जिंदगी कैसी है पहेली हाय  कभी तो हँसाए, कभी रुलाए!

जिंदगी कैसी है पहेली हाय कभी तो हँसाए, कभी रुलाए!

मीडियावाला.इन।

 शुद्ध हिंदी में कालजयी गीत रचने वाले योगेश गौड़ ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनका निधन पर हिंदी फिल्मों के गीत रचनाकारों की दुनिया में एक बड़ी क्षति है। योगेश का जन्म नजाकत के शहर लखनऊ में हुआ था। यही कारण है कि उनके गीतों में भी वही नजाकत थी! लेकिन, उर्दू बोलचाल शहर में जन्म लेकर भी उनके गीतों में उर्दू का पुट नहीं था। उन्हें इसलिए भी याद किया जाएगा कि उन्होंने अपने गीतों रचना में हिंदी का ध्यान रखा! जब फिल्मी दुनिया में उर्दू के गीतकारों का बोलबाला था, उन्होंने हिंदी को प्रधानता दी! कभी ध्यान से सुनिए, उनके गीतों में कहीं उर्दू के शब्द नहीं है। जबकि, अधिकांश गीतकार उर्दू के साथ फ़ारसी तक के शब्दों का प्रयोग करने से नहीं हिचकते!
       उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1962 में आई फिल्म 'सखी रॉबिन' की थी। इस फिल्म के लिए उन्होंने 6 गाने लिखे थे। लेकिन, उन्हें पहचान मिली 1971 में आई ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'आनंद' में लिखे गीतों से। 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' और 'जिंदगी कैसी है पहेली हाय' उन्हीं के लिखे गीत हैं जिसने लोकप्रियता का परचम लहराया। आज भी इन गानों को सुना जाता है। उनकी आखिरी बड़ी रिलीज फिल्म थी 'बेवफा सनम' थी।
   योगेश गौर ने एक रात, मिली, छोटी सी बात, आनंद, आजा मेरी जान, मंजिलें और भी हैं, बातों-बातों में, रजनीगंधा, मंजिल, आनंद महल, प्रियतमा, मजाक, दिल्लगी, अपने पराए, किराएदार, हनीमून, चोर और चांद, बेवफा सनम, जीना यहां, लाखों की बात जैसी फिल्मों के गीत लिखे। उनके बारे में कहा जाता है कि 16 साल की उम्र में लखनऊ से मुंबई आए थे। मुंबई में उनके चचेरे भाई एक पटकथा लेखक थे। फिल्म मिली का ‘आए तुम याद मुझे’ छोटी सी बात का ‘न जाने क्यों होता है ये जिंदगी के साथ’, रजनीगंधा का ‘कई बार यूं भी देखा है’ के अलावा ‘रिमझिम गिरे सावन सुलग-सुलग जाए मन’, ‘न बोले तुम न मैंने कुछ कहा’, ‘बड़ी सूनी-सूनी है’, ‘जिंदगी ये जिंदगी’ जैसे कई 70 के दशक की फिल्मों हिट गीत योगेश ने ही लिखे!
   एक ख़ास बात जो योगेश के गीतों में नजर आती है, वो है हिंदी शब्दों  उपयोग। जबकि, हिंदी फ़िल्मी गीतों की दुनिया उर्दू से भरी पड़ी है, पर योगेश के गीतों में उर्दू कहीं सुनाई नहीं देती। विचारों की सादगी की और बहुत ही सीधे और साधारण विचारों को अत्यंत सुन्दर शब्दों में बांधने की योगेश में अद्भुत कला थी। 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' गीत के भाव बहुत साधारण हैं। लगभग पूरे गीत में (एक अंतरे को छोड़कर) गायक, नायक इतना व्यक्त कर रहा है की वह किसी को बेहद याद कर रहा है। परन्तु इस सरल से भाव की सुंदर अभिव्यक्तियाँ हैं 'मेरे ख़यालों के आँगन में कोई सपनों के दीप जलाए!'
   योगेश का समय तब बदला जब वे सबिता बैनर्जी के जरिए संगीतकार सलिल चौधरी से मिले। 1968-69 में उनके लिखे एक-दो गीत सलिल चौधरी ने रचे तो थे, पर वे फ़िल्में पूरी नहीं हुईं। 1970 में सलिल चौधरी ने उन्हें ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'आनंद' में गीत लिखने का मौका दिया। इसके बाद उनके  जीवन की सफलता का दौर शुरू हुआ। इसके बाद सलिल के संगीत निर्देशन में उनका लगातार गीत लिखने का सिलसिला शुरू हुआ।  इस जोड़ी ने 'आनंद' के बाद अन्नदाता, अनोखा दान, मेरे भैया, रजनीगंधा, छोटी सी बात, आनंद महल, मीनू, जीना यहाँ, नानी माँ, रूम नंबर 203, अग्नि परीक्षा फिल्मों में गीत रचे। 1988 में रिलीज हुई फिल्म 'आखिरी बदला इस जोड़ी की अंतिम फिल्म थी। गीतकार के रूप योगेश का संगीतकार सलिल चौधरी के साथ जोड़ी बनना दोनों के लिए स्वर्णिमकाल रहा।
    उनके करियर में ऋषिकेश मुख़र्जी और बासु चटर्जी का योगेश की सफ़लता में ख़ासा योगदान रहा। ऋषिकेश मुखर्जी के साथ इन्होंनें आनंद, मिली, रंग-बिरंगी आदि जैसी फिल्मों के लिए गीत लिखे! जबकि बासु चटर्जी के साथ रजनीगंधा, छोटी सी बात, बातों बातों में, प्रियतमा, दिल्लगी, शौक़ीन, मंज़िल आदि फिल्मों में भी अपनी लेखन क्षमता का परिचय दिया। योगेश के अधिकांश अच्छे गीत इन्हीं दो निर्देशकों की फिल्मों के रहे। योगेश ने लगभग 100 फ़िल्मों करीब 350 गीत लिखे। फ़िल्मी और ग़ैर-फ़िल्मी गीतों के अलावा उन्होंने कई टीवी धारावाहिकों के शीर्षक गीतों व विज्ञापन फिल्मों की तुकान्तक कविताएं भी रची। 

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