
राहुल गाँधी विदेशी नेटवर्क से जुड़े भारत विरोधी ताकतों के सवाल
आलोक मेहता
राहुल गांधी की विदेश यात्राओं के खर्च का विवाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच चल रहा एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा है। बीजेपी का आरोप है कि राहुल गांधी ने पिछले 22 वर्षों में 54 विदेश यात्राएं की है | इन यात्राओं पर अनुमानित खर्च लगभग 60 करोड़ रुपये आया है, जबकि उनकी घोषित आय केवल 11 करोड़ रुपये के आसपास है | कांग्रेस पार्टी इसे गैर महत्वपूर्ण कहकर कोई विस्तृत सफाई नहीं दे रही |
सवाल केवल यात्राओं और खर्च का नहीं , विदेशों के मेजबान लोगों , संगठनों और फिर वहां भारत के लोकतंत्र को लेकर दिए बयानों , गतिविधियों , गुप्त यात्राओं के महत्वपूर्ण हैं | शायद राहुल गांधी और कांग्रेस के उनके करीबी नेताओं को उनके सत्ता काल में ही ऐसी विदेश यात्राओं से आए राजनीतिक संकट का ध्यान नहीं है | सबसे बड़ा संकट 1985 में राजीव गांधी के प्रधान मंत्री और पार्टी प्रमुख रहते आया था , जब कांग्रेस के नेताओं की विदेश यात्राओं के तार जासूसी के प्रकरण से` जुड़े और मंत्रियों के इस्तीफे करवाने पड़े |
मेरे जैसे पत्रकार उन तथ्यों की ओर ध्यान दिला सकते हैं | असल में मैंने नव भारत टाइम्स के विशेष संवाददाता के रूप में 1985 में सी आई ए से जुड़े एक जासूसी कांड पर चल रही जांच पर एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट लिखी थी | 10 अक्टूबर 1985 को प्रकाशित इस रिपोर्ट में मैंने बताया था कि ” सरकारी एजेंसियां एक विवादास्पद व्यापारी राम स्वरुप और उससे जुड़े लोगों के संबंधों और सी आई ए के लिए जासूसी के प्रकरण की जांच कर रही है और इससे राजीव गांधी सरकार के मंत्रियों के नाम भी होने से कांग्रेस तथा पी एम के लिए राजनीतिक संकट पैदा हो सकता है | ” खबर पर हंगामा और राम स्वरुप की तरफ से मानहानि का क़ानूनी नोटिस आना स्वाभाविक था | लेकिन नोटिस के जवाब के बजाय मैंने कुछ फॉलो अप ख़बरें करके जासूसी से जुड़े और तथ्यों को छाप दिया |
असल में राम स्वरूप जासूसी प्रकरण 1985-86 के भारत के सबसे रहस्यमय और राजनीतिक रूप से विस्फोटक मामलों में गिना जाता है। इसमें खुफिया एजेंसियों, विदेशी लॉबिंग, राजनीति का मिश्रण दिखाई दे रहा था |1985 की शुरुआत में भारत में एक अन्य बड़े जासूसी नेटवर्क — कुमार नारायण जासूसी काण्ड का खुलासा हुआ। इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय, रक्षा मंत्रालय और अन्य विभागों से दस्तावेज लीक होने के आरोप लगे। तब गुप्तचर एजेंसियां और दिल्ली पुलिस ने गहरी जांच पड़ताल शुरू की | इसी व्यापक निगरानी के दौरान राम स्वरूप नेटवर्क पर भी ध्यान गया। सितम्बर में रामस्वरूप के घर , दफतर और कुछ अन्य ठिकानों पर छापे मारे गए | सरकारी सूत्रों के अनुसार वहाँ से विदेशी मुद्रा, राजनीतिक दस्तावेज, संसद चर्चाओं के नोट्स, रक्षा और विदेश नीति से जुड़ी फाइलें, तथा विदेशी संपर्कों के रिकॉर्ड मिले। हमने प्रमुख तथ्य प्रकाशित कर दिए | तब एक दो अन्य अख़बारों में भी उनका उल्लेख हुआ |
