अभी आयकर में काफी काम बाकी है

अभी आयकर में काफी काम बाकी है

मीडियावाला.इन।

आयकर के मामले में सरकार की ताज़ा घोषणा देश के आयकरदाताओं को कुछ राहत जरुर पहुंचाएगी। अब आयकरदाताओं को अपना सारा हिसाब-किताब, शिकायत और कहा-सुनी—सब कुछ इंटरनेट पर करना होगा। दूसरे शब्दों में किसी खास अफसर को पटाने-मनाने की जरुरत नहीं पड़ेगी। जब अफसर का नाम ही पता नहीं होगा तो कोई करदाता किसे पटाएगा? दूसरे शब्दों में देश के आयकर विभाग में होने वाले भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी लेकिन यहां एक आशंका है कि जो भी अफसर जिसका भी हिसाब देखेगा, उसे उसका नाम-पता तो मालूम होगा। वह उससे संपर्क क्यों नहीं करेगा? जिसे रिश्वत खानी है, वह अपने मुद्दई को ढूंढने में जमीन-आसमान एक कर देगा। आयकर विभाग में भुगतान संबंधी जितने विवाद हर साल आते हैं, शायद अन्य किसी विभाग में नहीं आते होंगे।

2013-14 में आयकर संबंधी 4 लाख विवाद थे और अब 2018-19 में उनकी संख्या 8 लाख हो गई है। यह संख्या दिनोंदिन बढ़ती जाएगी, क्योंकि टैक्स के घेरे में लोगों की संख्या बढ़ रही है। संख्या के बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यह है कि आजकल डिजिटल (यांत्रिक) लेन-देन बढ़ गया है। उसे छिपाना मुश्किल होता है लेकिन फिर भी भारत में आयकरदाताओं की संख्या मुश्किल से एक प्रतिशत है। देश के 140 करोड़ लोगों में मुश्किल से डेढ़ करोड़ लोग टैक्स भरते हैं। फौजी और सरकारी कर्मचारियों को छूट मिल जाए तो यह संख्या एक करोड़ से भी नीचे चली जाएगी जबकि भारत में कम से कम 10 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनकी आमदनी पर वे टैक्स देने लायक हैं। लाखों ऐसे व्यापारिक संस्थान हैं, जो टैक्स नहीं देते। देश के करोड़ों लोगों को यही पता नहीं कि टैक्स के फार्म कैसे भरें। सरकार को चाहिए कि भारतीय भाषाओं में लोगों को टैक्स भरने के नियम और शैली समझाए। यदि उसकी प्रक्रिया संक्षिप्त और सरल होगी तो लोग आगे होकर टैक्स भरेंगे। यदि सरकार टैक्स थोड़ा घटा दे तो करदाताओं की संख्या बढ़ सकती है। उससे सरकार की आय भी बढ़ेगी।

सरकार को यह भी विचार करना चाहिए कि वह क्या खर्च पर भी टैक्स लगा सकती है ताकि देश में से फिजूलखर्ची खत्म हो और उपभोक्तावादी पश्चिमी प्रवृत्ति पर रोक लग सके। सरकार को खुद के खर्चों पर भी रोक लगाने के लिए कुछ साहसिक कदम उठाने होंगे। नेताओं और अफसरों पर रोजाना खर्च होनेवाले करोड़ों रु. की बचत आसानी से हो सकती है। अरबों रु. की इस बचत के दो फायदे होंगे। एक तो लोगों पर टैक्स कम थोपने होंगे और दूसरा, लोक-कल्याण के काम बड़े पैमाने पर हो सकेंगे।

RB

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डॉ. वेदप्रताप वैदिक

  • डॉ॰ वेद प्रताप वैदिक (जन्म: 30 दिसम्बर 1944, इंदौर, मध्य प्रदेश) भारतवर्ष के वरिष्ठ पत्रकार, राजनैतिक विश्लेषक, पटु वक्ता एवं हिन्दी प्रेमी हैं। हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने की दिशा में सदा प्रयत्नशील रहते हैं। भाषा के सवाल पर स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और डॉ॰ राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है।
  • वैदिक जी अनेक भारतीय व विदेशी शोध-संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में ‘विजिटिंग प्रोफेसर’ रहे हैं। भारतीय विदेश नीति के चिन्तन और संचालन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय है। अपने पूरे जीवन काल में उन्होंने लगभग 80 देशों की यात्रायें की हैं।
  • अंग्रेजी पत्रकारिता के मुकाबले हिन्दी में बेहतर पत्रकारिता का युग आरम्भ करने वालों में डॉ॰ वैदिक का नाम अग्रणी है। उन्होंने सन् 1958 से ही पत्रकारिता प्रारम्भ कर दी थी। नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक, बाद में विचार विभाग के सम्पादक भी रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। सम्प्रति भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष तथा नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।