इंदौर की बैकलेन क्रांति: जहां कभी कचरा था, वहां अब खिलखिलाहट है,दीवारों के साथ सोच भी बदली

उपेक्षा से सनी दीवारें अब रंगों, संवादों और सामुदायिक जीवन से जगमगा रही हैं

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इंदौर की बैकलेन क्रांति: जहां कभी कचरा था, वहां अब खिलखिलाहट है,दीवारों के साथ सोच भी बदली

वरिष्ठ पत्रकार के के झा की विशेष रिपोर्ट

इंदौर। भारत के अधिकांश शहरों में बैकलेन यानी कॉलोनियों और मकानों के पीछे की संकरी गलियां अक्सर उपेक्षा, गंदगी और अव्यवस्था की पहचान मानी जाती हैं। इन गलियों की तस्वीर लोगों के मन में आमतौर पर कचरे के ढेर, बदबू, टूटी नालियों, आवारा पशुओं, अंधेरे कोनों और असामाजिक गतिविधियों वाले स्थान के रूप में उभरती है। ये वे जगहें होती हैं, जिनसे लोग गुजरना तो चाहते हैं, लेकिन रुकना नहीं।

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लेकिन इंदौर — जिसे लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर माना जाता रहा है — ने अब इन भूली-बिसरी बैकलेनों की तस्वीर और तकदीर दोनों बदल दी हैं। यहां बैकलेन अब गंदगी और उपेक्षा की प्रतीक नहीं रहीं, बल्कि सौंदर्य, स्वास्थ्य, मनोरंजन, सामाजिक सहभागिता और सकारात्मक ऊर्जा के केंद्र बनती जा रही हैं।

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इंदौर नगर निगम द्वारा चलाए जा रहे अभिनव “रंग दे बैकलेन” अभियान के तहत शहर की उपेक्षित बैकलेनों को रंग-बिरंगे, आकर्षक और उपयोगी सामुदायिक स्थलों में बदला जा रहा है। इन गलियों में अब बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और स्थानीय नागरिक खुलकर समय बिताते दिखाई देते हैं।

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जो स्थान कभी घरों के पीछे का उपेक्षित हिस्सा माना जाता था, वह अब सार्वजनिक जीवन का विस्तार बन चुका है। किसी बैकलेन में स्कूली बच्चे कैरम बोर्ड पर पूरे उत्साह के साथ मुकाबला करते नजर आते हैं। कहीं सुबह-सुबह रंगीन दीवारों और पौधों के बीच लोग योग अभ्यास कर रहे हैं। तो कहीं नागरिक उत्साह से देखते हैं कि शहर के महापौर खुद बल्ला उठाकर उसी बैकलेन में क्रिकेट खेल रहे हैं, जहां कभी गंदगी और बदहाली का साम्राज्य था।

यह बदलाव केवल रंग-रोगन का नहीं है।

यह मानसिकता और माहौल दोनों का परिवर्तन है।

जो दीवारें कभी दाग, पोस्टरों और उपेक्षा की कहानी कहती थीं, वे अब आकर्षक भित्ति चित्रों, कलात्मक पेंटिंग्स, स्वच्छता संदेशों और रंगीन डिजाइनों से सजी दिखाई देती हैं। पुराने टायर सजावटी वस्तुओं में बदल गए हैं। गमलों और पौधों ने गलियों को हरियाली से भर दिया है। जिन कोनों में कभी कचरा जमा होता था, वहां अब बैठकों, संवादों और सामुदायिक गतिविधियों का माहौल बन रहा है।

इस बदलाव की सबसे प्रभावशाली तस्वीर शहर की एक स्लम बस्ती धनवंतरी नगर में दिखाई देती है। झुग्गी और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों की इस बस्ती की एक बैकलेन आज शहरी परिवर्तन का जीवंत उदाहरण बन चुकी है।

यहीं योग गतिविधि के दौरान महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने कहा —“जिस बैकलेन में कभी रोग होता था, वहां आज योग हो रहा है।” यह एक वाक्य ही इंदौर के इस परिवर्तन की पूरी कहानी बयान कर देता है।

अभियान के तहत बैकलेनों को अलग-अलग थीम पर विकसित किया गया है। ब्यूटीफुल बैकलेन थीम के अंतर्गत दीवारों पर आकर्षक चित्रकारी और कलात्मक सजावट की गई है। ग्रीन बैकलेन के तहत पौधारोपण, हरित दीवारों और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया गया है। वहीं यूटिलिटी और एक्टिविटी बैकलेन को ऐसे सार्वजनिक स्थलों के रूप में विकसित किया गया है, जहां लोग योग, व्यायाम, बैठकों और बच्चों के खेल जैसी गतिविधियां कर सकें।

इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत केवल नगर निगम की योजना नहीं, बल्कि जनभागीदारी है।

स्थानीय रहवासियों ने खुद ब्रश उठाए, पौधे लगाए, सफाई की और अपनी गलियों को सजाने का जिम्मा संभाला। युवाओं, सामाजिक संगठनों, स्वयंसेवकों और जनप्रतिनिधियों ने मिलकर इस अभियान को सरकारी योजना से आगे बढ़ाकर जनआंदोलन का रूप दे दिया।

शायद यही वजह है कि यह बदलाव बनावटी नहीं, बल्कि जीवंत और आत्मीय महसूस होता है।

इंदौर ने सिर्फ अपनी दीवारों को रंगीन नहीं बनाया है, बल्कि नागरिकों और शहर के रिश्ते को भी नए रंगों से भर दिया है।

ऐसे समय में, जब शहरी भारत प्रदूषण, सामाजिक दूरी और सिकुड़ते सामुदायिक जीवन की चुनौतियों से जूझ रहा है, इंदौर की ये बैकलेन एक बड़ा संदेश दे रही हैं — कि विकास केवल फ्लाईओवर, ऊंची इमारतों और बड़े प्रोजेक्ट्स से नहीं आता। कई बार असली बदलाव उन्हीं संकरी गलियों से शुरू होता है, जिन्हें समाज लंबे समय तक नजरअंदाज करता रहा हो।

इंदौर की बैकलेन अब शहर की समस्याओं को नहीं छिपातीं। वे अब गर्व के साथ शहर का चरित्र दिखाती हैं।