क्या ममता बनर्जी की गद्दी छिनने वाली है?

निष्पक्ष चुनाव के कारण इस बार ममता का पाप का घड़ा फूटता नजर आ रहा है!

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क्या ममता बनर्जी की गद्दी छिनने वाली है?

वेद माथुर की खास रिपोर्ट 

पश्चिम बंगाल की राजनीति इस वक्त एक निर्णायक मोड़ पर है। हालांकि अंतिम फैसला 4 मई की शाम को स्पष्ट होगा, लेकिन हवाओं का रुख और ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।

मुझे दीदी की सत्ता से विदाई के कई ठोस कारण नजर आ रहे हैं:

1. पलायन का दर्द और ‘बाहरी’ राज्यों का अनुभव:

आज बंगाल के लाखों युवा और श्रमिक अपने घर-परिवार से हजारों किलोमीटर दूर दूसरे राज्यों में झाड़ू-पोछा और मजदूरी जैसे छोटे काम करने को मजबूर हैं। जब ये श्रमिक गैर-TMC शासित राज्यों में जाते हैं और वहां की बेहतर गवर्नेंस, सड़कें और सुविधाएं देखते हैं, तो उनके मन में एक टीस उठती है। वे सवाल पूछ रहे हैं कि—”जो अवसर हमें दूसरे राज्यों में मिल रहे हैं, वो हमारे अपने बंगाल में क्यों नहीं?”

श्रमिकों का यह असंतोष ममता सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।

2. ‘ब्रांड मोदी’ का बढ़ता प्रभाव:

पश्चिम बंगाल में इस बार ‘ब्रांड मोदी’ का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है। केंद्र सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं और पीएम मोदी की वैश्विक छवि ने बंगाल के आम मतदाता, विशेषकर महिलाओं और युवाओं के मन में एक उम्मीद जगाई है। मोदी-शाह की जोड़ी की रणनीतिक सक्रियता ने तृणमूल के किले में सेंध लगा दी है।

3. सत्ता का अहंकार और वोट बैंक की राजनीति:

दीदी के व्यवहार में झलकता अहंकार और अवैध घुसपैठियों को संरक्षण देने की नीति अब जनता को रास नहीं आ रही। अपने निजी राजनीतिक स्वार्थ के लिए मतदाता सूची में हेरफेर करने के प्रयासों और CAA/NRC के अंधविरोध ने राज्य के मूल निवासियों के मन में गहरी असुरक्षा पैदा कर दी है।

4. ‘बैड गवर्नेंस’ और पुलिस का राजनीतिकरण:

बंगाल में शासन व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। आज स्थिति यह है कि यदि कोई पीड़ित थाने जाता है, तो पुलिस न्याय करने के बजाय पहले TMC के स्थानीय नेताओं की ‘रजामंदी’ लेती है। थानेदार और नेता मिलकर तय करते हैं कि पक्ष किसका लेना है। इस राजनीतिक हस्तक्षेप ने कानून-व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है।

5. सिंडिकेट राज और हफ्ता वसूली:

स्थानीय स्तर पर TMC कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी, ‘तोलाबाजी’ (extortion) और सिंडिकेट राज ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। भ्रष्टाचार केवल नीचे के स्तर पर ही नहीं, बल्कि शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुका है। ममता बनर्जी भले ही सादगी की बात करें, लेकिन उनके भतीजे और पार्टी के कई बड़े नेताओं का भ्रष्टाचार में लिप्त होना अब किसी से छिपा नहीं है।

6. सुरक्षा और बिगड़ती कानून व्यवस्था:

राज्य में राजनीतिक संरक्षण के चलते कानून-व्यवस्था की स्थिति भयावह है। हाल ही में हुए बड़े बलात्कार के मामलों और उन पर सरकार की लचर संवेदनशीलता ने महिलाओं के बीच दीदी की छवि को भारी नुकसान पहुँचाया है।

7. संघ (RSS) का मौन और प्रभावी कार्य:

भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं की सक्रियता के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का ‘अंडरग्राउंड वर्क’ इस बार अभूतपूर्व है। चुपचाप गांवों और कस्बों में किए गए इस कार्य ने सत्ता परिवर्तन की एक मूक लहर तैयार कर दी है।

भारतीय जनता पार्टी मोदी और शाह के नेतृत्व में जिस तरीके से आक्रामक तरीके से पूरी गंभीरता और ऊर्जा के साथ चुनाव लड़ती है वह भी इस जीत का एक कारण बनेगा।

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राजनीति में जब जनता का ‘मौन’ टूटता है, तो बड़े-बड़े किले ढह जाते हैं। बंगाल का श्रमिक, वहां का युवा और वहां की महिलाएं अब बदलाव की ओर देख रही हैं। 4 मई की शाम शायद बंगाल की राजनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत करेगी।