राज-काज: इस रेल परियोजना में ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’….!

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राज-काज: इस रेल परियोजना में ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’….!

इस रेल परियोजना में ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’….!

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– सरकार केंद्र की हो या राज्य की, इसे चलाने वाले अफसर और नेता ऐसी गलतियां करते हैं, जिन्हें किसी भी कीमत पर क्षमा नहीं किया जाना चाहिए। पर ऐसा नहीं होता। गंभीर गलतियां होती हैं। करोड़ों की बरबादी होती है। पर्यावरण को नुकसान होता है। लेकिन कार्रवाई किसी के खिलाफ नहीं। खजुराहो से पन्ना होकर सतना जाने वाली रेल लाइन काे ही ले लीजिए। खजुराहो से पन्ना के बीच नेशनल पार्क है। इससे लगा घना जंगल भी। रेलवे ने 2021 में लाइन की डिजाइन फाइनल की। 315 हेक्टेयर जमीन अधिग्रहित की गई और 2022-23 में जंगल में लगे 54,578 पेड़ 24 करोड़ रुपए खर्च कर काट डाले गए। अचानक रेल्वे ने यह कह कर पुराना डिजाइन बदल दिया कि यह रूट खतरनाक था। अब 258 हेक्टेयर जंगल फिर अधिग्रहीत किया जा रहा है। इस रूट पर आने वाले 50 हजार पेड़ फिर काटे जाएंगे। इस पर भी 24-25 करोड़ की राशि खर्च होगी। गलत डिजाइन का नुकसान अब पर्यावरण और सरकारी खजाने दोनों को उठाना पड़ रहा है। नए रूट के लिए निजी एजेंसियों से दोबारा सर्वे कराया गया। परियोजना 3 साल पीछे चली गई, लागत बढ़ रही है। बड़ा सवाल है कि इस बड़ी गलती के लिए जवाबदार कौन है? इसके लिए अब तक किसी को चिन्हित क्यों नहीं किया गया? इसे ही कहते हैं ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा।’

0 क्या टीईटी परीक्षा बिना बच्चों की पढ़ाई संभव नहीं….?

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– सुप्रीम कोर्ट पर न प्रदेश के लाखों शिक्षकों की मिन्नत का असर पड़ा, न राज्य सरकार द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका का। नतीजा, देश के सुप्रीम फैसले से लगभग डेढ़ लाख शिक्षकों और उनके परिवार का भविष्य खतरे में पड़ गया। इनमें से जिन शिक्षकों ने टीईटी की परीक्षा पास कर ली, वे तो अपनी नौकरी बचा ले जाएंगे लेकिन जो ऐसा नहीं कर सके, उनके घरों में चूल्हे जलने के लाले पड़ेंगे क्योंकि ये शिक्षक बच्चों को सालों पढ़ाने के बाद दूसरा काम करने लायक भी नहीं बचे। विडंबना यह है कि पहले इन्हें बिना टीईटी परीक्षा पास किए शिक्षक बना दिया गया। तब से ये लगातार स्कूलों में बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इनके पढ़ाए बच्चे हर साल अगली कच्छाओं में जा रहे हैं। इन बच्चों को आगे बढ़ने में इस कारण कोई समस्या नहीं आ रही कि इन्हें उन शिक्षकों ने पढ़ाया, जिन्होंने टीईटी की परीक्षा पास नहीं की थी। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि शिक्षकों को टीईटी परीक्षा पास कराने का भूत सवार हो गया। यह परीक्षा सभी शिक्षकों के साथ उन्हें पास करना अनिवार्य है जो वर्ष 2009 से पहले भर्ती हुए हैं। यह ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें परीक्षा पास करने के लिए और समय दिया है। पर बड़ा सवाल यह है कि इतनी सर्विस के बाद अब यह अनिवार्य क्यों? भविष्य में यह परीक्षा पास करने वाले ही शिक्षक बनें, यह फैसला कर मामले को खत्म किया जा सकता था।

0 भाजपा में कांग्रेस संस्कृति आने से अटकी कार्यसमिति….!

