कमलनाथ जंबूरी मैदान के मंच से सीएम हाउस के पंडाल तक

कमलनाथ जंबूरी मैदान के मंच से सीएम हाउस के पंडाल तक

मीडियावाला.इन।

दृश्य एक -  वो सत्रह दिसंबर 2018 की गुनगुनी दोपहरी थी, जब भोपाल के बाहर जंबूरी मैदान पर ऊँचा मंच सजा था और उस मंच पर मध्यप्रदेश के सत्ररहवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे 72 वर्पीय कमलनाथ। इस मंच पर देश भर के राजनेता अतिथि के तौर पर इस क्षण का गवाह बनने आये हुये थे जिनमें बहुत खास थे कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए के अनेक नेता। मगर मंच का खास आकर्षण बने थे हरी बिना बांह की जैकेट पहने हुए कांग्रेस के नौजवान नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और इसी मंच पर एक मौका ऐसा आया जब सिंधिया के सामने 'माफ करो महाराज हमारा नेता शिवराज' का नारा देने वाले शिवराज ही आ गये। बस फिर क्या था एक यादगार फोटो बन गया उस दिन का, जिसमें शिवराज के एक तरफ सिंधिया और एक तरफ कमलनाथ खड़े थे और तीनों एक दूसरे का हाथ थामे थे। हमारे देश के लोकतंत्र में संभव है कि अलग अलग विचारधारा वाली पार्टियों से चुनाव मैदान में उतरे लोग बाद में एक साथ बैठकर जनता के हित में सरकारें चलाते हैं। इन तीनों नेताओं की ये तस्वीर बता रही थी अब प्रदेश सरकार सही दिशा में चलेगी क्योंकि सत्ताधारी दल का एक युवा नेता और एक अनुभव से भरे राजनेता के साथ सार्थक विपक्ष की भूमिका वो नेता निभाने के लिए हाथ मिलाकर खड़ा था जो तकरीबन पिछले पंद्रह सालों से सरकार चला रहा था।

दृश्य दो -  तारीख बीस मार्च 2020 जगह छह, श्यामला हिल्स भोपाल यानिकी मुख्यमंत्री  निवास पर दोपहर के बारह बजने को थे। निवास के गेट के पास के मैदान पर लगे डोम के मंच पर एक सफेद कवर वाली अकेली कुर्सी रखी थी जिसके सामने की मेज पर अनेक माइक आईडी रखे गए थे। कुर्सी के ठीक पीछे बड़ा सा फलेक्स लगा था जिसमें कमलनाथ की बड़ी सी तस्वीर थी और स्लोगन लिखा था उम्मीदें रंग लाई तरक्की मुस्कुराई। मगर फलेक्स के श्लोगन के ठीक उलट पंडाल में माहौल नाउम्मीदी का था। सामने एक तरफ लगी कुर्सियों पर कांग्रेस  के विधायक आ आकर बैठ रहे थे। ये वही विधायक थे जो कुछ दिन पहले जयपुर से लौटे थे और इन दिनों भोपाल के मेरियट होटल में डेरा डाले थे। विधायकों की कुर्सियों में पीछे की ओर आकर चुपचाप तरीके से बैठे थे दिग्विजय सिंह जो एक दिन पहले तक बेंगलुरू में थे और कांग्रेस से टूटे छिटके विधायकों से मिलने के लिए सत्याग्रह कर रहे थे। वो किसी से बात नहीं कर रहे थे हर मौके पर मीडिया के सवालों के हँस कर जबाव देने वाले दिग्गी राजा आज चुप थे और उनकी भाव भंगिमा बता रही थी कि वो बेहद थके और उदास हैं मगर दिग्गी राजा के छोटे भाई लक्ष्मण सिंह आगे की कुर्सी पर बैठ मीडिया के सवालों का जबाव उसी अंदाज में दे रहे थे जिस अंदाज के लिए वो जाने जाते हैं। बारह बजने के कुछ मिनट बाद ही मुख्यमंत्री कमलनाथ आते हैं और सामने लगे मीडिया के कैमरों की तरफ मुस्कुराते हुए देखते हैं। कमलनाथ के चेहरे पर हमने ऐसी मुस्कान हमेशा आत्मविश्वास से भरी हुई देखी है मगर आज रंग उतरा हुआ था। वो अपने कुर्ते के जेब से तीन पेज का लिखा हुआ ड्राफ्ट निकालते हैं और बोलना शुरू करते हैं। बड़ा ही भावनात्मक बयान देने के बाद वो कहते हैं कि मैं अब अपना इस्तीफा देने जा रहा हूं। बस इस एक लाइन को सुनते ही जहाँ हम टीवी चैनल वाले ब्रेकिंग न्यूज बताने में लग जाते हैं मगर सामने बैठे कुछ विधायकों की आंखे गीली हो उठती हैं कमलनाथ के पीछे कतार में खड़े उनके मंत्रिमंडल के अनेक युवा मंत्री भी भावुक हो उठते हैं। एक बड़ी ब्रेकिंग न्यूज के आते ही थोड़ी देर बाद ही ये मजमा खत्म हो जाता है। मंच के एक तरफ हाई टी का इंतजाम था मगर हमने वहाँ किसी विधायक नेता को जाते नहीं देखा। पर खबर कितनी ही बड़ी हो हम मेहनतकश पत्रकार चाय नाश्ते में परहेज नहीं करते तो उन स्टाल पर टीवी क्रू की भीड़ थी। कमलनाथ इस्तीफे का ऐलान कर जा चुके थे।

