राज-काज: कांग्रेस इसे मुस्लिम नहीं, आदिवासियों में बनाएगी मुद्दा….

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राज-काज: कांग्रेस इसे मुस्लिम नहीं, आदिवासियों में बनाएगी मुद्दा….

* दिनेश निगम ‘त्यागी’

0 कांग्रेस इसे मुस्लिम नहीं, आदिवासियों में बनाएगी मुद्दा….

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– देश के कुछ अन्य राज्यों की तरह मप्र सरकार भी प्रदेश में यूसीसी को लागू करने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने इस संदर्भ में एक समिति बनाने की बात कही है। समिति की रिपोर्ट आने के बाद इसे प्रदेश के लिए कानून बनाने की कार्रवाई की जाएगी। कहा गया है कि अगले 6 माह में यह कानून बना सकता है। कांग्रेस जानती है कि इसके लागू होने से बहुसंख्यक हिंदू वर्ग खुश होता है और मुस्लिम समाज नाराज। इसे कांग्रेस जितना हवा देती है, भाजपा को उतना ही लाभ होता है। लिहाजा, मप्र कांग्रेस इसे लेकर सतर्क है। खासकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार इसे मुस्लिमों की बजाय आदिवासियों के बीच मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं। ऐसा कर वे भाजपा को बैकफुट पर लाना चाहते हैं। सिंघार पहले से आदिवासी वर्ग को हिंदू नहीं मानते। वे कहते हैं कि उनकी संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान सब अलग है। आदिवासियों के बीच वे इसका प्रचार जोर-शोर से करते हैं। यूसीसी को लेकर भी उन्होंने कहा है कि समिति की रिपोर्ट और कानून का मासौदा आने दीजिए। हम देखेंगे की यूसीसी आदिवासियों पर तो नहीं लागू हो रहा और उनकी संस्कृति, परंपराओं पर हमले की कोशिश तो नहीं हो रही। यदि ऐसा कुछ हुआ तो आदिवासी समाज सड़क पर उतर कर यूसीसी का विरोध करेगा। इस तरह कांग्रेस ने यूसीसी पर अपनी मंशा साफ कर दी है।

 वंदेमातरम को लेकर फिर देश छोड़ने की सलाह….

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– वंदेमातरम पर कांग्रेस एक बार फिर फंस गई। इंदौर की दो महिला मुस्लिम पार्षदों ने इसे गाने से इंकार कर पार्टी नेतृत्व को मुसीबत में डाल दिया। यह तब हुआ जब पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार चरम पर है। वंदेमातरम पश्चिम बंगाल से किस कदर जुड़ा है, यह बताने की जरूरत नहीं। वहां इस बार कांग्रेस अधिकांश सीटों पर चुनाव लड़ रही है और भाजपा ममता सरकार को बाहर कर सत्ता में आने की कोशिश में है। इसीलिए वंदेमातरम का यह मुद्दा मप्र से लेकर दिल्ली और पश्चिम बंगाल तक गूंजा। भाजपा ने इसे हाथोंहाथ लिया। पहले मंत्री विश्वास सारंग, विधायक ऊषा ठाकुर और भाजपा के प्रवक्ताओं व अन्य नेताओं ने महिला पार्षदों के साथ कांग्रेस को देशद्रोही ठहराया, बाद में खुद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव मैदान में आ गए। वंदेमातरम गाने से इंकार करने वाली पार्षदों पर कार्रवाई न करने के लिए उन्होंने समूची कांग्रेस को कटघरे में खड़ा किया। दूसरी तरफ इंदाैर कांग्रेस अध्यक्ष ने महिला पार्षदों पर कार्रवाई का एलान किया लेकिन प्रदेश से मंजूरी नहीं मिली। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने वंदेमातरम न गाने वालों पर कार्रवाई की बात तो कही, इसके साथ भाजपा पर यह कह कर तंज कसा कि जिस भाजपा के संगठन ने दशकों तक अपने कार्यालय में तिरंगा नहीं फहराया, वह पार्टी आज कल देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांट रही है। मजेदार बात यह है कि संबंधित पार्षद इससे पहले वंदेमातरम गा चुकी हैं।

 जब जवाब दे गया आदिवासियों, किसानों का धैर्य….

