आखिर प्रशासनिक सेवाओं में ऐसा क्या आकर्षण है कि लाखों युवा हर साल अपनी जवानी इन पर बर्बाद कर रहे हैं?

54

आखिर प्रशासनिक सेवाओं में ऐसा क्या आकर्षण है कि लाखों युवा हर साल अपनी जवानी इन पर बर्बाद कर रहे हैं?

   यह व्यवस्था कहीं न कहीं पुरानी राजशाही मानसिकता को जिंदा रखे हुए है

वेद माथुर

495566552 10231645265666700 3316060739622831392 n

हर साल लगभग 10-13 लाख युवा UPSC सिविल सर्विसेज परीक्षा के लिए आवेदन करते हैं, लेकिन अंत में सिर्फ 900-1100 पदों पर ही चयन होता है। सफलता दर महज 0.1-0.2% के आसपास रहती है। यानी लाखों युवा सालों-साल कोचिंग, पढ़ाई और मेहनत में लगाते हैं, लेकिन ज्यादातर को निराशा ही हाथ लगती है। फिर भी यह आकर्षण कम क्यों नहीं होता?नौकरियां ऊंट के मुंह में जीरे जितनी कम, फिर भी सपना क्यों?
सच तो यह है कि UPSC जैसी परीक्षाओं में सफल होने वाले उम्मीदवारों की संख्या बहुत कम है, लेकिन समाज में इनकी इज्जत और पावर इतनी ज्यादा है कि युवा इसे ही अंतिम लक्ष्य मान लेते हैं। खासकर SC, ST, OBC वर्ग के युवाओं पर इसका सबसे ज्यादा नकारात्मक असर पड़ता है। ये युवा अक्सर सिर्फ सरकारी नौकरी की तैयारी में जुट जाते हैं और अन्य विकल्पों जैसे विदेश में जॉब, प्राइवेट सेक्टर में हाई पैकेज, स्टार्टअप या स्वरोजगार की ओर मुड़ते ही नहीं। नतीजा? उनकी प्रतिभा एक ही दिशा में सीमित हो जाती है, जबकि देश को विविध क्षेत्रों में उनकी जरूरत है।
मुख्य आकर्षण: लीगल और एक्स्ट्रा-लीगल पावर:
प्रशासनिक सेवाओं का सबसे बड़ा आकर्षण पावर और विशेषाधिकार है, न कि सिर्फ सेवा भावना।विशाल सरकारी बंगला (कई बीघे में फैला, अक्सर ऐतिहासिक)
लाल बत्ती वाली गाड़ी और VIP प्रोटोकॉल
सरकारी ड्राइवर, सुरक्षा गार्ड, पूरा स्टाफ
रेस्टोरेंट, सिनेमा टिकट जैसी सुविधाएं मुफ्त या रियायती
ट्रांसफर-पोस्टिंग में राजनीतिक प्रभाव
असीमित प्रशासनिक शक्ति – जहां एक फाइल पर फैसला लाखों-करोड़ों का होता है
ये सब मिलकर एक राजशाही ठाठ-बाट का एहसास देते हैं। कई युवा करोड़ों के प्राइवेट पैकेज छोड़कर सिर्फ इसी “भौकाल” के लिए दौड़ते हैं।
भ्रष्टाचार का काला सच:अखबारों में रोज खबरें आती हैं कि कई अधिकारी सेवा काल में 20 से 100 करोड़ तक की संपत्ति बना लेते हैं। भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियां बड़े “मगरमच्छों” को पकड़ने में अक्सर नाकाम रहती हैं। हाल के आंकड़ों और रिपोर्ट्स से पता चलता है कि IAS/IPS अधिकारियों में भ्रष्टाचार, अक्षमता या inefficiency के मामले आम हैं। एक पूर्व RBI गवर्नर ने कहा था कि लगभग 25% अधिकारी corrupt, incompetent या inefficient होते हैं।
सफलता का अतिरंजित सम्मान और यूट्यूब कल्चर:
कई जगह 10से 12 बार अटेम्प्ट देकर 800वी रैंक लाने वाले को भी ऐसे सम्मानित किया जाता है जैसे उन्होंने ओलंपिक गोल्ड जीता हो। जिले का “गौरव” बढ़ गया – लेकिन सच में क्या बढ़ा? सिर्फ एक व्यक्ति की नौकरी मिली, समाज का क्या फायदा?
यूट्यूब पर सफल उम्मीदवार बड़े-बड़े आदर्शवादी भाषण देते हैं – “देश सेवा”, “गरीबों की मदद” – लेकिन ज्यादातर बाद में आधुनिक जागीरदार बन जाते हैं। बहुत कम ऐसे अधिकारी मिलते हैं जिनका ऑफिस गरीबों के लिए खुला रहता हो या जिनमें असली संवेदना दिखती हो।अगर सिर्फ देश सेवा होती, तो करोड़ों का पैकेज छोड़कर 70-80 हजार की सैलरी क्यों?IAS की शुरुआती बेसिक सैलरी ₹56,100 है (ग्रॉस ₹80,000-1 लाख तक allowances के साथ), जो कैबिनेट सेक्रेटरी स्तर पर ₹2.5 लाख तक जाती है। लेकिन प्राइवेट सेक्टर में टॉप टैलेंट को कई गुना ज्यादा मिलता है। फिर भी लाखों क्यों भागते हैं?क्योंकि असली आकर्षण सत्ता, प्रतिष्ठा और विशेषाधिकार है, न कि सैलरी।देश को क्या नुकसान हो रहा है?बेहतरीन डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक अपनी विशेषज्ञता छोड़कर प्रशासन में चले जाते हैं → देश को अच्छे प्रोफेशनल कम मिलते हैं।
प्रतिभा सत्ता की दौड़ में फंस जाती है।
सिस्टम में पावर और पोस्टिंग की राजनीति बढ़ती है।
युवा पीढ़ी की क्रिएटिविटी और इनोवेशन बर्बाद होती है।
राजशाही मानसिकता को खत्म करने की जरूरत:
यह व्यवस्था कहीं न कहीं पुरानी राजशाही मानसिकता को जिंदा रखे हुए है। जब तक लाल बत्ती, VIP कल्चर, असीमित ठाठ-बाट और विशेषाधिकार खत्म नहीं होंगे, तब तक सिविल सर्विस देश सेवा से ज्यादा सत्ता और प्रिविलेज का प्रतीक बनी रहेगी।देश को चाहिए जवाबदेह प्रशासन, न कि राजशाही वाली नौकरशाही।
युवाओं से अपील: अपनी प्रतिभा को सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित मत रखो। देश सेवा के कई रास्ते हैं – प्राइवेट, स्टार्टअप, सोशल वर्क, रिसर्च। असली सेवा वही है जो समाज को आगे बढ़ाए, न कि सिर्फ कुर्सी पर बैठकर भौकाल जमाए।
सोचिए… क्या वाकई यही रास्ता सही है?