Dewas Crackers Blast: कब घेरे में आएंगे समुद्री सिस्टम के डाकू..!

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Dewas Crackers Blast: कब घेरे में आएंगे समुद्री सिस्टम के डाकू..!

पुष्पेन्द्र वैद्य

देवास की कथित अवैध पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण विस्फोट ने छह बेगुनाह मजदूरों की जिंदगी लील ली। दो लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। जिला अस्पताल में रखी एक पोटली-जिसमें कहीं हाथ-पैर, कहीं खोपड़ी, कहीं धड़ और कहीं बालों के गुच्छे पड़े हैं- यह बताने के लिए काफी है कि बारूद केवल फैक्ट्री में नहीं फटा, सिस्टम के भी चिथड़े उड़े हैं।

कई मजदूर अब भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। जो “कम घायल” माने गए, उन्हें पट्टियाँ बांध 10-10 हजार रुपए का लिफाफा थमाकर अपने घर बिहार-यूपी रवाना कर दिया गया। मानो इंसान नहीं, हादसे के सबूत हटाए जा रहे हों। किसी माँ का बेटा चला गया, किसी की मांग उजड़ गई, कोई बच्चा अनाथ हो गया और किसी घर का अकेला कमाने वाला हमेशा के लिए खामोश हो गया।

सरकार ने अपनी तयशुदा रस्में भी निभा दी। न्यायिक जांच, मजिस्ट्रियल जांच, कलेक्टर की कमेटी, पुलिस की अलग जांच… यानी जांचों की आतिशबाजी छोड़ी जा चुकी है। अब भले ही सारे सवाल धुएं के गुबार में ही भला क्यों ना गायब हो जाएँ। खानापूर्ति और मातमपूर्सी के लिए एसडीएम, नायब तहसीलदार जैसे कुछ निचले अफसर निलंबित भी कर दिए गए। जनता भी जानती है और सिस्टम भी, कि कुछ महीनों बाद यही अफसर “कर्तव्यनिष्ठ” बताकर बहाल भी कर दिए जाएंगे।

लेकिन इस हादसे के पीछे जो कहानी शहर की गलियों में फुसफुसाहट बनकर घूम रही है, वह किसी क्राइम थ्रिलर से कम नहीं। चर्चा है कि दूर तक पहुंच रखने वाले एक सफेदपोश नेताजी और पटाखा कारोबारी मुकेश विज के बीच गहरी सांठगांठ थी। पुलिस ने मुकेश विज पर केस तो दर्ज कर लिया, लेकिन उनके राजनीतिक रिश्तों की तरफ देखने की हिमाकत शायद किसी में नहीं।

बताया जा रहा है कि मुकेश विज देश के कई हिस्सों में पटाखा कारोबार से जुड़े हैं। मुकेश विज को पटाखा माफिया भी कहा जाए तो गलत नहीं होगा। पहले सत्ताधारी बड़े नेताओं से रिश्ते बनाए जाते हैं, फिर उन्हीं रिश्तों की आड़ में नियम-कायदों को बारूद की तरह उड़ाया जाता है। देवास में भी कथित तौर पर यही खेला हुआ। लाइसेंस किसी गरीब आदमी के नाम पर लिया गया, लेकिन पटाखों पर “MV Corsair” की ब्रांडिंग इस बात की गवाह थी कि फैक्ट्री मुकेश विज ही चलवा रहे था। कोर्सियर का मतलब है- समुद्री डाकू। यही समुद्री डाकू देवास में मौत का सौदागर बना।

मुकेश विज का दूसरा कनेक्शन यहा है कि वेयरहाउस का रेंट एग्रीमेंट खुद मुकेश विज के नाम पर ही था जहाँ मजदूरों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंसकर रखा गया, नाबालिग बच्चों से काम कराया गया। बताया जा रहा है कि लाइसेंस की अवधि भी खत्म हो चुकी थी। बावजूद इसके, राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे टनों बारूद का भंडारण खुलेआम चलता रहा। पुराने लाइसेंस में जहां कुछ किलो सामग्री रखने की अनुमति थी, वहां कथित तौर पर टनों विस्फोटक जमा था। हैरानी की बात देखिए लायसेंस कुछ महिनों पहले ही खत्म हो चुका था जिसे हादसे से चंद दिन पहले 6 मई को ही दोबारा रिन्यू किया गया। अब सवाल यह है कि क्या यह सब किसी अदृश्य ग्रह पर हो रहा था? क्या प्रशासन आंखों पर पट्टी बांधकर बैठा था? जिले के कलेक्टर और एसपी कानून व्यवस्था और जनसुरक्षा के लिए कतई जिम्मेदार नहीं है?

क्या जिले के मुखिया अफसरों ने आँखों पर पट्टी बांध ली थी, अगर टनों बारूद जमा था, अवैध रूप से मजदूर काम कर रहे थे, नाबालिग बच्चों से काम लिया जा रहा था, लाइसेंस खत्म होने के बाद भी फैक्ट्री चल रही थी, तो क्या इसकी जानकारी केवल निचले कर्मचारियों तक सीमित थी? क्या जिले के मुखिया पूरी तरह अनजान थे?

पेटलावद हो या हरदा जब भी ब्लास्ट जैसी बड़ी घटनाएं घटी वहाँ के कलेक्टर और एसपी पर कार्रवाई हुई है। लेकिन देवास में छह मौतों और दर्जनों जिंदगियों के तबाह होने के बाद भी आखिर कलेक्टर-एसपी पर मोहन सरकार इतनी मेहरबान क्यों है?

या फिर सिस्टम का नया नियम यही है कि बारूद गरीबों के शरीर उड़ाए तो जिम्मेदार बाबू या निचले अफसर ही निलंबित होंगे, लेकिन अगर बारूद बडे आदमी के घरों तक पंहुचता तो बड़े अफसर ही जिम्मेदार माने जाते। आखिर क्यों मोहन सरकार जिले के आला अफसरों पर यह मेहरबानी कर रही है। क्यों सफेदपोश के कारनामे उजागर होने क बाद भी सत्ता से लेकर संगठन तक खामोश है। जागो सिस्सटम जागो कि जनता जानती है।