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– केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकार जिस केन-बेतवा लिंक परियोजना को मप्र और उप्र के बुंदेलखंड अंचल के विकास की जीवन रेखा कह रही है, उस परियोजना से विस्थापित होने वाले हजारों आदिवासी, किसान मुआवजा राशि वितरण में विसंगति को लेकर आंदोलनरत हैं लेकिन सरकार और प्रशासन समस्या का समाधान नहीं कर पा रहे हैं। उनके तेवरों ने प्रशासन के होश उड़ा रखे हैं। पन्ना और छतरपुर जिले के ये आदिवासी निर्माणाधीन बांध से विस्थापित हैं और उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर आंदोलनरत आदिवासियों के साथ जेल तक जा चुके हैं लेकिन विस्थापितों का गुस्सा शांत नहीं हो रहा। इस समय वे चिताओं में लेटकर चिता आंदोलन कर रहे हैं। छतरपुर जिला प्रशासन इनके प्रति कभी नरम रुख अपना रहा है कभी गरम। हाल ही में प्रशासन के सामने चिताओं पर लेटे आदिवासियों के धैर्य ने जवाब दे दिया। वे इतने उग्र हो गए कि प्रशासन टीम को भाग कर अपनी जान बचाना पड़ी। प्रशासन अपने स्तर पर मसले को हैंडल कर रहा है, लेकिन सरकार के स्तर पर कोई कोशिश होती नहीं दिख रही जबकि गंभीरता से लेकर इसका समाधान निकालना चाहिए क्योंकि परियोजना जितनी महत्वूपर्ण है, उतनी ही आदिवासियों की समस्या। आंदोलन के कारण परियोजना के बांध का काम रुका पड़ा है।

 सज्जन ने ऐसा बोल मार ली अपने पैर में कुल्हाड़ी….

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– इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि सज्जन सिंह वर्मा प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता हैं और पार्टी का दलित चेहरा भी। वे कमलनाथ जैसे वरिष्ठ और सक्षम नेता के खास सिपहसलार भी हैं। वे पार्षद, विधायक, मंत्री और सांसद रह चुके हैं। इस नाते वे राज्यसभा सीट के लिए स्वाभाविक मजबूत दावेदार हैं लेकिन उनकी राह का कांटा है, उनकी अपनी बेकाबू भाषा। बता दें, राज्यसभा की मप्र कोटे की तीन सीटें जून में खाली हो रही हैं। इससे पहले इनके लिए चुनाव होना है। दिग्विजय सिंह वाली एक सीट कांग्रेस को मिल सकती है। कांग्रेस में इसके लिए कई नामों पर विचार चल रहा है। सज्जन सिंह वर्मा ने भी अपनी दावेदारी प्रस्तुत की है लेकिन अपने ही अंदाज में। उन्होंने अपने संसदीय अनुभव का जिक्र करते हुए कांग्रेस नेतृत्व को संदेश दिया है कि संसद में ऐसे व्यक्ति को भेजना चाहिए जिसके पास लंबा अनुभव हो। इस वक्त भाजपा को संसद में मुंह तोड़ जवाब देने की जरूरत है, जो मैं दे सकता हूं। इससे पहले दावेदारी पर उन्होंने कहा था कि मन में तो है। पर हम जैसे लोगों के लिए बहुत मुश्किल होती है। हम जैसे यदि राज्यसभा पहुंच जाएं, जिनका पूरे प्रदेश में नेटवर्क है तो दूसरे नेताओं की दुकानदारी बंद हो जाएगी। सज्जन यदि वास्तव में अपनी दावेदारी को लेकर गंभीर हैं तो क्या उन्हें ऐसा बोलने की जरूरत थी। यह अपने पैर में कुल्हाड़ी मारना नहीं तो क्या है?

 कांग्रेस की इस तरह की पहल तारीफ-ए-काबिल….

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– अपने पुराने वैभव को वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस के कुछ कदम तारीफ के काबिल हैं। हर राजनीतिक दल से उम्मीद की जाना चाहिए कि देश और पार्टी हित में ऐसे कदम उठाए। पहला, कांग्रेस ने युकां के 38 पदाधिकारियों के पद यह कह कर होल्ड कर दिए है कि ये परफॉर्मेंस रिव्यू में फेल पाए गए। इन पदाधिकारियों को संगठन द्वारा दी गई जिम्मेदारियों के प्रति गंभीर नहीं पाया गया। शौक के लिए पद लेने वालों के लिए ऐसी व्यवस्था हर दल में होना चाहिए। दूसरा, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हेमंत कटारे की एक बयान के लिए तारीफ करना होगी , जिन्होंने पिछले दिनों महिलाओं के खाते में सीधे पैसे डालने वाली योजनाओं का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दो-टूक कहा कि इन्हें तुरंत प्रभाव से बंद कर देना चाहिए। कटारे ने यह भी कहा कि आज कल हम कुछ भी बोलने से डरते हैं कि ऐसा बोला तो पार्टी नेता नाराज हो जाएंगे, वैसा बोला तो महिलाएं नाराज हो जाएंगी, लेकिन अगर हम इस नाराजगी से घबराते रहेंगे, तो देश की सेवा कब करेंगे? उन्होंने ऐलान किया कि वे आज के बाद हर जगह यही कहेंगे कि देश में चल रही सभी फ्री-बीज योजनाएं बंद होनी चाहिए। क्या कटारे के इस बयान की हर राजनीतिक दल को तारीफ नहीं करना चाहिए? पर आज की राजनीति का यह दुर्भाय है कि वोटबैंक की राजनीति फ्री-बीज योजनाओं के खिलाफ ऐसा बोलने की ताकत नहीं देती।

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