पुस्तक समीक्षा:विविध अनुभूतियों को लय तान और राग से स्पंदित करती कवि आनंद शर्मा की कविताएँ

पुस्तक समीक्षा:विविध अनुभूतियों को लय तान और राग से स्पंदित करती कवि आनंद शर्मा की कविताएँ

मीडियावाला.इन।  

कविता को परिभाषित करते हुए विद्वानों द्वारा कहा गया है कि "कविता" केवल रसात्मक या कर्णप्रिय अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि कविता वह है जो कानों के माध्यम से हृदय को आंदोलित करे।
जिस भाव की कविता हो उस भाव को जागृत करने में सक्षम हो,पाठक उस भाव के साथ उसको अनुभूत करे .अपनी शीर्षक कविता "कभी ये सोचता हूँ मैं" में कविता की पहुँच का विस्तार करते हुए वे लिखते हैं-
.

कभी ये सोचता हूँ मैं , 

सरल कुछ कर लिया होता ।
बिना उलझे किसी से,
राह अपनी चल लिया  होता।

हाँ लेकिन मनाता हूँ
शख्स वो सब ही पराये थे।
कोई इक कसक थी दिल में
कि वो अपनों से भाये थे ।

इस लम्बी कविता में कवि के दिल की कोई कसक है जिसकी पीड़ा की अनुगूंज अनवरत सुनाई देती रहती है। एक छोटी सी लेकिन प्रभावशील कविता है ‘‘तिलस्म’’ जिसका भावसौंदर्य बहुत  ही  सुन्दर है और कवि के गहन चिंतन को रेखांकित करता है--
कब कैसे कोई बनता है, अपना।
चाहे हों कितनी पथरीली राहें,
चलते-चलते पांव भर आएं,
दूर तक दिखे न कोई ठौर,
लगे कि अब नहीं कोई हमारे साथ,
अचानक थामता है हाथ
अनजाना कोई
डूब करके तिरता है ,सपना।

इस कृति में कवि ने अपनी कविताओं में अत्यंत गहरे किन्तु सहज, सरल और मोहक और विषयानुकूल शब्दों का चयन किया है। सभी कविताओं में एक बेहतरीन प्रवाह है, जो काव्य-पाठ सा आनंद देता है। कई कविताएँ समाज और संस्कृति पर थोड़ा रुककर सोचने की मांग करती हैं और बेहतर मनुष्य बनने की सिफारिश भी करती है|
सामजिक विडम्बना पर प्रहार करती एक कविता है "आजादी"-

सबसे पहले जागती है अल्लसुबह
दौड़ती है भरने पानी
गली के आखिर में 
बनिए की दूकान के सामने लगे नलके से 
लौट कर बनाती है चुन्नू का खाना 
दौड़ कर सजाती है बापू का ठेला  ।
सरपट  निकलती है 
रात की बची रोटी को दबा कर 
इस घर उस घर .
ये घर ,वो घर 

           दूसरे के घरों में काम करके अपने परिवार को पालने वाली स्त्री अर्थात घरेलू सेविकाओं  के जीवन की विडम्बना  इस  कविता में शिद्दत से दिखती है।यह कविता सिद्ध करती कि सिर्फ भोगा हुआ कष्ट या पीड़ा ही नहीं देखा  हुआ दर्द भी कवि को उद्वेलित करता है तभी तो कहा गया है कि कविता अंतर्मन की अग्नि है, कविता ध्यान में उतरी ध्वनि है। कविता किसी संवेदना का उन्मुक्त प्रवाह हो । हो सकता है वो कोई आग हो, कविता गंधर्व की राग हो, हो सकता है बेआवाज हो। कविता की यह परिभाषा आनंद कुमार शर्मा की कविताओं में ध्वनित होती सुनाई देती है .कवि आनंद कुमार शर्मा का प्रथम काव्य संग्रह ‘‘कभी ये सोचता हूं मैं’’ एक ऐसा ही इन परिभाषाओं पर खरा उतरता काव्य संग्रह है, जिसमें कविता के दोनों पक्ष स्पष्ट दिखाई देते हैं। आन्तरिक अर्थात  भाव पक्ष और बाह्य यानि कविता में कही गई बात का प्रभाव। कवि ने इस संग्रह  में इन कविताओं के माध्यम से अपने अंतर्मन की यात्रा को साहित्यिक शब्द देते हुए अपनी बात कही है ।  संग्रह की अधिकांश कविताओं की पृष्ठभूमि में मनुष्य के अंतर्मन की आवाज ध्वनित होती है जो उनके कार्य क्षेत्र के  अनुभवों का प्रभाव भी हो सकता है , जिसमें  प्रकृति का सोंदर्य भी है और मनुष्यता की पीड़ा और उससे उपजे  अवसाद की अनुगूंज  भी  । कई कविताओं में गहन संवेदना के अनेक रंग मिलते हैं जो उनके भावों का वैविध्य दर्शाता है । कवि ने अपनी इस पुस्तक के माध्यम से मानवीय और सामजिक जीवन मूल्यों को पुनर्स्थापित करते हुए मानवीय और सामजिक विसंगतियों के प्रति चिंता व्यक्त की है। उन्होंने अपनी कई कविताओं में कविता के उद्देश्य को उद्घाटित किया है।   इसी कविता में वे आजादी का व्यंजनात्मक पर्याय गढ़ते हुए  आगे कहते हैं कि--
देर शाम आते ही खटती है
घर भर का दर्द छान
आधे में पूरे को
पूरे में आधे को घोलकर
देर रात सबके सोने पर जब सोती है अम्मा
तब मिलती है उसको आजादी।

