बफर जोन में तार फेंसिंग कराने का वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट कर रहे विरोध, सरकार इस पर 390 करोड रुपए खर्च करने जा रही है!

जानिए पेंच नेशनल पार्क को मोगली की पहचान दिलाने वाले वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट आरजी सोनी का तर्क आधारित विरोध

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बफर जोन में तार फेंसिंग कराने का वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट कर रहे विरोध, सरकार इस पर 390 करोड रुपए खर्च करने जा रही है!

गणेश पांडे की विशेष रिपोर्ट

भोपाल: मध्य प्रदेश के नेशनल पार्क के बफर जोन में तार फेंसिंग कराने का वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट विरोध कर रहे है। राज्य सरकार इस कार्य पर 390 करोड रुपए खर्च करने जा रही है।

पेंच नेशनल पार्क को मोगली की पहचान दिलाने वाले वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट आरजी सोनी ने भी तर्क आधारित विरोध जताया है।

मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध पेंच नेशनल पार्क को मोगली की पहचान दिलाने वाले रिटायर्ड एपीसीसीएफ एवं वन्य प्राणी एक्सपर्ट आरजी सोनी कहते हैं कि तुगलक बुद्धिमान बहुत था। प्लानिंग भी खूब करता था लेकिन जब उसको कार्य रूप में परिणिति करना होता तो फेल हो जाता था। लोगों को बुरा लग सकता है। लेकिन इतनी कठोरता केवल वन्य प्राणी हित को देखकर उचित नहीं लगती है। बांधव गढ़ और कान्हा में तार फेंसिंग की गई थी उसका हश्र जान ले तो अच्छा होता। टाइगर समेत कई वन्य प्राणियों की मौत तार फेंसिंग में फंसने से भी हुई है। यहां यह उल्लेखनीय है कि वन्य प्राणी शाखा 390 करोड़ खर्च कर बफर जोन में तार फेसिंग कराने जा रही है।

सोनी ने कहा कि वर्ष 2001 में जब मैं पेंच टाइगर रिज़र्व में फील्ड डायरेक्टर था तब मेरे से पूर्व के स्थानीय अधिकारी जो थे, के द्वारा वर्ल्ड बैंक पोषित जेएफएम योजना से छिंदवाड़ा बफर में तार फेंसिंग का प्रस्ताव मुख्य सचिव की मीटिंग में किया तो उसका विरोध उस मीटिंग में मौजूद एक IAS अधिकारी साहनी जी ने किया। जब मैं पदस्थ हुआ तो अगली मीटिंग में मैंने खुद वो प्रस्ताव वापस कर लिया था। यदि मैं एक माह बाद आता तो संभवतः यह दुर्घटना घट चुकी होती। तारों को वन्य प्राणी नहीं देख पाते अतः जब भी प्रिडेटर दौड़ाता है तो दोनों उन तारों में फंसकर मर जाते है। इस तरह की दुर्घटनाओं को हम बिन बुलाए आमंत्रित कर रहे है।

*पेंच से सबक लेकर आएं अधिकारी*

सोनी का मानना है वैसे तो किसी फैंसिंग की जरूरत नही है, लेकिन यदि कहीं गांव की खेती को बहुत नुकसान हो रहा है और हमारे वन्य प्राणियों की संख्या बहुत अधिक है, जैसा पेच में है तो वहां पर 8 फीट ऊंची पत्थर की दीवाल जो रैंडम रबल अर्थात पत्थरों से जिसे हम CPW wall कहते है Cattle proof Wall बनाना चाहिए। पेंच के बफर में देख ले, कैसी बनी है । इससे टाइगर , पैंथर मांसाहारी जानवर तो जा सकते है क्योंकि उनको जाना ही चाहिए किन्तु चीतल , सांभर ,नील गाय और सुअर नहीं जा सकेंगे। छिंदवाड़ा की तरफ बफर के गांव जो लगे थे, उनकी खेती चौपट कर देते थे सुअर आदि लेकिन दीवाल बनने के बाद अच्छी खेती होने लगी और पेंच में तो 100 गांव 2 से 3 किलोमीटर में ही बसे है वहां कभी मानव-वन्य प्राणी संघर्ष नही हुआ। इससे जीन पूल का वितरण नही रुकेगा और मजबूत है गिर जाए तो फिर रख दो। तार को तो ग्रामीण काट देंगे।

*सफल कहानियों का मूल्यांकन तो करे*

हमारे बाघ, बाघिन बफर के मवेशी मारते थे लेकिन 15 दिन के अंदर मुवावजा बिना परेशानी के मिलने से ग्रामीण कहते कि अगर एक और गाय खा जाती बाघिन तो अच्छा होता। कभी भी बफर में गए बाघों को हकालना नही चाहिए । क्योंकि यह तो समझो, क्यों गया है । मतलब बाघ भोजन और पानी के लिए बफर जोन पहुंचा।

