अशांत पर्वतीय क्षेत्र पर शांति की बयार या राजनीतिक बारुद की बिसात

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अशांत पर्वतीय क्षेत्र पर शांति की बयार या राजनीतिक बारुद की बिसात

मणिपुर में दो महीने से हुई अशांति और हिंसा की स्थिति पर अब नियंत्रण की आशा दिखने लगी है| निश्चित रुप से इस तरह की भयावह हिंसा के घाव वर्षों तक दर्द देते रह सकते हैं| इस बीच राजनीतिक हंगामे और पडोसी राज्य मिजोरम को भी उत्तेजित करने के लिए हुए प्रयास भारत के दूरगामी हितों और अंतरराष्ट्रीय छवि के लिए खतरनाक हैं| मणिपुर में करीब 140 लोगों की मृत्यु और पचासों घर जल जाने तथा तनाव अविश्वास का माहौल सचमुच दुखद है| लेकिन इस स्थिति पर अतिरंजित पूर्वाग्रहों के साथ राजनीतिक बवाल भी उचित नहीं है|  पूर्वोत्तर में प्रगति के साथ सूचना क्रांति, अभिव्यक्ति की आज़ादी और सोशल मीडिया के प्रभाव से यह भ्रम बनाने के प्रयास हुए हैं कि यह अभूतपूर्व स्थिति है| जिम्मेदार राजनेताओं और जागरुक संस्थाओं के लोगों को  ध्यान होगा कि आज़ादी के बाद हुई सबसे बड़ी साम्प्रदायिक हिंसा असम में 1983 में हुई थी, जब करीब दो हजार लोग मारे गए थे| केंद्र में श्रीमती इंदिरा गाँधी की कांग्रेस सरकार सत्ता में थी| भारी हिंसा के 688 प्रकरण दर्ज हुए| जांच के लिए तिवारी आयोग बना , जिसने 600 पेज की रिपोर्ट दी| कांग्रेसी मुख्यमंत्री हितेश्वर सेकिया ने रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं होने दिया|  महीनों तक 378 मामलों में क़ानूनी कार्यवाही भी चली, लेकिन  लेकिन 1985 में प्रधान मंत्री राजीव गांधी की सरकार द्वारा किए गए असम समझौते के तहत ये प्रकरण भी बंद कर दिए गए| बहरहाल, हाल के वर्षो में असम ही नहीं सम्पूर्ण पूर्वोत्तर राज्य तेजी से प्रगति कर रहे हैं|

पूर्वोत्तर की सामाजिक राजनीतिक चुनौतियां हमेशा रही हैं| 1966 में तो लुशाई पहाड़ियों में हजार से अधिक मिज़ो विद्रोहियों ने पूरे इलाके को तहस नहस कर दिया था, पुल उड़ा दिए थे, टेलीफोन के तार काट दिए थे और सरकारी दफ्तरों पर कब्ज़ा कर लिया था| गड़बड़ी इतनी हो गई थी कि कथित विश्वसनीय विदेशी रेडियो बी बी सी ने तो मिज़ो क्षेत्र के भारत से अलग हो जाने की खबर प्रसारित कर दी थी| असम, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड में विदेशी समर्थन से अलगाववादी तत्व सदा सक्रिय रहे हैं| इसलिए  पूर्वोत्तर में शांति के लिए वर्षों तक कार्य करने वाले और विद्रोही लालडेंगा को समझौते के  रास्ते पर लाने वाले विधिवेत्ता मिजोरम के पूर्व राज्यपाल स्वराज कौशल द्वारा पिछले दिनों सोशल मीडिया ट्वीटर पर व्यक्त की गई यह आशंका सही लगती है कि “मणिपुर में हो रही हिंसा किसी षड्यंत्र का परिणाम है| पूर्वोत्तर पहले कभी भ्रष्टाचार मुक्त नहीं था और भाजपा शासन के दौरान  सही अर्थों में विकास होने लगा| इस दृष्टि से यह भाजपा विरोधी ताकतों का षड्यंत्र है|” श्री स्वराज कौशल ने ट्वीट में यह चिंता भी व्यक्त की है कि “किसी इलाके में अलगाव और उग्रवाद का आंदोलन शुरू होने पर 25 वर्षों तक चलने का ख़तरा रहता है| इसलिए मणिपुर में शांति के लिए तत्काल हर संभव प्रयास होने चाहिए|”