कविआनन्द कुमार शर्मा भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहे हैं, मध्यप्रदेश शासन के कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करते हुए उनका अनुभव संसार विस्तृत और बहु आयामी है| सेवा निवृति के बाद भी वे वर्तमान में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के ओएसडी का पदभार संभाल रहे हैं। उनकी प्रशासनिक व्यस्तता के बावजूद साहित्य में उनका सतत सक्रिय रहना उनकी संवेदनशीलता का परिणाम है|प्रशासनिक अनुभव एवं साहित्यिक रुझान के परस्पर तालमेल के संबंध में संग्रह का प्राक्कथन लिखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार, चिन्तक डॉ. मोहन गुप्त ने लिखा है कि ‘‘श्री आनंद कुमार शर्मा एक संवेदनशील,  कुशल तथा कर्मठ प्रशासक हैं। जहां संवेदनशीलता है तथा भाषा के प्रति राग और कौशल है,  वहां भावनाओं का अतिरेक होने पर काव्य का स्फुटित होना अवश्यमभावी है। श्री मोहन गुप्त आगे लिखते हैं कि इस पुस्तक में कवि ने युग के अनुरूप प्रगतिशील तेवर अपनाये हैं यह काव्य संग्रह सामान्य पाठकों के लिए अत्यंत आवर्जक और बुद्धि को विश्राम देने वाला है| वे कामना करते हैं कि प्रशासन की सम-विषम पथरीली राहों पर चलते हुए भी कवि की काव्यधारा निरंतर प्रवाहमान रहे

परकाया प्रवेश तो लेखक करते ही हैं, पात्रों के उन भावों को समझने के लिए , किन्तु यहाँ हम  कवि आनंद कुमार शर्मा की परकाया प्रवेश कविता की बात कर रहें है इसमें   उनकी कल्पना अनूठी और अद्भुत है, जिसमें कवि अपनी बेटी में अपनी माँ का स्नेह अनुशासन देखते हैं।
इस कविता की शुरुआत में उनके द्वारा  बहुचर्चित शास्त्रार्थ को सामने रखा गया है जिसमें विद्वान मंडन मिश्र की कथा को आधार रूप में लिया गया है। मंडन मिश्र का शंकराचार्य से शास्त्रार्थ हुआ जिसमें निर्णायक की भूमिका मंडन मिश्र की पत्नी भारती ने निभाई थी । मंडन मिश्र पराजित हो गए। तब भारती ने शंकराचार्य से कहा कि मैं मंडन मिश्र की अर्धांगिनी  हूं और आपने अभी मुझे तो पराजित किया नहीं है| स्त्री विमर्श की यह महत्वपूर्ण रचना है जो  पाठक को मोह लेती है,कहा जा सकता है किदुख-सुख, आचार-विचार, चेतन-अचेतन अवस्था ही नहीं, मुक्तावस्था भी कविता को जन्म देती है. और संवेदना के  कोमल तार  बहुत सुन्दर भाव चेतना को जन्म देते है . परकाया प्रवेश की कुछ पंक्तियों पर बात करें  जैसे-- 

परकाया प्रवेश का सुना ही था कभी ,
जब मंडन मिश्र को हराने की ज़िद लिए,
शंकर को करना पड़ा था,
भारती के सवालों का हल ढूंढने,
राजा अमरुक की मृत देह में।

विश्वास कभी हुआ नहीं,
लगता था सब झूठ है ,
मानव मन की काल्पनिक उड़ान, 
किस्से कहानियों की तरह।
देखा अब खुद
जब बेटी हुई बड़ी
कैसे उसकी देह में उतरती है
उसकी मां और उसकी दादी की आत्मा
एक साथ।