इस राजनीतिक प्रहसन के दोनों दृश्यों के बीच तकरीबन चार सौ साठ दिन का ही फासला रहा। कमलनाथ जब जंबूरी मैदान पर अपनी पार्टी के अध्यक्ष और हजारों समर्थकों के सामने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब उन्होंने कम से कम अगले पाँच साल तक का वक्त तो इस पद के लिए मुकर्रर किया ही होगा। मगर राजनीति की राह कितनी रपटीली होती है ये उन्होंने सोचा भी नहीं होगा. जो लोग पंद्रह महीने पहले उनके साथ जंबूरी मैदान पर हाथ उठाकर फोटो खिंचवा रहे थे वो आज यहाँ नहीं थे। वो महाराज आठ दिन पहले 12 मार्च को शिवराज के साथ खचाखच भरे बीजेपी के दफ़्तर में फोटो खिंचवा रहे थे। कमलनाथ सरकार की विदाई ऐसी होगी किसी ने सोचा नहीं था। जब कमलनाथ आए थे तो उनके पास कई सालों का केंद्र की राजनीति करने का अनुभव था। यूपीए की सरकार में वो कई बार संकटमोचक की भूमिका में रहे। पीवी नरसिंह राव की अल्पमत की सरकार में भी वो फ्लोर मेनेजमेंट के लिए जाने जाते थे। देश के वो सारे नेता जो आज अपनी अपनी पार्टियों के अध्यक्ष बनकर बैठे हैं जिनमें शरद पवार से लेकर मायावती,ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, नवीन पटनायक हैं उनसे कमलनाथ की दोस्ती के संबंध हैं। वो सीधा उनसे फोन लगाकर बात करते हैं। उनके पास संपर्क और सियासत का ऐसा अनुभव था जिसके सामने एमपी के सारे नेता बौने दिखते थे। उन्होंने प्रदेश में कांग्रेस सरकार की जब कमान संभाली तो लगा कि बीजेपी से कम वोट पाकर भी कांग्रेस ने सरकार तो बना ली है मगर इसे यदि कोई चला सकता है तो वो कमलनाथ ही थे क्योंकि राजनीतिक हल्के में उनका नाम मान सम्मान सब कुछ था। एक ब्रांड कमलनाथ था जिसका दिल्ली से लेकर दावोस तक में सिक्का चलता था कमलनाथ की ताकत का एक तिलस्म सा था जिसके आधार पर माना जाता था कि कमलनाथ है तो मुमकिन है। इस्तीफे से एक दिन पहले जब मुझे उन्होंने एबीपी न्यूज के लिए इंटरव्यू दिया तो मेरा पहला सवाल यही था कि कमलनाथ सरकार संकट में है और कमलनाथ के चेहरे पर शिकन नहीं है इस आत्मविश्वास का राज क्या है, उस पर कमलनाथ मुस्कुराए और कहा था कि वो जो बेंगलुरू गये हैं वो मेरे अपने लोग हैं उनसे मेरे संबंध हैं हमारा उनसे संपर्क है जब वो आएँगे तो हमसे दूर नहीं जा सकते हमारी सरकार उनकी सरकार है जिसके लिए उन सभी ने मेहनत की है। मगर कमलनाथ जो कह रहे थे वो बीजेपी भी जानती थी इसलिये इन विधायकों को भोपाल आने ही नहीं दिया और रही सही कसर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने पूरी कर दी जिसने कहा कि इन विधायकों का भोपाल जाना जरूरी नहीं है।
कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है तो कमलनाथ की सरकार ज्योतिरादित्य सिंधिया के पाले बदलने से गिरी वरना तो बीजेपी नेता तीन बार पहले भी ऑपरेशन लोटस कर चुके थे तो यदि आप इतिहास के पन्ने पलटे तो जानेंगे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी विजयाराजे सिंधिया ने भी 1967 में कांग्रेस के एमएलए को पहले दिल्ली और फिर ग्वालियर ले जाकर सरकार गिराई थी तब मुख्यमंत्री थे डीपी मिश्र और सरकार बनने के बाद सीएम बने थे गोविंदनारायण सिंह। मगर गोविंदनारायण सिंह भी लंबे समय तक मुख्यमंत्री नहीं रह पाए। विजयाराजे सिंधिया की सरकार में लगातार दखल देने से नाराज होकर उन्होंने भी उन्नीस महीने बाद ही इस्तीफा दे कर कांग्रेस में वापसी कर ली थी। वैसे इतिहास से सबक लेते रहना चाहिए मगर लोग सबक लेते नहीं हैं।