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– भाजपा के अंदर जब से सिद्धांतों को ताक पर रख कर सबसे बड़ा दल बनाने का भूत सवार हुआ। इसके लिए सत्ता की मलाई के लालची नेताओंं को दूसरे दलों से ताेड़ कर भाजपा में शामिल किया गया। मान लिया गया कि रातों रात इनकी आस्था बदल गई और ये भाजपा के प्रति निष्ठावान हो गए। इस गलतफहमी का नतीजा यह हुआ कि इस पार्टी के अंदर भी कांग्रेस जैसी संस्कृति ने घर कर लिया। बाहर से आए नेता प्रमुख पदों पर काबिज हो गए और पार्टी के निष्ठावान नेता देखते रह गए। सिफारिशों के कारण पहले निगम-मंडलों में नियुक्तियां अटकीं, मंत्रिमंडल विस्तार नहीं हो सका और अब प्रदेश कार्यसमिति अटकी पड़ी है। इसे भाजपा में कांग्रेस संस्कृति आने का नतीजा माना जा रहा है। पहले यह अप्रैल में घोषित होना थी, इसके बाद मई में, लेकिन यह महीना भी खत्म हो गया। बताया जा रहा है कि कार्यसमिति के गठन में सिफारिशें भारी पड़ रही है। खबर है कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया उन सभी नेताओं को एडजस्ट कराना चाहते हैं जो 2020 में उनके साथ कांग्रेस छोड़ कर आए थे। तब उनके सभी समर्थकों को कहीं न कहीं जगह दी गई थी। इसीलिए तब वीडी शर्मा को 403 लोगों की जंबो कार्यसमिति बनाना पड़ी थी। लेकिन अब भाजपा अपने संविधान के अनुसार ही संख्या रखना चाहती है, इसीलिए पेंच फंसा बताया जा रहा है।

0 कांग्रेस की बेचैनी खत्म, नेताओं ने ली चैन की सांस….

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– प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से हुई मुलाकात ने प्रदेश कांग्रेस की बेचैनी खत्म कर दी। राज्यसभा चुनाव के दौरान आपरेशन लोटस की संभावना को लेकर कांग्रेस नेताओं में बेचैनी थी। भाजपा की ओर से संकेत आ गया कि वह तीसरी सीट जीतने के लिए कांग्रेस में तोड़फोड़ का सहारा नहीं लेगी। भाजपा को कांग्रेस तोड़ने में दाल गलती नहीं दिखी या उसके अंदर वास्तव में साफ-सुथरे चुनाव का ख्याल आ गया, सच जो भी हो पर खबर है कि भाजपा अब राज्यसभा की तीसरी सीट के लिए उम्मीदवार नहीं उतारेगी। विधानसभा में सदस्य संख्या के अनुसार यह सीट कांग्रेस को जीतने देगी। इस खबर से कांग्रेस नेताओं ने चैन की सांस ली है। खासकर प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने। ये दोनों आपरेशन लोटस को लेकर ज्यादा परेशान बताए जा रहे थे। हालांकि इसे लेकर पार्टी अब भी सतर्क है। मजेदार बात यह है कि बेचैनी खत्म होने के बाद अब कांग्रेस में प्रत्याशी चयन को लेकर सिर-फुटौव्वल है। दिग्विजय सिंह और जीतू पटवारी राज्यसभा के लिए दावेदारी से इंकार कर चुके है। फिर भी इनके लिए लाबिंग जारी है। अरुण यादव, मीनीक्षी नटराजन, कमलेश्वर पटेल, सज्जन सिंह वर्मा प्रमुख दावेदार हैं। कमलनाथ का नाम आगे आने से इनके दावे कमजोर पड़ने लगे हैं। देखिए, बाजी किसके हाथ लगती है।

0 क्या सच बहुसंख्यक साप्रदायिकता ही खतरनाक….?

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– इस बात से किसी को इंकार नहीं है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह सनातनधर्मी हैं। वे ऐसे गिने-चुने नेताओं में से हैं, जिन्होंने लगभग साढ़े 3 हजार किमी की नर्मदा परिक्रमा की है। उनके राघौगढ़ परिसर में कई मंदिर हैं, जहां अखंड ज्योति जलती है। वे शंकराचार्य कैलाशवासी स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य हैं। बावजूद इसके उनके बयान हमेशा हिंदू समाज को टारगेट करते हुए मुस्लिम समाज के पक्ष में दिखाई पड़ते हैं। इसके कारण वे आरएसएस और भाजपा के पंसदीदा नेता भी हैं, क्योंकि इससे उनकी विचारधारा फलती-फूलती है और वोट बैंक बढ़ता है। हाल ही में दिग्विजय ने भोजशाला पर हाईकोर्ट के निर्णय पर यह कह कर सवाल उठाया था कि एएसआई ने जो रिपोर्ट प्रस्तुत की थी उसमें भोजशाला में मंदिर होने के प्रमाण नहीं मिले थे। अब उन्होंने सांप्रदायिकता को लेकर बहुसंख्यक हिंदू समाज को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि देश में अल्पसंख्यकाें की तुलना में बहुसंख्यक सांप्रदायिकता ज्यादा खतरनाक है। ऐसा कह कर उन्होंने समूचे हिंदू समाज को सांप्रदायिक ठहरा दिया। दिग्विजय ने ऐसा पहली बार नहीं किया, अक्सर उनके बयान हिंदू समाज को टारगेट करते हुए मुस्लिमों के पक्ष में होते हैं। राजनीति के मौजूदा दौर में इसका खामियाजा कांग्रेस के साथ खुद दिग्विजय को भी भुगतना पड़ता है।

लेखक हरिभूमि भोपाल के पॉलिटिकल एडिटर हैं*