*भीषण गर्मी में डॉट, न बाबा….*

कभी भी अप्रैल के बाद गर्मी में डॉट नही लगाना चाहिए। हाथी से दूर कर दे और लगाना जरूरी हो तो पूरी व्यवस्था हो तब शाम के समय जब ठंडा हो जाये। अब तो उसको भीषण गर्मी में डॉट कर कोर एरिया में छोंड़ते है। अगर उधर कोई बड़ा बाघ हुआ तो उसको निपटा देगा। बाघ अपनी टेरिटरी समझबूझ कर बनाता है। अधिकांश ऐसे प्रकरण में बाघ या तो कुछ दिन में मर गए या वन बिहार की जेल में कैद है। एक तरह से जिला बदर या तड़ीपार करना है। प्राकृतिक तरीके से सोचे । जो गया है लौट आएगा । अरे मवेशी ही तो खा रहा है कोई मर्डर तो नही कर रहा। ग्रामीणों को बचाने का उपाय बताए । इसके बाद भी दुर्घटना हो सकती है तो वनों के अंदर हम घुसे है तो सतर्क हमी को रहना होगा।

*पेंच में चार वर्ष रहा कभी बाघ हकाला*

सोनी ने बताया कि 4 वर्ष मैं भी था बाघ जाते थे कभी भी नहीं हकाला गया। बल्कि एक बाघिन जिसकी वंश में कॉलर वाली बाघिने थी, उसके चार शावक थे। जमतरा के बफर में रोज दो गाय या बैल मारती । मैंने प्रोजेक्ट टाइगर के अधिकारी से पूंछा कि क्या करे । उन्होंने बताया कि चौकीदार लगा दो जो नजर रखे। मैंने स्वतः मौका देखा और उपाय किया जो मैंने अपनी पुस्तक में लिखा है ।उस बाघिन ने अपने शावक पाले खूब मौज उड़ाई हमने 1 से 2 लाख मुवावजा दिया और हमें कोई भी फिक्र नहीं । और न हमारा कोई अधिकारी कभी पिटा। ग्रामीणों से सतत और उनकी सामान्य मदद हमे सहयोग करती है।

*टाइगर बफर से बाहर यानि पानी और भोजन की कमी*

गर्मी में वन में पेय जल की समस्या बढ़ जाती है तो हमे ही देखना होगा कि बफर हो या कोर क्या हर 5 किलोमीटर के वृत्त में पर्याप्त पानी गर्मी भर है ।और यदि नहीं है तो बाघ गावों में घुसेंगे। फेंसिंग का पैसा पानी के लिए तालाब खुदवाने में लगा दे तो समस्या खुद समाप्त हो जाएगी। मैंने यही किया। टैंकर बंद , झिरिया , चेक डैम और फिर 25 तालाब । आज सबसे अधिक और सब क्षेत्रो में शाकाहारी वन्य प्राणी की उपस्थित क्या ऐसे हो गई?

पूर्व अधिकारी बताते थे कि छिंदवाड़ा की तरफ बहुत अल्प चीतल वो भी पेच नदी के किनारे दिखते थे और आज वहां गौर ( BISON ) के झुंड और टाइगर प्रचुर मात्रा में क्यो दिख रहे है।

*अधिकारी पेंच समझने के लिए जाएं, जंगल सफारी के लिए नहीं*

पेंच अभ्यारण्य जो अब मोगली पेंच अभ्यारण्य नाम है,के पठार में खरगोश ही दिखता था फरवरी के बाद लेकिन अब गौर , बाघ , चीतल , सांभर गर्मी में क्यो दिख रहे है। सोनी ने कहा कि मैंने जो काम किया नैसर्गिक तरीके से किया। कोई समझना चाहे तो जाए और समझने के लिए जाए। जंगल सफारी करके न आये। मैं 2025 मई में केवल दो दिन रुका और सभी मेरे समय खुदे तालाब देखे।

एक तालाब जो बाघिन नाला के बाद बहने वाले पानी को रोकने बेर वन में बना था बहुत अच्छा बना था। मेरे बाद बना था। मैंने 5 बर्ष पहले देखा था। वो 4 वर्ष से फूटा पड़ा था मैंने इसे संबंधित अधिकारियों से कहा अब शायद बन जाये। वो क्षेत्र बहुत सूखा क्षेत्र है। क्या विभाग के पास एक लाख रुपया नही था। आज 3 करोड रुपये से अधिक राजस्व है। हम जब थे तो ढाई लाख रुपये था । इतने बड़े साम्राज्य की नींव साहस से खड़ी की । या तो विभाग पानी की उपलब्धता को महत्वपूर्ण नही मानता या फील्ड विजिट नही हो रही । आशा की जाती है कि सौभाग्य से वन विभाग को इतना अधिक पैसा मिल रहा है उसका सार्थक उपयोग हो।

*बफर के हैबिटैट को इम्प्रूव करे*

बफर के गावो को हटाने में बजट न खर्च कर कोर और बफर के हैबिटैट को इम्प्रूव करे। और जो लोग कहते है कि बहुत बाघ हो गए है, क्षेत्र कम है, वो गलत है। आज भी यदि कोर और बफर को उस लायक बना दे तो तीन गुना बाघ रह सकते है। इनकी गणित क्यों गलत है। एक बाघ को 20 वर्ग किलोमीटर चाहिए तो बाघों की संख्या से गुना कर देते है। जबकि 20 वर्ग किलोमीटर में तीन बाघ रह सकते है। दो बाघिने भी उसी में रहेंगी। कितने पार्कों में 40 से 60% क्षेत्र फरव री में वन्य प्राणियों के रहने लायक नही है।

सोनी ने आशा व्यक्त की कि मेरे वक्तव्य को निंदा न समझकर सार्थक काम करेंगे और प्राकृतिक तरीका अपनाएंगे।