RB

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ब्रजेश राजपूत

तकरीबन पच्चीस साल के पत्रकारिता करियर में अधिकतर वक्त टीवी चैनल की रिपोर्टिंग करते हुये गुजारा। सहारा टीवी से होते हुये स्टार न्यूज में जो अब एबीपी न्यूज के नाम से चल रहा है। इसी एबीपी न्यूज चैनल के लिये पंद्रह साल से भोपाल में विशेष संवाददाता। इस दौरान रोजमर्रा की खबरों के अलावा एमपी यूपी उत्तराखंड गुजरात और महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों की रिपार्टिंग कर इन प्रदेशों के चुनावी रंग देखे और जाना कि चुनावी रिपोर्टिग नहीं आसान एक आग का दरिया सा है जिसमें डूब के जाना है। चुनावी रिपोर्टिंग में डूबते उतराने के दौरान मिले अनुभवों के आधार पर अखबारों में लिखे गये लेख, आंकडों और किस्सों के आधार पर किताब चुनाव राजनीति और रिपोर्टिंग मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव २०१३ लिखी है जिसमें देश के पहले आम चुनाव की रोचक जानकारियां भी है।

लेखक टीवी में प्रवेश के पहले दिल्ली और भोपाल के अखबारों में उप संपादक और रिपोर्टर रहे। जैसा कि होता है इस लंबे अंतराल में कुछ इनाम इकराम भी हिस्से आये जिनमें मुंबई प्रेस क्लब का रेड इंक अवार्ड, दिल्ली का मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड, देहरादून का यूथ आइकान अवार्ड, मध्यप्रदेश राष्टभाषा प्रचार समिति भोपाल का पत्रकारिता सम्मान, माधवराव सप्रे संग्रहालय का झाबरमल्ल शर्मा अवार्ड और शिवना सम्मान।

पढाई लिखाई एमपी के नरसिंहपुर जिले के करेली कस्बे के सरकारी स्कूल से करने के बाद सागर की डॉ हरिसिंह गौर विश्वविदयालय से बीएससी, एम ए, पत्रकारिता स्नातक और स्नातकोत्तर करने के बाद भोपाल की माखनलाल चतुर्वेदी राष्टीय पत्रकारिता विश्वविघालय से पीएचडी भी कर रखी है।