BOOK:तुम मेरी डायरी के आखिरी पन्ना थे, तुम ना होते तो कहानी खत्म न होती!

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BOOK: संजय सक्सेना की किताब ‘डायरी का आखिरी पन्ना’...

तुम मेरी डायरी के आखिरी पन्ना थे, तुम ना होते तो कहानी खत्म न होती!

~ प्रकाश हिन्दुस्तानी
फ़ोटो के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है.
आमुख पर ही लिखा है कि तुम मेरी डायरी के आखिरी पन्ना थे, तुम ना होते तो कहानी खत्म न होती!
संजय सक्सेना की किताब ‘डायरी का आखिरी पन्ना’ बिना किसी भारी-भरकम दर्शन या जटिल भाषा के रोज़मर्रा की ज़िंदगी के गहरे सच को छू लेती है। यह किताब एक पारिवारिक सदस्य की तरह लगती है – सहज, ईमानदार, मुस्कुराहट के साथ संदेश देने वाली, लेकिन दिल को गहराई से छूने वाली। जैसे गुठली की यात्रा में जीवन का फलसफा !
संजय सक्सेना ने छोटे-छोटे किस्सों को इतनी सरलता और भावनात्मक आत्मीयता से बुना है कि पढ़ते हुए बार-बार लगता है – अरे, ये तो मेरी ही कहानी है! परिवार में बुजुर्गों का लाड़-प्यार, लोकाचार का बोझ, बलात थोपे गए संस्कार, अपनी जगह की तलाश जैसे विषय, जिन्हें हम महसूस तो बहुत तेज़ करते हैं, लेकिन शब्दों में बयां नहीं कर पाते, उन्हें संजय सक्सेना ने डायरी के भाव में प्रवाह से व्यक्त किया है!
संजय सक्सेना का आब्जर्वेशन, समझ, संवेदनशीलता और बौद्धिक विमर्श के साथ चुटीलापन मन को छू लेता है। बारीकी से देखते हैं, सफाई से , बचते हुए लिखते हैं और घुमाकर गोफन का ढेला छोड़ देते हैं।
मैं उनकी कई बातों से सौ फ़ीसदी इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ जैसे कुछ सड़क छाप दोस्त भी होने चाहिए, अपनी ख़ामोशी से भी मिलना चाहिए और कुछ सवाल पूछने से बचना चाहिए क्योंकि वे आपको जलील करवा सकते हैं। उनका मानना है कि सेवा निवृत्ति लीज़ डीड का ट्रांसफर होता है!
संजय लिखते हैं – होटल से निकलने लगा तभी लगा कि कोई सामान तो नहीं छूट गया। लॉन में बैठे भाल साहब ने कहा – चेक कर लो, कहीं आपकी तनहाइयां तो नहीं छूट गई?
एक और जगह लिखा है – रविवार को कुछ मित्रों को फोन ज़रूर करता हूँ। जो मिल जाते हैं, उनसे घंटों बातचीत हो जाती है और जो नहीं मिलते उनकी गैर हाजिरी में दूसरे दोस्तों से उनकी बुराई करके मन को शांति मिल जाती है।
किताब की भाषा स्पष्ट और दिल को छूने वाली है। कोई बनावटी अलंकार नहीं, बस सच्चाई और संवेदना। कुछ खास किस्से, ‘झुर्रियों से संवाद’, ‘एक चुटकी तसल्ली की कीमत’ आदि बार-बार पढ़ने का मन करता है।
मेरे छोटे भाई सूरमा भोपाली के बारे में लिखा है लफ़्ज़ों के आरिफ हैं हमारे मिर्ज़ा !
इस किताब के प्रकाशक भी लोक प्रकाशन, भोपाल हैं। संजय सक्सेना की किताब डायरी का मुड़ा हुआ पन्ना भी उन्होंने ही छापी थी (और शायद अगली किताब एक नई डायरी के प्रकाशक भी वही होंगे!)
यह भी उन्होंने पिता महेश्वर दयाल सक्सेना तथा परिवार को समर्पित की है।
~ प्रकाश हिन्दुस्तानी
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