
Bihar Economic Survey Alert : कुत्ता काटने के रोज 776 केस, साल में 2.8 लाख से ज्यादा पीड़ित
Patna: बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने राज्य की आर्थिक विषमताओं के साथ-साथ एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की ओर भी ध्यान खींचा है। सर्वेक्षण के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान राज्य में कुत्ता काटने की घटनाएं सबसे अधिक रिपोर्ट की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या बनकर उभरी हैं। आंकड़ों के मुताबिक इस अवधि में हर दिन औसतन 776 लोग कुत्तों के काटने का शिकार बने, जो स्वास्थ्य व्यवस्था और शहरी-ग्रामीण प्रबंधन दोनों के लिए बड़ी चुनौती है।
● कुत्ता काटना बना सबसे ‘प्रचलित रोग’
आर्थिक सर्वेक्षण में कुत्ता काटने की घटनाओं को राज्य में सबसे अधिक दर्ज की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या बताया गया है। इसे अब पारंपरिक बीमारियों की तरह स्वास्थ्य आंकड़ों में दर्ज किया जा रहा है, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। वर्ष 2024-25 में दर्ज मामलों के आधार पर अनुमान है कि साल भर में करीब 2.8 लाख से अधिक लोग कुत्ता काटने से प्रभावित हुए।
● ARI और इन्फ्लुएंज़ा दूसरे स्थान पर
सर्वेक्षण के अनुसार कुत्ता काटने के बाद एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन और इन्फ्लुएंज़ा जैसी बीमारियां दूसरे स्थान पर रहीं। वित्तीय वर्ष 2024-25 में राज्य में 31,025 ARI और इन्फ्लुएंज़ा जैसे मामलों की पुष्टि हुई। यह आंकड़ा बताता है कि श्वसन संबंधी बीमारियां अब भी एक बड़ी समस्या हैं, लेकिन रिपोर्टिंग के लिहाज से कुत्ता काटने की घटनाएं उनसे कहीं आगे निकल चुकी हैं।

● सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बढ़ता दबाव
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कुत्ता काटने की बढ़ती घटनाएं केवल आकस्मिक चोट का मामला नहीं हैं, बल्कि रैबीज जैसी जानलेवा बीमारी के जोखिम को भी बढ़ाती हैं। बड़ी संख्या में मामलों के कारण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों पर एंटी-रैबीज वैक्सीन, टिटनेस इंजेक्शन और इम्युनोग्लोबुलिन की मांग लगातार बनी रहती है।
● आर्थिक विषमता का स्वास्थ्य पर असर
आर्थिक सर्वेक्षण ने जिलों के बीच विकास और आय में गहरी असमानताओं की ओर भी इशारा किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जिन जिलों में नगरीयकरण, कचरा प्रबंधन और पशु नियंत्रण की व्यवस्था कमजोर है, वहां कुत्ता काटने की घटनाएं अपेक्षाकृत अधिक सामने आती हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की असमान उपलब्धता के कारण इलाज और रोकथाम में भी अंतर दिखता है।
● बढ़ती घटनाओं के संभावित कारण
सर्वेक्षण और स्वास्थ्य आंकड़ों के विश्लेषण से संकेत मिलता है कि कुत्ता काटने की बढ़ती घटनाओं के पीछे आवारा कुत्तों की संख्या में वृद्धि, पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रमों की सीमित पहुंच, टीकाकरण की अपर्याप्त कवरेज और जन-जागरूकता की कमी जैसे कारण प्रमुख हैं।

● रोकथाम के लिए नीति हस्तक्षेप की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या से निपटने के लिए आवारा कुत्तों के टीकाकरण और नसबंदी कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करना, शहरी और ग्रामीण निकायों की जिम्मेदारी तय करना, तथा स्वास्थ्य संस्थानों में आवश्यक दवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही, आम लोगों में समय पर उपचार और सावधानियों को लेकर जागरूकता बढ़ाने की भी आवश्यकता है।
कुल मिलाकर, बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कुत्ता काटने की घटनाएं अब केवल एक स्थानीय समस्या नहीं रहीं, बल्कि राज्य स्तर पर एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में सामने आ चुकी हैं।





