
Mahashivratri Special: “अभिव्यक्ति में भक्ति”-इंदौर लेखिका संघ द्वारा शिव महिमा पर अनूठी प्रस्तुतियां
देव से महादेव-‘अभिव्यक्ति में भक्ति’
देव से महादेव बनना आसान नहीं होता है। जो अमृत पीते हैं वो देव बनते हैं और जो राष्ट्र, समाज एवं प्रकृति की रक्षा के लिए विष को भी प्रेम से पी जायें वो महादेव बन जाते हैं।बिना विष को पिये और विषमता को पचाये कोई भी महान नहीं बन सकता है।आज के समय में अमृत की चाह तो सबको है पर विष की नहीं लेकिन बिना विष को स्वीकारे कोई अमृत तक भी नहीं पहुँच सकता है।संघर्ष, दुःख, प्रतिकूलता, अभाव ये सब तुम्हें निखार रहे हैं। समस्या को स्वीकार करना ही समस्या का समाधान है। कोई भी समस्या तब तक ही है, जब तक आप उससे डरते हो और उसका सामना करने से बचते हो।मनुष्य के संकल्प के सामने बड़ी से बड़ी चुनौती भी छोटी हो जाती है।विषय सुखों से मुक्त होना और विषमता के विष को पीना ही महादेव बनना है।
इंदौर लेखिका संघ ,इंदौर द्वारा शिव +पार्वतीऔर पर्व को लेकर रचनात्मक कृतियों पर केन्द्रित एक विशेष ‘अभिव्यक्ति में भक्ति ‘विषय पर पर रचनाएँ आमंत्रित की .इस अनूठे आयोजन में कलात्मक और रचनात्मक दोनों प्रकार की अभिव्यक्ति में भक्ति देखने को मिली . सुप्रसिद्ध चित्रकार वन्दिता श्रीवास्तव एवं सुप्रसिद्ध चित्रकार विम्मी मनोज अर्गल ने अपनी भक्ति की चित्रात्मकअभिव्यक्ति दी और कई लेखिकाओं ने अपनी कविताओं और भजनों के माध्यम से अपनी भक्ति को अभिव्यक्ति प्रदान की आइये ,आप भी इस भक्ति में शामिल हों –
संयोजिका –सपना उपाध्याय
चित्रात्मक अभिव्यक्ति 1-चित्रकार -वन्दिता श्रीवास्तव

चित्रात्मक अभिव्यक्ति 2--चित्रकार विम्मी मनोज

कवितायेँ और भजन की प्रस्तुति —-
1. भोले के सिर पर चंदा विराजे
बिन पिए नशा हो जाता है
जब नाम भोले का लेती हूं।
मेरे भोले के सिर पर गंगा
विराजे गंगा की लहरो में खो जाऊं। ।
बिन पिए नशा हो जाता है
जब नाम भोले का लेती हूं।
भोले के सिर पर चंदा विराजे
चांद की रोशनी में खो जाऊं।
बिन पिए नशा हो जाता है जब नाम भोले का लेती हूं।
मेरे भोले के हाथ डमरू विराजे
डमरू की खनक में खो जाऊं।
जब नाम भोले का लेती हूं
बिन पिए नशा हो जाता है।
मेरे भोले के पांव में घुँघरू विराजे
घुंघरू की खनक में खो जाऊं।
जब नाम भोले का लेती हूं
बिन पिए नशा हो जाता है।
प्रभा तिवारी
2.वैभव नहीं, वो वैराग्य हैं

वो जन-जीवन से दूर है ,
वो कैलाशी के वासी हैं ,
अमृत नहीं, वो विष के प्यासे
वीभत्स हैं, वो विभोर हैं
वैभव नहीं, वो वैराग्य हैं
जिनका ओर है ना छोर है,
वो तो बस समाधि में लीन हैं।
फिर भी वो भोले हैं, भंडारी हैं
सरल हैं, करुण हैं, प्रेम है
वो तो केवल नीर से प्रसन्न हैं।
ऐसे केवल बस
महादेव हैं, महादेव हैं, महादेव हैं!!
नीलम सिंह सूर्यवंशी
3. महाशिवरात्रि-डमरू की मधुर थाप

(1)
फिर आई महाशिवरात्रि, जपे जग “बम-बम भोले” नाम,
हर हृदय में गूंज उठा है, शिव का पावन धाम।
(2)
डमरू की मधुर थाप से, थिरक उठे तन-मन के तार,
अंधकार सब मिट जाता, जब हो शिव का साकार।
(3)
जटा से बहती गंगा कहती, जीवन को निर्मल बनाओ,
विष पीकर भी जग को बचाया, त्याग का पाठ अपनाओ।
(4)
भक्ति की बेला में हर जन, अपना शीश झुकाता है,
भोले बाबा की कृपा से, हर संकट मिट जाता है।
(5)
महाशिवरात्रि सिखाती हमको, भीतर शिव को पहचानो,
अहंकार का त्याग कर के, सच्चे मानव बन जाओ।
. सुषमा शुक्ला
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4.जल समर्पित अर्ध्य समर्पित।

जो आदि है ,अनंत है
जो कण-कण में व्याप्त है
जो प्रेममय ,करुणामय है
जो रौद्र-शांति का समन्वय है
जो सृजन का प्रतीक है
जो संहार का प्रतीक है
जो नीलकंठधारी है
जो भोले भंडारी है
उन्हें मानवता के कर्म समर्पित
जल समर्पित अर्ध्य समर्पित।
ऊँ नमः शिवाय ,ऊँ नमः शिवाय
महाशिवरात्रि की अनंत शुभकामनाएँ
शीला मिश्रा
5.तांडव में नृत्य, शिव का है प्रलय

शिव शंकर के चरणों में, नमन करता है मन,
भक्तिभाव से सज्जित, दविंदर का यह वंदन।
महादेव, महाकाल, त्रिलोकी के नाथ,
नागेन्द्र हाराय, त्रिशूलधारी, शम्भू के साथ।
गंगा धर, जटा धारी, चंद्रमा के मित्र,
भस्म लगाए, व्याघ्र चर्म में, शिव के शत्रु नित्र।
कैलाश पर विराजे, शिव शंकर के रूप,
नंदी के साथ, गौरी के साथ, शिव का है स्वरूप।
तांडव में नृत्य, शिव का है प्रलय,
लांगल में डमरू, शिव का है जय।
भूत पिशाच, गणों के साथ, शिव का है दल,
भक्तों के लिए, शिव का है मंगल।
शिव का नाम, शिव का काम, शिव का है रूप,
शिव का ध्यान, शिव का ज्ञान, शिव का है स्वरूप।
शिव शंकर के चरणों में, नमन करता है मन,
भक्तिभाव से सज्जित, दविंदर का यह वंदन।
डाॅ.दविंदर कौर होरा
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