
गणगौर पर्व पर विशेष : गणगौर – 16 दिन की साधना और आराधना का पर्व
*(डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर)*
हमारी लोक संस्कृति और प्राचीन संस्कृति में महिलाओं , युवतियों और विवाहिता स्त्रियों में वर्ष का एक विशिष्ट पखवाड़ा गणगौर पर्व होली के बाद मनाया जाता है ओर हर वर्ग धर्म समाज में भी इसकी मान्यता है ।
सास बहू बेटी ननद सब परिवार साथ मिलकर त्योहार मनाते हैं ।
गणगौर का पर्व राजस्थान मध्यप्रदेश और इसकी संस्कृति से जुड़े अन्य राज्यों की सांस्कृतिक आत्मा का दर्पण है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि अटूट श्रद्धा, प्रेम और दाम्पत्य जीवन की खुशहाली का प्रतीक है। चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला यह पर्व शिव (ईसर जी) और शक्ति (गौरा/पार्वती) के पुनर्मिलन का उत्सव है।
पुरातन काल का इतिहास एवं पौराणिक संदर्भ
‘गणगौर’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है: ‘गण’ अर्थात् भगवान शिव और ‘गौर’ अर्थात् माता पार्वती।
पौराणिक मान्यता: माना जाता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कड़ा तप किया था। अंततः इसी दिन शिव जी ने उन्हें वरदान दिया और वे साथ आए।
पुनरागमन का प्रतीक: लोक कथाओं के अनुसार, गणगौर वह समय है जब पार्वती अपने पीहर (मायके) आती हैं और फिर भगवान शिव उन्हें लेने आते हैं। मेवाड़ मालवा की बेटियाँ इसे अपने मायके के प्रेम और ससुराल की सुख-शांति से जोड़कर देखती हैं।
ऐतिहासिक महत्व: रियासत काल से ही जयपुर, उदयपुर और जोधपुर , चित्तौड़गढ़ इंदौर उज्जैन कोटा झालावाड़ बूंदी जैसे नगरों में गणगौर की सवारी निकलने की परंपरा रही है। राजा-महाराजा स्वयं इस उत्सव में भाग लेते थे, जो आज भी एक जीवंत विरासत के रूप में जारी है।
गणगौर का आध्यात्मिक पक्ष ‘संयम’ और ‘सृजन’ पर आधारित है:
प्रकृति और पुरुष का मिलन: सांख्य दर्शन के अनुसार, शिव ‘पुरुष’ (चेतना) हैं और गौर ‘प्रकृति’ (पदार्थ)। इन दोनों का सामंजस्य ही सृष्टि का आधार है।
शुचिता और धैर्य: कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना के लिए और विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु के लिए 18 दिनों तक कठिन नियमों का पालन करती हैं। यह अनुष्ठान मन की शुचिता और परिवार के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
मिट्टी का महत्व: गणगौर की मूर्तियाँ अक्सर पवित्र नदी या तालाब की मिट्टी से बनाई जाती हैं, जो इस सत्य को रेखांकित करती हैं कि जीवन मिट्टी से उत्पन्न है और अंततः उसी में विलीन होना है (पंचतत्व)।
उत्सव की मुख्य विशेषताएँ
होलिका दहन की राख: उत्सव की शुरुआत होली के अगले दिन से ही हो जाती है, जहाँ होलिका की राख से पिण्ड बनाकर ‘ज्वारे’ बोए जाते हैं।
सोलह श्रृंगार: महिलाएँ पूर्ण पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों में सजती हैं। हाथों में रची ‘मेहंदी’ और माथे का ‘बोरला’ राजस्थान की पहचान है।
घेवर का प्रसाद: इस पर्व का मुख्य मिष्ठान ‘घेवर’ है, जिसे विशेष रूप से इस समय बनाया और बाँटा जाता है। साथ ही गुने गुझिया खाखरा आदि का भी चलन है।
सांस्कृतिक लोकगीत की पंक्तियाँ
गणगौर के गीतों में जो मिठास और मान-मनुहार है, वह अद्वितीय है। पूजा के समय गाई जाने वाली कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ:
“खेळण द्यो गणगौर भँवर म्हाने, खेळण द्यो गणगौर…”
(अर्थात्: हे स्वामी, मुझे सखियों के साथ गणगौर खेलने (पूजने) की अनुमति दें।)
पूजा के समापन और विदाई के समय का मर्मस्पर्शी गीत:
“पूजण द्यो गणगौर, ऐ जी म्हाने पूजण द्यो गणगौर।
कंवारी कन्या पूछे, मनवाँछित वर पावै।
सुहागण पूजे, अखंड सुहाग पावै।”
गणगौर केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि स्त्री शक्ति (Female Agency) मातृशक्ति का उत्सव भी है। यह पर्व समाज को संदेश देता है कि परिवार की धुरी प्रेम और त्याग पर टिकी है। जहाँ आधुनिकता रिश्तों को कमजोर कर रही है, वहीं गणगौर जैसे पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं और यह सिखाते हैं कि धैर्य और साधना से ही जीवन में ‘शिव’ (कल्याण) की प्राप्ति संभव है।
नारी शक्ति की साधना आरा
धना पूजा के पर्व बहुत बधाई बहुत सम्मान।