जांच एजेंसियों ने बताया कि राम स्वरूप विदेशी एजेंसियों के लिए सूचनाएं इकट्ठा करता है |भारत की विदेश और रक्षा नीति पर सूचनाएँ इकट्ठी की गई तथा प्रभावशाली नेताओं/अधिकारियों को प्रलोभनों से जोड़ रहा है | इसलिए उसके फोन की निगरानी, विदेशी संपर्कों , दूतावासों से संपर्कों और उसके तथा उससे जुड़े लोगों की विदेश यात्राओं के विवरण इकठ्ठे किए गए | इसमें ताइवान , इसराइल जैसे देशों के रास्ते सी आई ए के लिए भारत सम्बन्धी जानकारियां पहुँचाने की बातें सामने आने लगी | 29 अक्टूबर 1985 को उसे गिरफ्तार कर लिया गया |दिल्ली हाई कोर्ट में उसने बचाव में कहा कि वे केवल व्यापार प्रोत्साहन का काम करता था | सरकार ने उस पर आरोप लगाया कि वह कुछ देशों के लिए संवेदनशील जानकारी जुटाता रहा था | उसके पास ऐसे दस्तावेज मिले जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े थे | विदेशी संपर्कों को संवेदनशील सुरक्षा संबधी जानकारियां भेजी जा रही थी। मामले की संवेदनशीलता देखते हुए कोर्ट की कुछ कार्यवाही इन कैमरा यानी सार्वजनिक रूप से नहीं हुई | एजेंसियों के वकील ने आरोपपत्र दाखिल किया कि कुछ नेताओं और अधिकारियों ने राम स्वरूप से सुविधाएँ लीं, ताइवान तथा कुछ देशों की राम स्वरुप द्वारा प्रायोजित यात्राएं की | राम स्वरुप ने राजनीतिक प्रभावशाली नेटवर्क बनाया |
इस मामले के गंभीर रुप लेने पर जैसा हमने लिखा था , राजनीतिक संकट हो गया | तब टी वी निजी न्यूज़ चैनल सोशल मीडिया नहीं था | दूसरी तरफ राजीव गाँधी सरकार अमेरिका से रिश्ते सुधार रही थी | पार्टी में सोवियत समर्थक लॉबी मजबूत थी | इसलिए 29 जनवरी 1986 को मंत्रिमंडल के दो सदस्यों चंदूलाल चंद्राकर और के पी सिंह देव के मंत्री पद से इस्तीफे ले लिए गए | एक अन्य नेता एम् एस संजीव राव के इलेक्ट्रॉनिक कमीशन के अध्यक्ष पद ( कैबिनेट स्तर का ) से इस्तीफा हुआ | इन सबके रामस्वरूप के लिए विदेश यात्राओं के प्रमाण मिले थे | उन पर सीधे जासूसी का औपचारिक आपराधिक आरोप सिद्ध नहीं हुआ लेकिन राजनीतिक दबाव और विवाद के कारण इस्तीफा लिया गया। भारत से अधिक अमेरिका में इस इन इस्तीफों को जासूसी कांड से जोड़कर प्रकाशित किया गया | चंद्राकर पहले हिंदी अख़बार के संपादक भी रहे थे | इस जासूसी कांड` में दो तीन अन्य पत्रकारों के नाम भी आए | उनसे लम्बी पूछताछ हुई | एक तो बाद में अमेरिका जाकर बस गया | बाद में सरकार ने प्रकरण को धीरे धीरे ठन्डे बस्ते में डाल दिया |
इस तरह की पृष्ठभूमि में भाजपा का यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब राहुल गाँधी की कुल संपत्ति और देनदारियां लगभग 21 करोड़ रुपये हैं, तो इन विदेश यात्राओं पर खर्च हुए 60 करोड़ रुपये का हिसाब कैसे बैठता है?’ यह कानूनी सवाल पैदा करता है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के प्रावधानों के तहत, किसी भी सांसद, न्यायाधीश या सरकारी अधिकारी को किसी भी एजेंसी द्वारा प्रायोजित यात्रा के लिए गृह मंत्रालय से पूर्व अनुमति लेनी होती है। यदि कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत खर्च पर विदेश यात्रा करता है, तो उसे इसका विवरण आयकर रिटर्न में देना होता है। यदि विदेश में आपको कोई उपहार मिलता है या आप पर अज्ञात तरीके से पैसा खर्च किया जाता है, तो यह ‘काला धन अधिनियम 2015′ के प्रावधानों के दायरे में आता है।’ अमेरिका , ब्रिटेन , इटली , जर्मनी की यात्राओं से अधिक आश्चर्य्य राहुल की कोलंबिया , विएतनाम , थाईलैंड , क़तर , ओमान , मलेशिया की गुपचुप यात्राओं पर होता रहा है | भाजपा ने सवाल किया, ‘क्या उन्होंने अपनी विदेश यात्राओं के लिए गृह मंत्रालय से अनिवार्य पूर्व अनुमति प्राप्त की थी? दस्तावेज़ कहां हैं? क्या उन्होंने आयकर रिटर्न में इसका खुलासा किया है?’ यही नहीं पिछले साल सितंबर में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर दिसंबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच राहुल गांधी की छह ‘अघोषित विदेश यात्राओं’ पर चिंता जताई थी। अभी तीन मई 2026 की रात गांधी की मस्कट (ओमान) की निजी यात्रा का एक वीडियो फुटेज सामने आया । उन्होंने किसी सार्वजनिक कार्यक्रम की घोषणा नहीं की थी। न तो मेजबान का खुलासा किया गया और न ही कोई यात्रा कार्यक्रम बताया गया। उन्हें किसने आमंत्रित किया था? इसके लिए एफसीआरए की धारा छह के तहत अनिवार्य अनुमति भी नहीं दिखाई गई है।’यदि ओमान से जुड़ी इस जानकारी की पुष्टि हो जाती है, तो यह ‘येलो बुक’ सुरक्षा प्रोटोकॉल (नियमों) के उल्लंघन और अघोषित विदेश यात्राओं के उस क्रम में सातवीं यात्रा होगी।’ गांधी द्वारा की जा रही ये विदेश यात्राएं और विशेष रूप से उनकी ‘रहस्यमयी यात्राएं’ गंभीर सवाल खड़े करती हैं, खासकर तब जब वह भविष्य में देश का प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखते हैं।
बताया जाता है कि राहुल गांधी की अमेरिका और ब्रिटेन की विदेश यात्राओं का आयोजन मुख्य रूप से प्रवासी भारतीयों के संगठन ‘इंडियन ओवरसीज कांग्रेस’ द्वारा किया जाता है , जिसके प्रमुख सैम पित्रोदा हैं और उन्हें गाँधी परिवार का सबसे करीबी माना जाता है | लेकिन राहुल गांधी की विदेश यात्राओं, विशेष रूप से अमेरिका में कुछ विवादित मुस्लिम संगठनों और हस्तियों की भागीदारी, और ‘भारत विरोधी’ बयानों को लेकर विवाद उठते रहे हैं | राहुल गांधी के 2023 के अमेरिकी दौरे के दौरान, कुछ आयोजनों का समन्वय और समन्वय में सक्रियता भारतीय मूल के और कुछ मुस्लिम समूहों के साथ जुड़े लोगों ने की थी | इनमें ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ , ‘इस्लामिक सर्किल ऑफ नॉर्थ अमेरिका’ , और ‘मुस्लिम कम्युनिटी ऑफ न्यू जर्सी’ जैसे संगठन शामिल हैं | भारतीय जनता पार्टी का आरोप रहा है कि इन संगठनों के तार पाकिस्तान-समर्थक समूहों और ‘जमात-ए-इस्लामी’ से जुड़े हुए हैं |
अपने अमेरिका दौरे के दौरान, राहुल गांधी द्वारा केरल के क्षेत्रीय दल ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ को एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी कहे जाने पर भी भारत में भारी राजनीतिक विवाद छिड़ गया था| दूसरी तरफ ब्रिटेन में ‘कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी’ और ‘चैथम हाउस’ में अपने संबोधन के दौरान, राहुल गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना मिस्र के कट्टरपंथी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ से की थी | अमेरिका दौरे के दौरान राहुल गांधी की