खबरों से ज्यादा ‘किरदार’ बेचती मीडिया महाकुंभ की आस्था बनाम मीडिया का फोकस

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खबरों से ज्यादा ‘किरदार’ बेचती मीडिया महाकुंभ की आस्था बनाम मीडिया का फोकस

राजेश जयंत
प्रयागराज में बीते वर्ष संपन्न महाकुंभ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक विरासत का विराट संगम था। देश-विदेश से लोग यहां आध्यात्मिक शांति और साधना की भावना लेकर पहुंचे थे। लेकिन इस पूरे आयोजन के दौरान मीडिया का एक बड़ा हिस्सा मूल मुद्दों और आध्यात्मिक पक्ष को छोड़कर कुछ सीमित चेहरों के इर्द-गिर्द सिमटता नजर आया।
▪️दो चेहरों तक सिमटा कवरेज
आईआईटी_बाबाअभयसिंह और माला बेचने वाली मोनालिसा को लेकर जिस तरह का कवरेज देखने को मिला, उसने यह सवाल खड़ा किया कि क्या मीडिया अब खबरों की गहराई से ज्यादा सतही आकर्षण पर निर्भर हो गया है। जहां एक ओर हजारों संत_अखाड़े_परंपराएं और सामाजिक_संदेश मौजूद थे, वहीं कैमरों का फोकस बार-बार इन्हीं दो चेहरों पर केंद्रित रहा।
▪️ #अब_निजी_जीवन_भी_ब्रेकिंगन्यूज
वर्तमान में इन दोनों के कथित रिश्ते या शादी को जिस तरह से प्रमुख खबर बनाया जा रहा है, वह पत्रकारिता की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। किसी व्यक्ति के निजी जीवन को इस स्तर पर उछालना, खासकर तब जब उसका सार्वजनिक महत्व सीमित हो, यह दर्शाता है कि टीआरपी की दौड़ ने खबर की गरिमा को पीछे धकेल दिया है।
▪️ #टीआरपी_की_दौड़_में_गिरता_स्तर
मीडिया का एक वर्ग अब दर्शकों का ध्यान खींचने के लिए सनसनी और व्यक्तिगत कहानियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रहा है। यह प्रवृत्ति न केवल पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों के विपरीत है, बल्कि समाज में सूचना की गुणवत्ता को भी प्रभावित करती है। जब गंभीर मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं और हल्की सामग्री मुख्यधारा बन जाती है, तो यह लोकतंत्र के लिए भी चिंता का विषय बनता है।
▪️ #आत्ममंथन_की_जरूरत
समय आ गया है कि मीडिया अपने दायित्वों पर पुनर्विचार करे। महाकुंभ जैसे आयोजनों की असली पहचान उसकी आध्यात्मिकता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक विविधता है, न कि कुछ चुनिंदा चेहरों की व्यक्तिगत कहानियां। पत्रकारिता का उद्देश्य समाज को जागरूक करना और सार्थक संवाद स्थापित करना होना चाहिए, न कि केवल टीआरपी के लिए विषयों को उछालना।
▪️ #और_अंत_में•••
आईआईटी बाबा अभय सिंह और मोनालिसा जैसे प्रसंग यह संकेत देते हैं कि मीडिया को अपनी प्राथमिकताओं में संतुलन लाने की जरूरत है। दर्शक भी अब समझने लगे हैं कि खबर और मनोरंजन के बीच की रेखा धुंधली हो रही है। ऐसे में जिम्मेदार और संतुलित पत्रकारिता ही विश्वास को बनाए रख सकती है।