   एक और महत्वपूर्ण कविता है 'ज़िंदा आदमी' जिसमें कवि ज़िंदा आदमी की विशेषताओं का बखान करते हुए यह कहना चाहते हैं कि, केवल साँसें चलना ही ज़िंदा होना नहीं है बल्कि आँखों, बालों, उँगलियों, नाखूनों की चमक, ताजगी, स्वस्थ अनुभूति को महसूस करना भी जिन्दा होने के प्रमाण है .अर्थात मन  का खुश,स्वस्थ और प्रसन्न होना ही सही मायने में ज़िंदा होना है . ज़िंदा होने के बिम्ब आसानी से  आदमी की आँखों ,बालों से लेकर नाखुन तक पर दिखाई देते  है , वे कहते हैं कि---
आपने बालों को हँसते देखा ही कभी?
आँखों को मुस्कुराते?
उँगलियों को बोलते देखा है कभी?
मन की बात बताते
सारी दुनिया जब पूछती है
करती हो क्या प्यार उस दीवाने से?
पैर के नाखूनों को जवाब देते देखा है?

जीवन में स्वस्थ प्रेम एक बड़ा संबल है, सात्विक प्रेम के विस्तृत दायरे को कवि की कविता  भी स्पर्श करती है।यह अनुभूति हमें उनकी कविता "तुमको मैं  क्या दूँ ? " में दिखती है .यह कविता  कवि अपनी शादी की सालगिरह पर लिखते हुए कहते है कि----
तुमको मैं  क्या दूँ ?
सोचता हूँ मैं 
बीते बरस कई ,
तुमसे मिलें हुए ,
अब मुझमें भी तुम हो मैं नहीं ,
तुमको मैं क्या दूँ ?

मनुष्य की चेतना में रची-बसी प्रकृति के सहज सौंदर्य को भी कवि ने अपनी कविताओं में उकेरा है। प्रकृति का स्वस्थ, सुंदर, चमत्कार रहित तटस्थ चित्रांकन कवि के काव्य में हुआ है। एक नैसर्गिक खुलापन, लिए कवि ने प्रकृति के जीवंत चित्रों का सृजन किया है-
धूप भर कर अंजुरी 
दोपहर आती है ,
ठिठक के देखती 
फिर आज भी 
निकला नहीं कोई ,
सिहरती 
थरथराती हवा को 
दे -दे उलाहने .

 

 इस संग्रह की कविताओं के कैनवास पर उभरती जीवनानुभूतियों में विविधता है ,जिसमें  संसार की सुंदरता, प्यार, दुआ के साथ समाज में व्याप्त विषमता और इसकी अनेकानेक विसंगतियों का चित्रण भी समान रूप से अंकित हुआ है| कहीं कहीं कवि अपनी कविता में प्रकृति के विभिन्न रूप रंगों से मनुष्य के मन में जीवन के अनंत रूपों की सृष्टि करता है और इसके साथ मनुष्य का निरंतर एकाकार होता जीवन उसके आत्मिक लोक को नैसर्गिक सौंदर्य से सँवारता है, जैसे "जो तुम चले आओ" कविता में दिखाई देता है| इस संग्रह की कविताओं में संवेदनात्मक धरातल पर जीवन का एक विस्तृत फलक उजागर होता है और काफी जीवंतता से इन कविताओं में   कवि की भावनात्मक अनुभूतियाँ रेखांकित होती हैं। कई जगह पारम्परिक शिल्प को तोड़ती इन कविताओं में नया शिल्प भी गढ़ा गया है| संग्रह में प्रयोगात्मक तरीके से छंदमुक्त कविताओं के साथ ही कुछ अतुकांत,  कुछ नयी कविता और नवगीत के अलावा ग़ज़लनुमा रचनाएं भी शामिल की गई हैं जिसके कारण एक रसता ना होकर अलग अलग विधाओं  का पाठक रसास्वादन करते हैं| जो संग्रह को पठनीय बनाता है। काव्य संग्रह की भाषा सरल, सहज आम बोलचाल की भाषा है। संग्रह की कविताओं में हिंदी के अलावा उर्दू के शब्द भी हैं जो कविताओं को रोचकता और प्रवाह देते हैं।

 अगर सिर्फ चंद शब्दों में इस संग्रह पर कहा जाय कि इन कविता में ऐसा क्या है जो हमें बार-बार आकर्षित करता है? तो कहा जायगा वह है उनका खरापन, उनकी साफ़गोई और  अंदाज़। उनकी इन कविताओं में गूँज और अनुगूँज भी है। कवि की कविताओं की सादगी पाठक बहुत प्रभावित करती है। पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है.