अमेरिकी सांसद ‘इलहान उमर’ के साथ हुई मुलाकात पर भी तीखा विरोध दर्ज हुआ था | आरोप लगाया गया कि राहुल गांधी विदेशी धरती पर जाकर देश की छवि खराब करते हैं, आंतरिक मामलों को उठाते हैं और ऐसे लोगों व संगठनों से मिलते हैं जो भारत के हितों के खिलाफ काम करते हैं | भारत जोड़ो यात्रा के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ब्रिटेन के दौरे पहुंचे । एक बयान में राहुल गांधी ने आरएसएस को एक ‘फांसीवादी’ संगठन बता दिया जिसने भारत के लगभग सभी संस्थानों पर कब्जा कर लिया है। यही नहीं कांग्रेस नेता ने लंदन में आरएसएस की तुलना मिस्र के विवादित संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से कर दी। मुस्लिम ब्रदरहुड एक ऐसा संगठन है जिसे कई देशों में आतंकी गतिविधियों में लिप्त संगठन माना जाता है।मुस्लिम ब्रदरहुड की विवादित नीतियों के कारण इसे सऊदी अरब, यूएई और कई अन्य मुस्लिम देशों में प्रतिबंधित कर दिया गया है।
राहुल गांधी ने भारत में मुस्लिमों की स्थिति को लेकर अमेरिका में बयान दिया । राहुल गांधी ने कहा कि अभी भारत में मुसलमानों की जो स्थिति हैं, वह ठीक वैसे ही है जैसे 80 के दशक में यूपी में दलितों की थी। ‘ एक सवाल के जवाब में कांग्रेस के राहुल गांधी ने कहा कि जिस तरह आप (मुसलमानों) पर हमला हो रहा है, मैं गारंटी दे सकता हूं कि सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी भी ऐसा ही महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज मुस्लिमों के साथ जो हो रहा है वह वैसा ही है जैसा यूपी में 1980 के दशक में दलितों के साथ हुआ। खास बात है कि राहुल जिस 80 के दशक का जिक्र कर रहे थे उस दौरान यूपी में लगभग 8 साल कांग्रेस की ही सरकार थी। ऐसे में राहुल ने यूपी का उदाहरण देकर कांग्रेस को ही फंसा दिया।
राहुल गांधी विदेश में कहते हैं कि वास्तव में आज जो भी भारत में गरीब तबका है, जब देश में चुनिंदा अमीर लोगों को देखता है तो उसे भी बिल्कुल वैसा ही महसूस होता है जैसा आपको होता है। वह भी सोचता है कि आखिर ये क्या हो रहा है। कैसे 4-5 लोगों को पास लाखों-करोड़ों रुपये की संपत्ति है और मेरे पास खाने को कुछ भी नहीं है। राहुल गांधी ने कहा कि चंद लोग हैं जिनका सिस्टम पर कंट्रोल है। उनका मीडिया पर कंट्रोल है। उन लोगों की पीछे पैसे वालों लोगों का पूरा सपोर्ट है। इस तरह राहुल गांधी अक्सर अपनी विदेश यात्राओं और घरेलू रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अडानी और अंबानी का नाम लेकर सरकार पर ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ (मित्र-पूंजीवाद) और ‘तानाशाही’ के आरोप लगाते हैं।उनका दावा है कि सत्ता और पूंजी का एक ऐसा गठजोड़ बन गया है, जो देश के लोकतांत्रिक संस्थानों को नियंत्रित कर रहा है और आम जनता के हितों की अनदेखी कर रहा है | प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों को सिरे से खारिज करती है | बीजेपी का पलटवार रहता है कि राहुल गांधी के आरोप निराधार हैं और वे अपनी राजनीति चमकाने व भारत की छवि खराब करने के लिए ऐसे बयान देते हैं | मतलब विदेशी नेटवर्क को लेकर राहुल गांधी लगातार विवादों में बने रहते हैं |





