दलितों में ‘दलित’ कहलाने की छटपटाहट इसलिए है भाई !

दलितों में ‘दलित’ कहलाने की छटपटाहट इसलिए है भाई !

मीडियावाला.इन। दलित शब्द और दलित वोट लगता है मोदी सरकार के गले की हड्डी बनता जा रहा है। स्वयं मोदी और राज्यों में भाजपा की सरकारें जितना ज्यादा दलित प्रेम दिखा रही हैं, पांसे उतने ही उलटे पड़ते दिख रहे हैं। सरकारें बिछी जा रही हैं, लेकिन जाजम उखड़ती जा रही है। यानी  मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की। ताजा बवाल केन्द्र सरकार के उस आदेश पर मचा है, जिसमें सरकारी कामकाज, निजी टीवी चैनलों और अखबारों से कहा गया है कि वे दलित शब्द के इस्तेमाल से परहेज करें। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी ‘एडवायजरी’ में कहा गया है कि ‘मीडिया शिड्यूल्ड कास्ट ( अनुसूचित जाति) से जुड़े लोगों का जिक्र करते वक्त ‘दलित’ शब्द के उपयोग से बचे। ऐसी ही एडवायजरी प्रेस कौंसिल भी जारी करने की सोच रही है। बताया जाता है कि सरकार ने यह आदेश बाॅम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के निर्देशों के के तहत जारी किया। सरकार का कहना है ‍िक चूंकि संविधान में अनुसूचित जाति का ही उल्लेख है, इसलिए ऐसी जातियों को ‘दलित’ कहना ठीक नही होगा। सरकार के इस आदेश से खुद सत्तारूढ़ भाजपा और सहयोगी दलों के दलित सांसद मंत्री नाराज हैं। उनका मानना है कि ‘दलित’ शब्द चलन से बाहर करना दलितों की पहचान मिटाने की सोची-समझी चाल है। आज जब दलित खुद को दलित कहलवाकर आत्मविश्वास से भरा महसूस करते हैं तो फिर सरकार को इसे भाषा से बेदखल करने की क्यों पड़ी है? 

सही है कि हिंदू धर्म की चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में दलित जैसा कोई शब्द पहले नहीं था। चौथा और सबसे निचला वर्ण शूद्र था, लेकिन शूद्र की परिभाषा भी बहुत व्यापक है। दिलीप मंडल जैसे स्थापित पत्रकारो का तर्क है कि दलित संबोधन उन जातियों के ‍िलए रहा है, जो अस्पृश्य या अछूत समझी जाती रही हैं। वे इसे पंचम जाति भी कहते हैं। ये वो जातियां हैं, जिनके जिम्मे समाज के ऐसे काम रहे हैं, जिनसे बा‍की जातियां चार हाथ दूर रहती थीं। तेरहवीं सदी में संत ज्ञानेश्वर ने समाज के ऐसे दबे कुचले तबके के लिए ज्ञानेश्वरी में ‘दुरित’ शब्द का प्रयोग किया है। माना जा सकता है कि यही बदले रूप में दलित हुआ। आधुनिक समय में महात्मा ज्योतिबा फुले समाज के इस वर्ग के लिए ‘अति शूद्र’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं। बाबा साहब आम्बेडकर ने इन जातियों के लिए ‘डिप्रेस्ड क्लासेस’ शब्द का प्रयोग करते हैं। गांधीजी ने अछूत समझी जाने वाली जातियों को ‘हरिजन’ कहा था, हालांकि इसे दलितों ने ही खारिज कर ‍िदया। लेकिन दलित शब्द को गरिमा, संघर्षशीलता और लोकप्रियता सत्तर के दशक में महाराष्ट्र में उभरे दलित पैंथर आंदोलन ने प्रदान की। कह सकते हैं कि इसके पहले जितनी भी संज्ञाएं अस्पृश्य जातियों के ‍िलए इस्तेमाल की गईं वो तकनीकी और भावविहीन थीं। समाज की दबी कुचली जातियों को ‘दलित’ शब्द में  वो भाव और आत्मा नजर आई, जिसकी शायद उन्हें सदियों से तलाश थी। क्योंकि दलित शब्द में सम्बन्धित जातियों के सामाजिक दलन, शोषण और तिरस्कार का निचोड़ समाहित है। साथ ही इस ( थोपी गई) अवस्था से स्थायी मुक्ति की चाहत भी इसी शब्द समाई हुई है। कई दलित चिंतकों का मानना है कि दलित होना एक आंदोलनात्मक स्थिति है। जबकि अनुसूचित जाति महज एक प्रशासनिक शब्द है, बल्कि यह कुछ जातियों के समुच्चय का सूचक भर है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि आदिवासियों के लिए संविधान में  अनुसूचित जनजाति शब्द का  है। लेकिन आदिवासियों ने स्वयं को हमेशा आदिवासी कहलाना ही पसंद किया। क्योंकि यह शब्द उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक तथा  ऐतिहासिक पहचान, आस्थाअों और परंपराअों को भी पूरी ताकत से प्रतिबिम्बित करता है।  

बहरहाल सरकार ने जो आदेश जारी किया वह एक प्रशासनिक आदेश है। जिसका मंतव्य ‘यथास्थिति’ बनाए रखना है। उसमें बदलाव का कोई आग्रह नहीं है और न ही ऐसी कोई चाहत है। इसीलिए मोदी सरकार में मंत्री और आरपीआई नेता रामदास आठवले ने सरकार के आदेश से आदेश से असहमति जताते हुए कहा कि जब दलित शब्द के उपयोग पर दलितों को ही कोई आपत्ति नहीं है तो सरकार को क्यों है?  उनका तर्क है कि ‘दलित’ शब्द के दायरे में केवल अनुसूचित जातियां ही नहीं हैं, वे जातियां भी हैं जो सामाजिक अौर आर्थिक रूप से पिछड़ी हैं। इसी तरह बीजेपी सांसद उदित राज का मानना  है कि 'दलित' एक ऐसा शब्द है जिससे समाज और राजनीति दोनों जुड़े हैं। यह शब्द दलितों को उनकी स्थिति के बारे में याद दिलाता है। उन्हें लड़ने के लिए प्रेरित करता है।' उदित राज के मुताबिक यह आदेश एक सलाह के रूप में भले ठीक हो, लेकिन इसे जबरन लागू नहीं कराया जा सकता।