 

 

समीक्षक - डॉ. स्वाति तिवारी
काव्य संग्रह - कभी ये सोचता हूं मैं
कवि - आनन्द कुमार शर्मा
प्रकाशक - सान्निध्य बुक्स, एक्स/3282, गली नं.4, रघुबरपुरा नं.2,
गांधी नगर, नई दिल्ली-110031
मूल्य - 250/-

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डॉ. स्वाति तिवारी

नयी शताब्दी में संवेदना, सोच और शिल्प की बहुआयामिता से उल्लेखनीय रचनात्मक हस्तक्षेप करने वाली महत्वपूर्ण रचनाकार स्वाति तिवारी ने पाठकों व आालोचकों के मध्य पर्याप्त प्रतिष्ठा अर्जित की है। सामाजिक सरोकारों से सक्रिय प्रतिबद्धता, नवीन वैचारिक संरचनाओं के प्रति उत्सुकता और नैतिक निजता की ललक उन्हें विशिष्ट बनाती है।

देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में कहानी, लेख, कविता, व्यंग्य, रिपोर्ताज व आलोचना का प्रकाशन विविध विधाओं की चौदह से अधिक पुस्तकेंे प्रकाशित। विशेषत : उल्लेखनीय : 'सवाल आज भी जिन्दा है,' 'अकेले होते लोग' व 'स्वाति तिवारी की चुनिंदा कहानियां'। भोपाल गैस त्रासदी पर केन्द्रित 'सवाल आज भी जिन्दा है' प्रामाणिक दस्तावेजी लेखन के लिए बहुचर्चित।इस पुस्तक पर पापुलेशन फर्स्ट संस्था द्वारा राष्ट्रिय लाडली मिडिया अवार्ड ,राष्ट्र भाषा प्रचार समिति का वांग्मय सम्मान ,शोधपरक पत्रकारिता सम्मान ,मध्य प्रदेश महिला प्रेसक्लब  द्वारा महिला पत्रकारिता सम्मान प्राप्त .

एक कहानीकार के रूप में सकारात्मक रचनाशीलता के अनेक आयामों की पक्षधर। हंस, नया ज्ञानोदय, लमही, पाखी, परिकथा, बिम्ब, वर्तमान साहित्य इत्यादि में प्रकाशित कहानियां चर्चित व प्रशंसित। 'ब्रह्मकमल - एक प्रेमकथा'उपन्यास वर्ष 2015 मेंज्ञानपीठ  पाठक   सर्वेक्षण में श्रेष्ठ पुस्तकों में पांचवे क्रम पर नामांकित  .मुंबई एवं नाशिक विश्विद्यालय में उपन्यास पर शोध कार्य जारी है .

स्वाति तिवारी मानव अधिकारों की सशक्त पैरोकार, कुशल संगठनकर्ता व प्रभावी वक्ता के रूप में सुपरिचित हैं। अनेक पुस्तकों एवं पत्रिकाओं का सम्पादन। फिल्म निर्माण व निर्देशन में भी निपुण। कलागुरू विष्णु चिंचालकर एवं 'परिवार परामर्श केन्द्र' पर फिल्मों का निर्माण। इंदौर लेखिका संघ' का गठन। 'दिल्ली लेखिका संघ' की सचिव रहीं। अनेक पुरस्कारों व सम्मानों से विभूषित। प्रमुख हैं -भारत सरकार द्वारा चयनित भारत की 100 वुमन अचीवर्स में शामिल ,राष्ट्रपति प्रणव मुकर्जी द्वारा सम्मानित .अंग्रेजी पत्रिका 'संडे इंडियन' द्वारा 21वीं सदी की 111 लेखिकाओं में शामिल, 'अकेले होते लोग' पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, दिल्ली द्वारा राष्ट्रिय सम्मान से सम्मानित व मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा 'वागीश्वरी सम्मान' से अलंकृत।मध्यप्रदेश लेखक संघ के देवकीनंदन युवा पुरस्कार एवं पुष्कर  जोशी सम्मान प्राप्त .जबलपुर की पाथेय संस्था द्वारा सावित्री देवी राष्ट्रिय सम्मान .देश व देशान्तर में हिन्दी भाषा एवं साहित्य की सेवा हेतु प्रतिबद्ध। नौवें विश्व हिन्दी सम्मेलन (2012), दक्षिण अफ्रीका में मध्यप्रदेश शासन का प्रतिनिधित्व। 'हिन्दी रोजगार की भाषा कैसे बने' भाषण वहां प्रशंसित हुआ। विश्व की अनेक देशों की यात्राएं।

विभिन्न रचनाएं अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में अनूदित। अनेक विश्वविद्यालयों में कहानियों पर पीएचडी एवं  शोद्य कार्य हुए । साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका 'दूसरी परम्परा' के सम्पादन में सक्रिय सहयोग।आदिमजाति कल्याण विभाग में सहायक नियोजन अधिकारी .मीडियावाला न्यूस पोरटल में  साहित्य सम्पादक 

सम्प्रतिःमध्यप्रदेश शासन के मुख्यपत्र 'मध्यप्रदेश संदेश' की सहयोगी सम्पादक।

सम्पर्कःEN1/9, चार इमली, भोपाल - 462016 (म.प्र.)


ईमेलःstswatitiwari@gmail.com

मो.ः09424011334,07552421441


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