हो कहीं भी, लेेकिन आग जलनी चाहिए

हो कहीं भी, लेेकिन आग जलनी चाहिए

मुर्दा जिस्म सिर्फ श्मशानों के काम आते हैं। जिंदा कौमें अपनी बारी का इंतजार नहीं करती। वह लडऩा जानती है। हार-जीत का सवाल तो कभी रहा ही नहीं।  सवाल अपनी बात रखने और उसके लिए जान लड़ा देने का है। लोकतंत्र वहीं हैं, जहां सरकारों की हर हरकत पर करोड़ों निगाहें गड़ी हों। फैसले सिर्फ संसद में लिए, सुनाए और थोपे न जाएं। लोकतंत्र के मंदिर में कोई घंटी बजे तो देश के चप्पे-चप्पे पर उसकी गूंज सुनाई दे। 

इसे देश का दुर्भाग्य कहें या हमारी नियती, सरकारों की नजरें हमेशा से ही वोट बैंक पर रही है। इसके लिए किसी ने संविधान को पर्स में रख लिया था तो कोई कानून को कठपुतली की तरह नचाता रहा है। मशीनरी के दुरुपयोग के किस्से तो मानव इतिहास से भी लंबे हो चले हैं। इसलिए सरकारों की मंशा किसी भी नजरिये से हमारी चर्चा का विषय होने के लायक भी नहीं रही। हम सारी सरकारों को देख चुके हैं, आजमा चुके हैं। सरकारों के रंग-ढंग वोट पिपासु गिद्धों से इतर बिलकुल नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि गिद्ध ताकत से झपट्टा मारता है और भीरु सियासत पीछे से वार करती है। 

इसलिए वह हर बार पलट जाती है। कभी गरीबी हटाने का नारा देती है तो कभी कहती है कि रुपए में से 85 पैसे तो बीच में ही लोग लूट लेते हैं। समान नागरिक संहिता, धारा 370 से लेकर ऐसे तमाम मसले हैं, जिसमें नेता डमरू की तरह दोनों तरफ से बजते रहे हैं। आज कुछ कहते हैं और कल कोई और ही राग अलापने लगते हैं। हवा से भी तेजी से पलटते हैं और पानी से भी अधिक गति से फिसल पड़ते हैं। तारीख उठाकर देख लीजिए। कितनी बार जनता के मुद्दों पर सार्थक बहस हुई होगी। न्यूज चैनल्स पर रोज नेता एंकर के साथ चीखते-चिल्लाते हैं, लेकिन उन बहसों से कोई दिशा कभी निकलती दिखाई दी क्या। शाम की चाय को गर्म करने के अलावा उसने किया ही क्या है। 

और जब मुद्दों पर बहस नहीं होगी तो यही तो होगा ना। भीमा कोरेगांव और सपाक्स के प्रदर्शन इसी अबोलेपन और नपुंसक राजनीति की देन है, जो चुप बैठकर सिर्फ लोगों को लड़ाना चाहती है। वरना जब बिहार में कोई आरक्षण पर टिप्पणी करता है तो क्यों सब मुंह बंद कर लेते हैं। हार के डर से बात पलट देते हैं। अगर माद्दा और हौसला है तो क्यों नहीं एक बार खुलकर आरक्षण पर बहस कर ली जाए। पूरा देश मंडल कमीशन के बाद से ही इस मसले को लेकर झुलस रहा है। कब तक इस आक्रोश को तहों के नीचे दबाकर रखने की कोशिश करते रहेंगे। 

सारे विशेषाधिकारों पर एक बार गंभीरता से बात क्यों नहीं करते। सारे पक्ष बैठ जाएं, बात करें, सर्व सहमति से कोई हल निकालने की कोशिश करें। यह देश किसी एक व्यक्ति, जाति, पंथ और व्यवस्था का नहीं है। हमने संविधान में हम भारत के लोग के साथ ही किसी भी तरह के भेदभाव को सिरे से खारिज करने की सौंगध उठाई है। फिर क्यों उस पर बात करने से बच रहे हैं, सिर्फ इसलिए ना कि लोगों के बीच की वैमनस्यता, आंतरिक गतिरोध आपको राजनीतिक रोटियां सेंकने का मौका देती है। जब तक ये गतिरोध है, तब तक घोषणाएं हैं, भाषण हैं, सभा, रैली और कुर्सियां हैं। 

लेकिन नहीं आप तो बस बचना चाहते हैं। सवालों को सियासत की देहरी पर मिर्च-नीबू की तरह टांग कर रखना चाहते हैं, जो नजर से बचाए और जिस दिन सूख जाएं उसी दिन उतारकर फेंक दिए जाएं। नए की जगह बना ली जाए। इसलिए तो ये खेल किए जाते रहे हैं। शाहबानो प्रकरण में कोर्ट ने व्यवस्था बनाने की कोशिश की तो कानून बदल दिया गया, वही इस बार एट्रोसिटी एक्ट के साथ हो रहा है। सत्ता कब तक धृतराष्ट्र की तरह इन सवालों से मुंह मोड़ कर बैठी रहेगी। 

दीवार की ओर मुंह कर बैठी सत्ता का ही नतीजा है कि देश में कोई खुश नजर नहीं आता। मुस्लमानों को लगता है हमारे साथ न्याय नहीं हुआ, उन्हें मिल रही सुविधाओं पर दूसरे रश्क करते हैं। आदिवासी अब भी हक और इंसाफ के लिए लड़ रहा है, जरूरतमंद उसी हाल में है। और बाकी आवाम वह खुद को वंचित ही समझ रहा है। जब सब वंचित, शोषित और दमित हैं तो सत्ता आखिर इतने सालों तक करती क्या रही है। 

इस हालत की सबसे बड़ी वजह यही है कि हम सत्ता आश्रित हो गए थे। वह मनमाने फैसले लेती और हम चाय की दुकानों पर भड़ास निकालकर ही चुप बैठ जाते। सह लेते। अब लोग सडक़ों पर निकलने लगे हैं। यह आग ही लोकतंत्र की ताकत है। सब अपने-अपने पक्ष लेकर आएं, बहस करें, तर्क भिड़ाएं और निकाल लाए वह हल जो इस देश को नई दिशा में लेकर जाए। 

बहुत जरूरी है, बाहर निकलना और अपनी बात रखना। क्योंकि सवाल इस बात का नहीं है कि क्या सही है और क्या गलत है। सवाल इस बात का है कि सही-गलत का फैसला करने का हक किसे है और वह इसका कैसे इस्तेमाल कर रहा है। हमें बताना ही होगा कि हम उसका कैसा इस्तेमाल चाहते हैं। आखिर लोकतंत्र है भाई। इसलिए बहुत जरूरी है कि हर गली, हर मोहल्ले सेे आवाज उठे, हर घर से आवाज उठे और इतनी तेज आवाज उठे की सरकारों की नाक में दम हो जाए। यह आग बहुत कीमती है, जलना ही चाहिए। 
 

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अमित मंडलोई

Studied B.Sc. BJ MA LLM Dlit (H), 18 years in Journalism. Working on all media platform TV, WEB and print. 

In Patrika this is third edition earlier looking after Ujjain and Gwalior as editor. Now in Indore as Zonal editor.