हैं।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि धन जीवन को सुविधाएँ दे सकता है, परंतु संस्कार ही जीवन को श्रेष्ठता प्रदान करते हैं। आधुनिकता और स्वतंत्रता का स्वागत करते हुए भी हमें अपने नैतिक मूल्यों और पारिवारिक आदर्शों को संजोकर रखना होगा। क्योंकि समृद्धि तभी सार्थक है, जब वह संस्कृति और संवेदनशीलता से जुड़ी हो। आने वाली पीढ़ी को केवल सफल ही नहीं, बल्कि सुसंस्कृत बनाना ही हमारा वास्तविक कर्तव्य है।
9.जन्मजात संस्कार तो मिलते ही हैं,किन्तु समाज के साथ रहकर सुसंस्कारी बनते है -प्रभा जैन
संस्कारों की महती भूमिका हर इंसान के जीवन को उच्चतम बनाती है।वैसे घर परिवार से जन्म जात संस्कार तो मिलते ही हैं,किन्तु मनुष्य समाजिक प्राणी होने के नाते समाज के साथ रहकर, परिस्तिथि अनुसार सुसंस्कारी बना रह सकता है और नहीं भी।विशेष आज देखें तो नैतिक मूल्यों की कमी से समाज का स्तर गिरता जा रहा है।बेटियों,बच्चों के साथ अत्याचार बढ़ते जा रहेहैं।पाश्चात्य रँग लगता जा रहा है।भौतिक वादिता और दुनिया की चकाचौन्ध में मनुष्य जन्मजात संस्कार संस्कृति खोते जा रहा है।अगर सचमुच चरित्र निर्माण की और ध्यान नहीं दिया गया तो,,हिंसा,झूठ,चोरी,कुशील,,बढ़ती ही जाएगी,, इसलिए मैँ तो यही मानती हूँ कि संस्कार तो खून में मिले होते हैं, किन्तु उनको भारतीय संस्कृति का पाठ,चरित्र निर्माण में भागीदार बनाकर उन संस्कारों को बचाये रखना ही होगा।नहीं तो हमारी अगली आनेवाली पीढ़ी के संस्कार एक दिन खत्म से होते दिखाई देंगे।संस्कार पाठशाला,नियमों का कड़ाई से पालन,प्रत्येक जीवन सुरक्षा भावना,हिंदुत्व के संस्कार बचाये रखने के लिए गुरुकुल पाठशाला में शिक्षण,,अनिवार्य करना होगा।तभी भारतीय संस्कार संस्कृति ,चरित्र,अनुशासन,कर्तव्य निष्ठा से हमारे हिंदु राष्ट्र के संस्कार संस्कृति और मानवीयता को बचा पाएंगे।बस मन मे ठानने की आवश्यकता है।
परिचर्चा: आजकल के विवाह भव्य होने के बाद भी आयोजनों में पारम्परिक-आत्मीय अहसास क्यों नहीं दिखता!