अब सवाल यह है ‍कि क्या इस ‘परामर्श’ को सख्‍ती से लागू कराया जाना चाहिए? सरकारी कामकाज में यह लागू हो भी जाए तो भी ‍निजी चैनलों और अखबारों में इसे कैसे लागू कराया जा सकता है? खासकर तब कि जब स्वयं दलित समाज इस परामर्श के खिलाफ हो और खुद सरकारें ‘दलितों’ को दलित कहकर रात-दिन रिझाने  में लगी हों। ऐसे में सरकारी तंत्र और सरकार की मंशा में फर्क उजागर नहीं होगा? क्या जनता इतनी मूर्ख है कि इस शोशेबाजी को समझ नहीं पाएगी? यूं भी सरकार ( चाहे किसी पार्टी की हो) वोटों के लिए दलितों को ही पटाती हैं न ‍िक अनुसूचित जातियों को। मोदी सरकार के आदेश का मंतव्य समझें तो सरकार राजनीतिक रूप से दलितों को रिझाएगी और प्रशासनिक दृष्टि से अनुसूचित जातियों का भला करेगी। दरअसल यह अपने आप में हास्यास्पद स्थिति है। ठीक है कि संविधान में दलित शब्द का प्रयोग नहीं है। लेकिन निर्जीव संज्ञा और जीवंत पहचान में जमीन-आसमान का फर्क होता है। मोदी सरकार के ताजा आदेश से संदेश यह जा रहा है कि यह  सरकार दलितों को अपना तो मान नहीं ही रही है, उनकी पहचान को भी एक बेजान लफ्‍ज से घिस देना चाहती है। हो सकता है कि सरकार की वैसी मंशा न हो, लेकिन राजनीति में सदिच्छा से ज्यादा अहम संदेश होता है। दलितों में मुक्ति की छटपटाहट आजादी के बाद से ही है, लेकिन बीते चार सालों में वह ज्यादा तल्ख रूप में सामने आ रही है। ये तल्खी और अविश्वास बाबा साहब आंबेडकर का लंदन स्थित घर खरीदने, उनकी प्रतिमाएं लगाने, समरसता का रात दिन जाप करने और दलितों को हिंदू समाज का अभिन्न अंग बताने के बाद भी कम नहीं हो रही है। उन्हें ऐसा क्यों महसूस हो रहा है कि दिखाया जा रहा दलित प्रेम दलितों का हिंदू समाज में मन से स्वीकार न होकर महज राजनीतिक स्वांग है। आखिर दलितों को दलित चेतना से अलग कर के नहीं देखा जा सकता। अनुसूचित जाति शब्द आधार कार्ड की तरह एक नंबर तो हो सकता है, लेकिन आपकी बायोमीट्रिक पहचान तो अंगूठे की नैसर्गिक  रेखाअों से ही होगी। दलित शब्द को चलन से बाहर करना उन जन्मजात रेखाअोंको ही  मिटाने जैसा है, जिन्हें ईश्वर ने कम समाज के संकुचित और अनुदार सोच ने ज्यादा खींचा है। 
 

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अजय बोकिल

जन्म तिथि : 17/07/1958, इंदौर

शिक्षा : एमएस्सी (वनस्पतिशास्त्र), एम.ए. (हिंदी साहित्य)

पता : ई 18/ 45 बंगले,  नार्थ टी टी नगर भोपाल

मो. 9893699939

अनुभव :

पत्रकारिता का 33 वर्ष का अनुभव। शुरूआत प्रभात किरण’ इंदौर में सह संपादक से। इसके बाद नईदुनिया/नवदुनिया में सह संपादक से एसोसिएट संपादक तक। फिर संपादक प्रदेश टुडे पत्रिका। सम्प्रति : वरिष्ठ संपादक ‘सुबह सवेरे।‘

लेखन : 

लोकप्रिय स्तम्भ लेखन, यथा हस्तक्षेप ( सा. राज्य  की नईदुनिया) बतोलेबाज व टेस्ट काॅर्नर ( नवदुनिया) राइट क्लिक सुबह सवेरे।

शोध कार्य : 

पं. माखनलाल  चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विवि में श्री अरविंद पीठ पर शोध अध्येता के  रूप में कार्य। शोध ग्रंथ ‘श्री अरविंद की संचार अवधारणा’ प्रकाशित।

प्रकाशन : 

कहानी संग्रह ‘पास पडोस’ प्रकाशित। कई रिपोर्ताज व आलेख प्रकाशित। मातृ भाषा मराठी में भी लेखन। दूरदर्शन आकाशवाणी तथा विधानसभा के लिए समीक्षा लेखन।  

पुरस्कार : 

स्व: जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी उत्कृष्ट युवा पुरस्कार, मप्र मराठी साहित्य संघ द्वारा जीवन गौरव पुरस्कार, मप्र मराठी अकादमी द्वारा मराठी प्रतिभा सम्मान व कई और सम्मान।

विदेश यात्रा : 

समकाालीन हिंदी साहित्य सम्मेलन कोलंबो (श्रीलंका)  में सहभागिता। नेपाल व भूटान का भ्रमण।