यह स्वीकारा जाना चाहिए कि राज्य सरकार ने हिंसा रोकने के लिए समय पर पर्याप्त कदम नहीं उठाए| महिलाओं पर घिनोने अत्याचार के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित होने से स्थिति बिगड़ने के साथ प्रतिपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिल गया| गृह मंत्री अमित शाह ने पहले दो दिन लगाकर मेती और कुकी समुदाय के प्रतिनिधियों से विस्तार से बातचीत की| फिर भी स्थिति सामान्य नहीं हो पाई| बताया गया कि  प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी दिन में तीन बार रिपोर्ट ले रहे हैं| अब केंद्र सरकार ने महिलाओं पर निर्मम अत्याचार की घटनाओं और उसके प्रचार से हिंसा भड़काए जाने की जांच सी बी आई को सौंपने का निर्णय कर लिया है| इस जांच से षड्यंत्र और अपराधियों पर  कठोर कार्रवाई तथा राज्य प्रशासन की कमियों- गड़बड़ी भी सामने आ सकेगी|

कांग्रेस के कुछ नेताओं ने संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने के अलावा बार बार यह मुद्दा  भी उठाया कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं मणिपुर क्यों नहीं गए? सरकार ने इस पर कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया| लेकिन मुझे पूर्व  प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की एक बात याद आ गई, जो उन्होंने मुरादाबाद के बड़े सांप्रदायिक दंगे होने पर दो महीने तक उस क्षेत्र में न जाने के सम्बन्ध में कही थी| 21 अक्टूबर 1980 को  पत्रकार के प्रश्न के उत्तर में कहा था-“जब सांप्रदायिक दंगे चल रहे हों तो परिस्थिति बिल्कुल भिन्न होती है, क्योंकि सब बातें सामने नहीं आती| प्रत्येक मौके पर चाहे मैं प्रधान मंत्री पद पर रही हूँ या नहीं, प्रशासन यह महसूस करता है कि ऐसी यात्राओं से, विशेष रूप से किसी सरकारी व्यक्ति की यात्रा से तनाव बढ़ सकता है क्योंकि लोग आपके पास आते हैं और अपनी अपनी कहानियां सुनाते हैं और अगर बहुत से लोग एक जगह जमा हो जाएं तो कुछ भी घटित हो सकता है|” इस तरह की सलाह शायद आज भी वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी देते होंगे|

मुरादाबाद के दंगे में 2500 और बाद में भागलपुर के दंगों में 1000 से अधिक लोग मारे गए थे| चाहे मुरादाबाद हो या भागलपुर के भयावह दंगे रहे हों, यह तथ्य तो बाद में सरकारों ने माना है कि इन दंगों के लिए समाज के विभिन्न वर्गों को तत्कालीन सरकार के विरुद्ध भड़काने की कोशिश होती रही है| यही प्रयास अब भी हो रहे हैं| मणिपुर में पहले कुछ घटनाएं होती रही थी| वहीं मूल आदिवासी बहुसंख्यक मैती समाज के लोग ही भेदभाव और अत्याचार की शिकायतें करते रहे थे| इस बार एक अदालती आदेश से उन्हें भी आरक्षण सुविधा मिलने पर जब विरोध हुआ तो हिंसा भड़क गई| यह भी तथ्य है कि कुकी समुदाय और म्यांमार से आए हुए वर्ग को चर्च आदि का प्रश्रय मिलता रहा और आग भड़कने पर चर्च भी निशाना बन गए| चिंता की बात यह भी है कि किसी समय म्यांमार के रास्ते सक्रिय आतंकी तत्वों से निपटने के लिए स्थानीय समूहों को हजारों हथियार दिए गए थे| अब उन हथियारों का दुरुपयोग हो रहा है| देर से सही केंद्र सरकार ने 35  हजार सुरक्षा बल भेज दिया है| सेना द्वारा हथियारबंद लोगों को बहुत कड़ाई से रोकना होगा, ताकि हिंसा को पूरी तरह काबू किया जा सके|

इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि असम और पूर्वोत्तर राज्य में गड़बड़ी के लिए विदेशी एजेंसियां और भारत विरोधी अलगाववादी संगठन सक्रिय रहे हैं| खासकर चीन और पाकिस्तान अवसर की तलाश में रहते हैं| सत्तर अस्सी के दशक में सी आई ए की गतिविधियों से निपटने के लिए केंद्र की सरकार सुरक्षा बलों के अलावा  गैर सरकारी राष्ट्रभक्त संगठनों  और सभी दलों के लोगो से सहयोग लेती थीं| भारत की बढ़ती शक्ति और सामाजिक आर्थिक विकास के साथ चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं| राष्ट्र की एकता, अखण्डता और सुरक्षा के लिए सर्वाधिक सद्भाव, राजनैतिक सहयोग और सुरक्षा प्रबंध की आवश्यकता है| आशा की जानी चाहिए कि संकीर्ण राजनीति से हटकर मणिपुर में शांति व्यवस्था लाने और सामान्य स्थिति बनने में यथा शीघ्र सफलता मिल सकेगी|

Author profile
ALOK MEHTA
आलोक मेहता

आलोक मेहता एक भारतीय पत्रकार, टीवी प्रसारक और लेखक हैं। 2009 में, उन्हें भारत सरकार से पद्म श्री का नागरिक सम्मान मिला। मेहताजी के काम ने हमेशा सामाजिक कल्याण के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया है।

7  सितम्बर 1952  को मध्यप्रदेश के उज्जैन में जन्में आलोक मेहता का पत्रकारिता में सक्रिय रहने का यह पांचवां दशक है। नई दूनिया, हिंदुस्तान समाचार, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान में राजनितिक संवाददाता के रूप में कार्य करने के बाद  वौइस् ऑफ़ जर्मनी, कोलोन में रहे। भारत लौटकर  नवभारत टाइम्स, , दैनिक भास्कर, दैनिक हिंदुस्तान, आउटलुक साप्ताहिक व नै दुनिया में संपादक रहे ।

भारत सरकार के राष्ट्रीय एकता परिषद् के सदस्य, एडिटर गिल्ड ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष व महासचिव, रेडियो तथा टीवी चैनलों पर नियमित कार्यक्रमों का प्रसारण किया। लगभग 40 देशों की यात्रायें, अनेक प्रधानमंत्रियों, राष्ट्राध्यक्षों व नेताओं से भेंटवार्ताएं की ।

प्रमुख पुस्तकों में"Naman Narmada- Obeisance to Narmada [2], Social Reforms In India , कलम के सेनापति [3], "पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा" (2000), [4] Indian Journalism Keeping it clean [5], सफर सुहाना दुनिया का [6], चिड़िया फिर नहीं चहकी (कहानी संग्रह), Bird did not Sing Yet Again (छोटी कहानियों का संग्रह), भारत के राष्ट्रपति (राजेंद्र प्रसाद से प्रतिभा पाटिल तक), नामी चेहरे यादगार मुलाकातें ( Interviews of Prominent personalities), तब और अब, [7] स्मृतियाँ ही स्मृतियाँ (TRAVELOGUES OF INDIA AND EUROPE), [8]चरित्र और चेहरे, आस्था का आँगन, सिंहासन का न्याय, आधुनिक भारत : परम्परा और भविष्य इनकी बहुचर्चित पुस्तकें हैं | उनके पुरस्कारों में पदम श्री, विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा डी.लिट, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार, गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार, पत्रकारिता भूषण पुरस्कार, हल्दीघाटी सम्मान,  राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार, राष्ट्रीय तुलसी पुरस्कार, इंदिरा प्रियदर्शनी पुरस्कार आदि शामिल हैं ।