38 वर्ष की उम्र में अरिजीत सिंह का बड़ा फैसला: शोहरत, दौलत से ऊपर है मानसिक शांति

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38 वर्ष की उम्र में अरिजीत सिंह का बड़ा फैसला: शोहरत, दौलत से ऊपर है मानसिक शांति

कीर्ति कापसे की रिपोर्ट 

“जब मुझे लगेगा कि अब जीवन में करने को कुछ शेष नहीं रहा, तब मैं सब कुछ छोड़कर ऐसी जगह चला जाऊँगा जहाँ मन को शांति मिले।”

यह विचार हैं देश के सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक अरिजीत सिंह के।

हाल ही में अरिजीत सिंह ने पार्श्वगायन के क्षेत्र से निवृत्ति की घोषणा कर सभी को चौंका दिया है। महज़ 38 वर्ष की उम्र, करियर अपने शिखर पर और नाम संगीत जगत के सबसे सफल गायकों में शुमार इसके बावजूद लिया गया यह निर्णय कई सवाल खड़े करता है।

कठोर परिश्रम के दम पर सफलता की ऊँचाइयों तक पहुँचे अरिजीत सिंह एक गीत के लिए लगभग 10 लाख रुपये फीस लेते हैं, जबकि दो घंटे के कॉन्सर्ट से उनकी कमाई 8 से 10 करोड़ रुपये तक बताई जाती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार उनकी कुल संपत्ति करीब 414 करोड़ रुपये है।

इतनी सफलता और समृद्धि के बावजूद “सब कुछ छोड़कर एक शांत जगह पर जाकर बैठ जाने” का विचार आम लोगों को हैरान कर सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आज के तेज़ रफ्तार और प्रतिस्पर्धात्मक युग की सच्चाई को उजागर करता है।

पार्श्वगायन, भले ही ग्लैमर से भरा दिखता हो, लेकिन यह भी एक तरह से दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार काम करने की मजबूरी है, जहाँ रचनात्मक स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। यही स्थिति आज आम इंसान के जीवन की भी बन चुकी है

रोज़ का ट्रैफिक, टारगेट का दबाव, बॉस का मूड, ऑफिस की राजनीति और भविष्य को लेकर लगातार बनी रहने वाली अनिश्चितता।

छह दिन मन मारकर जीना और वीकेंड को ही ‘एन्जॉयमेंट’ मान लेना, फिर सोमवार से वही घुटन इसे ही आज का सामान्य जीवन मान लिया गया है। जानकारों के अनुसार यह जीवन नहीं, बल्कि धीरे-धीरे खुद से समझौता करने की आदत है।

सूत्रों के मुताबिक, यह फैसला लेने से पहले अरिजीत सिंह करीब सात महीने पहले उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर पहुँचे थे, जहाँ उन्होंने भगवान महादेव के चरणों में समय बिताया। माना जा रहा है कि वहीं उन्होंने अपने जीवन को लेकर गहन आत्ममंथन किया।

अरिजीत सिंह का यह कदम एक संदेश भी है कि जीवन का अर्थ केवल पैसा और प्रसिद्धि नहीं, बल्कि अपना समय, आत्मसम्मान और अपने फैसलों की आज़ादी है।

बाकी सब केवल जीवन को खींचते चले जाने जैसा है।

आज जब मानसिक शांति सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है, अरिजीत सिंह का यह निर्णय समाज को सोचने पर मजबूर करता है क्या हम सच में जी रहे हैं?

यह अंतिम पंक्ति दरअसल समाज से एक सवाल पूछती है

हम में से कितने लोग अपने सपनों, इच्छाओं और मानसिक शांति के साथ जीवन जी रहे हैं,

और कितने लोग सिर्फ नौकरी, जिम्मेदारियों, सामाजिक दबाव और भविष्य के डर के कारण

ज़िंदा रहने की रस्म निभा रहे हैं?

अरिजीत सिंह का फैसला इसी अंतर को उजागर करता है—

कि जब जीवन केवल बोझ बन जाए, तो रुककर यह पूछना ज़रूरी है:

“मैं जी रहा हूँ या बस सह रहा हूँ?”